नालंदा लिटरचेर फेस्टिवल बना विरासत का जीवंत मंच

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कला प्रतिनिधि, इंदौर स्टूडियो। राजगीर में जारी नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल (NLF 2025) के दूसरे और तीसरे दिन की गतिविधियों ने भाषा, इतिहास, दर्शन और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत मंच बना दिया। राजगीर एक बार फिर बौद्धिक संवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का केंद्र बनकर उभरा। 22 दिसंबर को महोत्सव का दूसरा दिन योग और ध्यान सत्रों से आरंभ हुआ, जिसने प्रतिभागियों को सकारात्मक ऊर्जा दी। भारत की बहुसांस्कृतिक पहचान पर विचार: इसके बाद डॉ. सोनल मानसिंह, डॉ. शशि थरूर, अदूर गोपालकृष्णन और प्रो. सचिन चतुर्वेदी जैसे प्रतिष्ठित वक्ताओं ने साहित्य और भारत की बहुसांस्कृतिक पहचान पर विचार साझा किए। क्षेत्रीय भाषाओं — बज्जिका, मगही, अंगिका, मैथिली और भोजपुरी — के संरक्षण और पुनर्जीवन पर केंद्रित सत्रों ने मातृभाषा की अहमियत को रेखांकित किया। तकनीक, सिनेमा और भाषा की नई भूमिका: दूसरे दिन के सत्रों में तकनीक, सिनेमा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के संदर्भ में भाषा की बदलती भूमिका पर चर्चा हुई। “शब्दों की सोशल फैक्ट्री” में भाषा और एआई के संबंधों पर नैतिक चिंताओं को सामने रखा गया। डॉ. शशि थरूर ने नालंदा की वैश्विक शैक्षणिक विरासत और भारतीय उच्च शिक्षा की चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए आलोचनात्मक सोच और उद्योग–अकादमिक सहयोग को आवश्यक बताया। इसी दिन फिल्म अर्ध नायक का मुहूर्त लॉन्च हुआ, जिसने साहित्य और सिनेमा के गहरे संबंधों को रेखांकित किया।तीसरा दिन : इतिहास और उत्तर-पूर्व का विमर्श: 23 दिसंबर को तीसरे दिन की शुरुआत भी योग और ध्यान से हुई। इसके बाद “भारतीय इतिहास को भारतीय दृष्टिकोण से पुनः समझना” सत्र में डॉ. विक्रम संपत ने औपनिवेशिक विकृतियों और नए पुरातात्विक निष्कर्षों पर प्रकाश डाला। “हर वर्ड्स, हर वर्ल्ड” सत्र में भारतीय साहित्य में महिलाओं की भूमिका और योगदान पर विचार हुआ। प्रो. गणेश नारायणदास देवी ने भाषा को सांस्कृतिक विरासत का वाहक बताया।नालंदा की भावना और मौखिक परंपराएँ: “दुनिया में नालंदा की भावना” सत्र में शोभना नारायण और अखिलेंद्र मिश्रा ने नालंदा को संवाद और बहुलता की परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया। उत्तर-पूर्वी राज्यों के शिलालेखों पर हुए सत्र ने असम और पूर्वोत्तर भारत के राजनीतिक व भाषाई इतिहास को समझने की दिशा में नए दृष्टिकोण दिए। देवदत्त पटनायक ने “मौखिक साहित्य” सत्र में कहानी कहने की परंपरा को मानव संस्कृति की नींव बताया और इसे मूल्य, विश्वास और सामाजिक ढांचे को आगे बढ़ाने का माध्यम कहा। शाम का समापन डॉ. सोनल मानसिंह की मनमोहक सांस्कृतिक प्रस्तुति और रात्रिभोज के साथ हुआ। आगे पढ़िये – विनोद कुमार शुक्ल की स्मृति में एक लाख रु. के पुरस्कार की घोषणा https://indorestudio.com/vinod-kumar-shukla-smriti-puraskar-announcement/

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