Wednesday, April 15, 2026
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मोहल्ला अस्सी: बनारस की बहसों और बदलते समय की कहानी

सिने प्रतिनिधि, इंदौर स्टूडियो। हिंदी सिनेमा में बहुत कम ऐसी फिल्में बनी हैं जो किसी शहर की भाषा, बहसों और सामाजिक मनोदशा को उसी जीवंतता के साथ परदे पर उतारने का जोखिम उठाती हैं। मोहल्ला अस्सी ऐसी ही एक फिल्म है, जो वाराणसी के अस्सी घाट और उसके आसपास के सांस्कृतिक संसार को केंद्र में रखकर बनारस की बहसों, व्यंग्य और बदलते समय की बेचैनी को चित्रित करती है। निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी की यह फिल्म चर्चित लेखक काशीनाथ सिंह के प्रसिद्ध उपन्यास काशी का अस्सी से प्रेरित है। लंबे समय तक सेंसर और कानूनी विवादों में उलझे रहने के बाद यह फिल्म आखिरकार 16 नवंबर 2018 को सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई। रिलीज़ के साथ ही यह अपनी बेबाक भाषा, बनारसी परिवेश और सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों के कारण चर्चा में आ गई।फिल्म की कहानी अस्सी घाट के आसपास बसे उस मोहल्ले की है जहाँ चाय की दुकानों, घाटों और गलियों में राजनीति, धर्म, साहित्य और समाज पर खुली बहसें चलती रहती हैं। कहानी का केंद्र पात्र पंडित धर्मनाथ पांडे हैं, जिनकी भूमिका सनी देओल ने निभाई है। वह संस्कृत पढ़ाने वाले एक परंपरावादी पंडित हैं, जो तेजी से बदलती दुनिया और बाज़ार की ताकतों से असहज हैं।उनकी पत्नी सावित्री का किरदार साक्षी तंवर ने निभाया है, जो व्यवहारिक सोच रखने वाली महिला है और परिवार की आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रही है। सहायक भूमिकाओं में सौरभ शुक्ला, मुकेश तिवारी, रवि किशन और राजेंद्र गुप्ता जैसे कलाकार बनारसी जीवन के अलग-अलग रंग सामने लाते हैं।फिल्म का समय 1990 के आसपास का है—जब देश में मंडल आयोग के फैसले और राम जन्मभूमि आंदोलन जैसे राजनीतिक घटनाक्रम समाज को प्रभावित कर रहे थे। इसी दौर में आर्थिक उदारीकरण और पर्यटन के कारण बनारस जैसे धार्मिक शहरों में विदेशी पर्यटकों की संख्या बढ़ रही थी। कहानी में यह टकराव तब और तीखा हो जाता है जब धर्मनाथ पांडे आर्थिक मजबूरी में एक विदेशी महिला पर्यटक को अपने घर में पेइंग गेस्ट रखने के लिए तैयार हो जाते हैं। परंपरा और आजीविका के बीच का यही संघर्ष फिल्म का मुख्य नाटकीय आधार बनता है।मोहल्ला अस्सी’ की सबसे बड़ी विशेषता इसकी भाषा है। बनारस की ठेठ बोली, व्यंग्य और खुली गाली-गलौज से भरे संवाद अस्सी मोहल्ले की पहचान माने जाते हैं। निर्देशक ने इस लोकभाषा को लगभग उसी रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया, लेकिन यही तत्व विवाद का कारण भी बना। 30 जून 2015 को दिल्ली की एक अदालत ने कथित रूप से धार्मिक भावनाओं को आहत करने की शिकायत के बाद फिल्म की रिलीज़ पर रोक लगा दी थी। बाद में कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद इसे रिलीज़ की अनुमति मिली।फिल्म का संगीत निर्देशक आमोद भट्ट ने तैयार किया है। संगीत में बनारस की लोक और शास्त्रीय परंपराओं—ठुमरी, कजरी, दादरा और ध्रुपद—का वातावरण रचा गया है। इसमें आरती, भजन, और मंदिर-घाटों की संस्कृति की प्रतिगूंज है। गायन में उदित नारायण, सुखविंदर सिंह और मधुश्री जैसे गायकों की आवाज़ शामिल है। विशेष रूप से गीतकार गुलज़ार द्वारा लिखा गया गीत “गंगा रे कभी…” फिल्म के सांस्कृतिक माहौल को गहराई देता है। इसका एक और गीत ‘सोच में अंतर कोई नहीं’ भी बेहद पसंद किया गया है।जब ‘मोहल्ला अस्सी’ रिलीज़ हुई, उसी समय बड़े बजट की फिल्म ठग्स ऑफ हिंदोस्तान (जिसमें अमिताभ बच्चन और आमिर खान थे) चर्चा में थी। उसी दिन रिलीज़ हुई छोटी लेकिन प्रयोगधर्मी फिल्म पीहू भी दर्शकों का ध्यान खींच रही थी, जबकि कुछ ही दिनों बाद भव्य विज्ञान-फंतासी फिल्म 2.0 आने वाली थी। ऐसे प्रतिस्पर्धी माहौल में ‘मोहल्ला अस्सी’ का महत्व इस बात में है कि यह व्यावसायिक चमक-दमक से अलग एक शहर की सांस्कृतिक आत्मा को परदे पर दर्ज करने की कोशिश करती है।समग्र रूप से ‘मोहल्ला अस्सी’ को हिंदी सिनेमा का एक दिलचस्प लेकिन असमान प्रयोग कहा जा सकता है। कुछ जगहों पर इसका कथानक बिखरता हुआ लगता है, लेकिन बनारस की जीवंत बहसों, उसकी खुली भाषा और बदलते समय की बेचैनी को दर्ज करने की कोशिश इसे अलग पहचान देती है। जहाँ हिंदी फिल्मों में शहर अक्सर सिर्फ पृष्ठभूमि बनकर रह जाते हैं, वहाँ ‘मोहल्ला अस्सी’ एक ऐसे शहर की आत्मा को पकड़ने का प्रयास करती है जो सदियों से विचार, आस्था और बहसों का केंद्र रहा है। इस बीच इस फिल्म की पटकथा और इस मामले को लेकर चले मुकदमे की पूरी जानकारी पर किताब भी प्रकाशित हो गई है। यह किताब फिल्मों में दिलचस्पी रखने वाले आम पाठकों से लेकर फिल्म की स्क्रिप्ट में दिलचस्पी रखने वालों के लिये संग्रहणीय है। आगे पढ़िये – अमोल पालेकर को मेटा 2026 का लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड https://indorestudio.com/amol-palekar-meta-2026-lifetime-achievement-award-delhi

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