अख़तर अली, इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। लम्बी खिज़ा के बाद एक बार फिर रायपुर के रंगमंच पर बहार का मौसम आया, फिर से रंग मंदिर के पट खुल गये। दर्शक फिर प्रेक्षागृह की सीढियां चढ़ने लगे, फिर से पर्दा उठा , मंच पर प्रकाश की किरण पड़ी , संगीत की स्वर लहरी सुनाई दी , अभिनेता ने मंच पर पहला कदम रखा, पहला संवाद बोला , मंच से अभिनय के रंग बिखरने लगे और दर्शक कुछ देर के लिये कोरोना काल का सारा दुःख भूल गये।
योग मिश्र का अभिनट रंगमंच कुछ और संपन्न: नाटक देखने दिखाने का यह अवसर निर्मित किया था अभिनट फ़िल्म एंड नाट्य फाउंडेशन ने। संस्था ने हबीब तनवीर साहब की जन्मतिथी पर दो दिवसीय नाट्य समारोह का आयोजन किया । पहली संध्या पर योग मिश्रा के निर्देशन में नाटक ‘सुक्कू बाई’ का मंचन किया गया। सुक्कू बाई की प्रस्तुति के साथ ही योग मिश्रा और उनका अभिनट परिवार रंगमंच का संपन्न घराना होता लगने लगा।
सुक्कू बाई एक संघर्षशील महिला की कहानी: नाटक सुक्कू बाई प्रसिद्ध रंगकर्मी नादिरा ज़हीर बब्बर का लिखा नाटक है। नादिरा जी के लेखन में उनका निर्देशक और अभिनेत्री होना शामिल है । सुक्कू बाई एक संघर्षशील महिला की कहानी है , निम्न वर्ग की महिलाए जो घरो में काम करती है उनको केंद्र में रख कर नादिरा जी ने यह नाट्य आलेख रचा है। कथानक बेहद साधारण है लेकिन नादिरा जी की पटकथा ने एक बार फिर साबित कर दिया कि नाटक कथ्य के दम पर नहीं बल्कि अपने शिल्प के दम पर चलता है। नाट्य आलेख में रंगमंच की तकनीक का समाहित होना महत्वपूर्ण है। सशक्त संवाद , बढ़िया कथानक , अच्छा सन्देश ही पर्याप्त नही होते बल्कि इन सब के मध्य बेहतर दृश्य निर्माण के लिए जगह बनाना , ड्रेस , सेट और लाईट के लिए भरपूर स्पेस रखना ही अच्छे नाट्य लेखन की पहचान है।
छत्तीसगढ़ी में उम्दा अनुवाद : इस हिन्दी नाटक का छत्तीसगढ़ी अनुवाद योग मिश्र ने किया है । अनुवाद बहुत उम्दा हुआ है , यह शाब्दिक अनुवाद नहीं है । यह मूल के भाव का अंदाज़ है। इसे पूरी तरह मन ही मन में मंच पर खेलते-खेलते लिखा गया है। नाटक में अभिनेता की तैयारी , स्पेस का इस्तेमाल , मंच पर पदचाप , संवादों की अदायगी , अभिनेता की बाड़ी लैंग्वेज , लाईट कवर करना , प्रापर्टी का इस्तेमाल । एक आदर्श प्रस्तुती के सभी तत्व नाटक में मौजूद थे। सब से ख़ास बात यह थी कि प्रगट के बीच जो अप्रगट होता है, वह बहुत सफलतापूर्वक प्रगट हुआ था ।
