Wednesday, April 15, 2026
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‘मेटा’ के मंच पर दिखी, महिला कलाकारों की ‘रंग-शक्ति’

शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। ‘मेटा 2026’ के रंगमंच पर इस बार महिला कलाकारों की ‘रंग-शक्ति’ ने भी अपना लोहा मनवाया है। इस बार के सभी दस नाटकों में उनके हुनर का प्रतिभाशाली थियेटर नज़र आया। मंच के आगे और मंच के पीछे वे अदाकारी से लेकर लेखन, निर्देशन और तकनीकी कला पक्ष को और भी बेहतर तरीके से संभालती और प्रस्तुत करते नज़र आईं। यही वजह रही कि इस बार की जूरी में शामिल वरिष्ठ नाट्य निर्देशक अमाल अल्लाना और टीम वर्क आर्ट्स के मैनेजिंग डायरेक्टर संजॉय के. रॉय ने इसे महिलाओं के मंच वाला वर्ष करार दिया। अमाला अल्लाना ने अवॉर्ड घोषित किये जाने की शाम अपने सम्बोधन में कहा – “यदि इस बार कोई एक विचार था जिसने नाटक दर नाटक खुद को दोहराया, तो वह था ‘स्त्री की केंद्रीयता’। चाहे वह उनकी अटूट मानवीयता हो, तर्क संगत दृष्टि हो या निष्पक्षता की भावना; महिलाओं के इन्हीं प्रयासों ने समाज को बदलाव की ओर ले जाने का रास्ता दिखाया। इस बार की प्रस्तुतियों में न केवल अभिनय, बल्कि निर्देशन और तकनीकी दक्षता का भी एक अत्यंत उच्च स्तर देखने को मिला, जो भारतीय थिएटर के भविष्य के लिए एक बहुत ही शुभ संकेत है।” Sanjoy K. Roy, Managing Director of Teamwork Arts, addressing the 2026 awards ceremony. A report by Shakeel Akhtar for Indore Studio.संजॉय के. रॉय ने अपने ने कहा – “यह वर्ष वास्तव में रंगमंच पर महिलाओं का वर्ष रहा है, लेकिन यह केवल अभिनेत्रियों तक सीमित नहीं था। इस बदलाव की जड़ें पटकथा (स्क्रिप्ट) में थीं। हर स्क्रिप्ट महिला-केंद्रित थी, जहाँ महिलाओं को अपनी कहानी और अपने जीवन की कमान खुद संभालते हुए दिखाया गया। यह वह विरासत है जिसकी अमिट छाप ‘मेटा 2026’ अपने पीछे छोड़ रहा है। जहाँ महिला पात्र अब केवल सहयोगी नहीं, बल्कि कहानी की मुख्य संचालिका हैं।”Actress Dusha in the role of Zamira in the play 'Something Like Truth'. She received the META Award for Best Actress this year. A report by Shakeel Akhter for Indore Studio.नाट्य कला के हर मोर्चे पर नारी शक्ति: इस वर्ष मेटा के मंच पर महिलाओं की भागीदारी केवल अभिनय की पारंपरिक सीमाओं तक सीमित नहीं रही। यदि टुर्ना दास और दुशा ने ‘बेस्ट एक्टर इन ए लीड रोल’ का खिताब जीतकर अपनी अभिनय क्षमता साबित की, तो वहीं पर्दे के पीछे निर्देशन, लेखन और तकनीकी सहयोग में भी महिलाओं ने बराबरी की दावेदारी पेश की।Ipshita Chakraborty Singh Choudhury in the play 'Kadambari', directed by Meghna Roy Choudhury. A report by Shakeel Akhter for Indore Studio.महिलाएं संभाल रही थिएटर की कमान: ‘कादम्बरी’ जैसे नाटक का सशक्त निर्देशन मेघना रॉय चौधरी के विजन का परिणाम था, जो यह साबित करता है कि अब महिलाएं थिएटर की ‘कमान’ संभाल रही हैं। प्रकाश व्यवस्था (लाइट्स), ध्वनि संयोजन और मंच सज्जा में भी महिला तकनीशियनों की सूक्ष्म दृष्टि ने प्रस्तुतियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की बारीकी प्रदान की। अमाला अल्लाना के शब्दों में, “उनकी तकनीकी दक्षता और मानवीय संवेदना के संगम ने ही इस बार के थिएटर को इतना प्रासंगिक बनाया है।”Sharvari Deshpande, Ashwini Giri, Dusha, and Kalyani Mule in the play 'Something Like Truth', directed by Parna Pethe. A report by Shakeel Akhter for Indore Studio.