मिजान ने प्रस्तुति को दी बुलंदी : सुक्कू बाई की भूमिका में मिजान खान अपने उरूज पर थे , उन्होंने प्रस्तुति को बुलंदी पर पहुचाया। अब तक मिजान दूसरी पंक्ति के अभिनेता माने जाते थे लेकिन योग मिश्रा ने उन्हें पहली पंक्ति में ला कर उनका कद बढ़ा दिया। सुक्कू बाई की मुख्य भूमिका के लिए मिजान का चयन करना योग मिश्रा की बेहतर रंग दृष्टि का पुख्ता सबूत है । ऐसे अभिनेता और ऐसे अभिनय से ही नाट्य पंडितो ने कहा है कि रंगमंच अभिनेता का माध्यम है। नाटक जब तक अच्छा लिखा न जाये उसे अच्छे से निर्देशित नहीं किया जा सकता , जब तक अच्छे से निर्देशित न किया जाये उसमे अच्छा अभिनय नहीं किया जा सकता , जब तक अच्छा अभिनय न किया जाये वह मंच पर अच्छा आकार नही ले सकता।
पूरे नाटक में निर्देशक और अभिनेता की ज़बरदस्त केमिस्ट्री देखने मिली। यह बहुत नाज़ुक मिज़ाज का नाटक है ऐसे नाटक जब मंच पर होते है तब लगभग कांच के घर में होते है , बहुत पतले कांच के घर में । इसे चकनाचूर होने से बचाना पूरी तरह अभिनेता की ज़िम्मेदारी होती है। नाटक की मुख्य भूमिका में मिजान खान का चयन करना ही योग मिश्रा की पुख्ता रंग दृष्टि का सबूत है। नाटक के एक एक दृश्य नहीं , एक-एक संवाद नहीं , एक-एक लाईन नहीं बल्कि एक-एक शब्द पर बारिकी से काम किया गया है। छोटे-छोटे दृश्यों में जिस तरह नक्काशी की गई है , यह रंगमंच में किया गया सुनारी काम जैसा है। नाटक को शोर गुल , चीख़-पुकार से बचाया गया है , दृश्यों का संपादन कुशलतापूर्वक हुआ है।
मॉड्यूलर किचन ख़ूबसूरत प्रयोग : नाटक की वेशभूषा और मंच सज्जा नाटक का दूसरा आकर्षक पक्ष था। मंच के एक हिस्से में बना माड्यूलर किचन नाटक की ख़ूबसूरती में इज़ाफ़ा कर रहा था। किचन में सुक्कू बाई का काम करना देखते ही बनता था। फोन पर बात करते समय भी अभिनेता ने अभिनय के नये रंग बिखेरे , वहां अभिनय के कई शेड नज़र आये। अभिनेता का दृश्य में दाखिल होना और दृश्य में से निकलना नाटक को लगातार संवारता रहा। अनेक स्थानों पर लम्बी स्पीच भी थी जिसे बहुत सहजता से अभिनेता कह गया। सक्कू बाई एकल अभिनय है इसे एकल पात्र क्यों कहा जाता है ? नाटक में अभिनेता एक है लेकिन वह जीता तो अनेक पात्र है। रंगमंच में अनुशासन की दरकार : कोरोना के बाद जब पुनः रंगमंच आरंभ हुआ है, तब वह सक्कू बाई के रूप में छत्तीसगढ़ में आन बान शान के साथ आरंभ हुआ है । नाटक की अवधि एक घंटा थी लेकिन इसे दिखाने के लिये दर्शको को दो घंटे का इंतज़ार कराया गया । यह बात अनेक बार कही गई है कि जब दर्शक को नाटक देखने बुलाया जा रहा है तो उसे सिर्फ नाटक दिखाया जाये । नाटक के अतिरिक्त जो भी रंगमंच से ही संबंधित ज़रूरी कार्य है उसका समय अलग होना चाहिए । अगर आप निरंतर और गंभीर रंगकर्म कर रहे है तो आप के पास इसका अनुशासन और व्यवस्था होनी चाहिए । (अख़तर अली ख्यात नाट्य समीक्षक और नाटककार हैं। संपर्क-निकट मेडी हेल्थ हास्पिटल आमानाका ,रायपुर,छत्तीसगढ़।)