सत्य की तलाश और ‘समथिंग लाइक ट्रुथ’ का संघर्ष: फेस्टिवल के सबसे चर्चा में रहे नाटकों में से एक ‘समथिंग लाइक ट्रुथ’ ने दर्शकों को झकझोर कर रख दिया। चार सच्ची घटनाओं पर आधारित यह नाटक उन चार महिलाओं की कहानियाँ कहता है, जिनके साथ व्यवस्था और समाज ने ज़्यादती की। इन पात्रों के माध्यम से मंच पर जो दर्द और न्याय की गुहार उभरी, उसने यह सिद्ध कर दिया कि रंगमंच अब महिलाओं के लिए केवल कला नहीं, बल्कि विरोध और अपनी आवाज़ बुलंद करने का एक सशक्त माध्यम बन चुका है। यह नाटक उस ‘महिला केंद्रीयता’ का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर उभरा, जिसकी चर्चा जूरी ने बार-बार की।A scene from the play 'Mithyasur'. A report by Shakeel Akhter for Indore Studio.पटकथाओं के केंद्र में स्त्री अस्मिता: संजॉय रॉय ने ठीक ही कहा कि इस बार की स्क्रिप्ट्स में महिलाएं ‘निर्णायक’ भूमिका में थीं। चाहे ‘मिथ्यासुर’ की वह राजकुमारी हो जो तर्क और विज्ञान से अंधविश्वास को चुनौती देती है, या ‘करुणाष्टके’ की वे विधवाएं जो अपने सामूहिक शोक को एक क्रांति में बदल देती हैं—हर पटकथा में स्त्री अस्मिता केंद्र में रही। ‘धोमी किथा किथा धोमी’ में शूर्पणखा के चरित्र को जिस तरह से एक अधिकार मांगने वाली स्त्री के रूप में पुनः परिभाषित किया गया, वह भारतीय पौराणिक कथाओं को महिलाओं के दृष्टिकोण से देखने की एक नई शुरुआत है।Best-Actor-in-a-Supporting-Role-Female-–Ipshita-Chakraborty-Singh-–-Kadambari-presented-by-Rajat-Kapoorएक नई विरासत की शुरुआत: पुरस्कारों की फेहरिस्त में इप्शिता चक्रवर्ती सिंह (बेस्ट सपोर्टिंग रोल) जैसे नाम इस बात की पुष्टि करते हैं कि हर श्रेणी में महिला कलाकारों ने श्रेष्ठता के नए मानक स्थापित किए हैं। मेटा 2026 ने यह संदेश साफ कर दिया है कि भारतीय थिएटर अब एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुका है जहाँ महिलाओं के निरंतर प्रयास, उनकी तर्क शक्ति और नेतृत्व क्षमता ही भविष्य की दिशा तय करेगी। यह केवल एक फेस्टिवल की सफलता नहीं, बल्कि रंगमंच के बदलते हुए जेंडर-इक्वेशन (लैंगिक समीकरण) की एक गौरवशाली जीत है।Purva Naresh—Adaptor and Director of the play 'Chandni Raaten'—during an educational session organized by META. A report by Shakeel Akht3r for Indore Studio.‘आधी दुनिया’ की दमदार मौजूदगी: अगर सभी दस नाटकों की बात करें तो नाटक के महिला निर्देशकों में पूर्वा नरेश (चाँदनी रातें), मेघना रॉय चौधरी (कादम्बरी), पर्णा पेठे (समथिंग लाइक ट्रुथ) के नाटकों ने उनकी प्रतिभाशाली उपस्थिति दर्ज कराई। ‘समथिंग लाइक ट्रुथ’ नाटक तो पूरी तरह से महिलाओं की टीम ने ही तैयार किया है, जो इसके विषय में एक और अर्थपूर्ण परत जोड़ता है। इसके अलावा कोई 50 महिला कलाकारों ने मंच पर अपने अभिनय से दर्शकों का दिल जीता। A Scene from the Play 'Karunakastake'. A Report by Shakeel Akhter for Indore Studio. A Scene from the Play 'Amba'. A Report by Shakeel Akhter for Indore Studio.पुरस्कार न मिला तो क्या, दिलों में जगह बनाई: इनमें कादम्बरी, समथिंग लाइक ट्रुथ, करुणाष्टके, जे जानलागुलोर आकाश छिलो, धोमी किथा किथा धोमी जैसे नाटकों से लेकर Y-व्हाट रिफ्यूसेज़ टू फेड नाटक रहे। ‘अम्बा’ नाटक ने कोई पुरस्कार तो नहीं जीता लेकिन इसकी सभी महिला कलाकारों के काम को दर्शकों की सराहना मिली। वेशभूषा, संगीत, डिज़ाइन और नेपथ्य प्रबंधन में भी महिला कलाकारों ने ज़िम्मेदार भूमिकाएं निभाईं और अपने काम से प्रभावित किया। आगे पढ़िये – ‘गुरू-शिष्य’ परंपरा के नये नियमों से कला जगत में खलबली- https://indorestudio.com/guru-shishya-parampara-scheme-new-rules-controversy/

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