Saturday, October 17, 2026
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नाटक ‘दयाशंकर की डायरी’ को दर्शकों का अच्छा प्रतिसाद

इंदौर स्टूडियो डॉट कॉम। रायपुर जैसे छोटे शहर के रंगमंच पर नाटक ‘दयाशंकर की डायरी’ को दर्शकों का अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है। छह दिनों तक लगातार एक ही नाटक के दो शो आयोजित करने का यहाँ सोचा भी नहीं जा सकता लेकिन अभिनट संस्था ने यह संभव कर दिखाया। यहाँ नाटक का उस तरह का माहौल भी नहीं है, जैसा महानगरों में होता है और नाटकों की कोई बड़ी परम्परा भी नहीं रही है, बावजूद इसके यह हो पाना कुछ रंगमंच प्रेमियों के जुनून से ही संभव हुआ है।

नाटक मुंबई की ख्यात रंगकर्मी नादिरा ज़हीर बब्बर ने लिखा है। नादिरा जी मूलतः लेखिका नहीं हैं लेकिन मशहूर रौशन ख्यालात लेखक सज्जाद ज़हीर की बेटी होने के कारण लेखन इनके रक्त में है। इसी तरह मशहूर अभिनेता राज बब्बर का साथ होने के कारण दृश्य इनके दिमाग में है, फिर स्वयं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित हैं तो मंच के सभी कोणों से भलीभांति परिचित हैं। लिहाजा इन सबका निचोड़ उनके लिखे नाटक ‘दयाशंकर की डायरी’ में मौजूद हैं। यह बहुपात्रीय नाटक होता तो इसमें बहुत से विहंगम दृश्य होते लेकिन इसे एक पात्रीय बनाकर लेखिका ने इसमें एक ओर जहाँ अभिनेता के लिए चुनौती और दर्शको के लिए रोमांच पैदा किया है, वही बड़ी टीम के तनाव से निर्देशक को मुक्ति भी दिला दी है।

नाटक का विषय आमफहम विषयों से हटकर : जो नाटक के विषय नहीं हो सकते उन विषयों पर भी नाटक लिख कर नाटककारो ने साबित किया है कि सोच के विपरीत जाकर भी सफ़लता पाई जा सकती है। नाटक को मंच पर लाने के लिए नाटकीयता की आवश्यकता होती है लेकिन दया शंकर का लेखन, लेखन के पारंपरिक मिथक को तोड़ता है और नाट्य लेखन का बदला स्वरूप पेश करता है। यह बदला हुआ स्वरूप पेश करना इसलिए भी मुमकिन हो पाया क्योकि यह एक पात्रीय प्रयोग है, बहुपात्रीय होता तो इसका स्वरूप कुछ और ही होता, लेकिन जिस समय यह नाटक लिखा गया था उस समय एक पात्रीय नाटक लिखना ही लिखने में सोचने का नया स्वरूप था।
शब्दों में कम, दृश्यों में ज़्यादा कहता है यह नाटक : यह नाटक शब्दों में कम दृश्यों में ज़्यादा लिखा गया है, जब एक लेखक लिखता है और जब एक निर्देशक लिखता है तो यह साफ़ दिखाई देता है। नाटक में शब्दों में से दृश्य नहीं निकला है बल्कि दृश्यों में शब्द डाले गए है। जब लेखक नाटक लिखता है तो निर्देशक उसके अनुसार दृश्य सजाता है और अभिनय के अंदाज़ तय किये जाते है, लेकिन जब कोई निर्देशक नाटक लिखता है तो वह पहले दृश्य बना लेता है और अभिनय का अंदाज़ तय करने के बाद उसे लिखता है। ऐसे लिखे नाटक खुद लेखक के तैयार किये जाने के लिए तो आसान होते है लेकिन यह स्क्रिप्ट दूसरे निर्देशक के लिए दिक्कत भरी होती है।

यह किसी एक की नहीं हमारे जैसे सैकड़ों दयाशंकर की डायरी : यह किसी एक दयाशंकर की कहानी नहीं है, यह हमारे जैसे सैकड़ो दयाशंकरो की डायरी के अंश है। इसमें पलायन, संघर्ष, उत्साह, उदासीनता, हास्य व्यंग्य, सफलता, नाकामयाबी, सपने, यथार्थ जैसे सभी फार्मूले मौजूद है। एक नौजवान की उम्मीदों का दस्तावेज है यह नाटक जिसमें अभिनय किया था रवि शर्मा ने। पूरे नाटक में रवि सूर्य की भांति मंच पर प्रकाश बिखेरते रहे। रवि को मैंने पहले भी मंच पर बेहतर करते देखा है लेकिन दयाशंकर के रूप में कल रवि मंच पर अपने चरम पर थे। रवि के अभिनय में एक अभिनेता की भूख स्पष्ट महसूस हो रही थी। अभिनेता ने चरित्र इतना आत्मसात कर लिया था कि अभिनेता का चरित्र से सम्बंध प्यास का पानी से सम्बंध लग रहा था। अभिनय का अंदाज़ ऐसा कि ज़ुल्फ़ को रुख्सार पर लटकाये थे वह सौ-सौ तरीके से। अदाओं के समंदर में से अभिनेता मोती बन कर निकला। मंच पर समय का इस्तेमाल अभिनेता की समझ को दर्शाता है, रवि ने कम से कम समय खर्च कर के महंगे-महंगे दृश्य खरीदे थे।

कई शेड हैं मुख्य अभिनेता के अभिनय में : एक पात्रीय नाटक पूरी तरह से अभिनेता पर निर्भर होते है। दयाशंकर के रूप में रवि ने अभिनय के बहुत से शेड प्रस्तुत किये। आवाज़ के उतार चढ़ाव और संवादों की स्पष्ट अदायगी के साथ-साथ आंगिक अभिनय से भी प्रभाव पैदा किया गया। अभिनय में खुद पर नियंत्रण एक कारनामा होता है। मंच पर दौड़ भाग, चीख चिल्लाहट, हंसना रोना यह नियंत्रित नहीं हुआ तो प्रस्तुति हाथ से निकल जाती है। मंच पर अनियंत्रित अभिनेता बिफरे सांड की तरह होता है जिसकी तरफ़ न कोई देखना चाहता है न कोई जाना चाहता है। अभिनेता को यह अहसास नहीं होता कि वह अनियंत्रित हो रहा है, वह तो इसी ग़लतफ़हमी में रहता है कि इस समय वह अपना सर्वश्रेष्ठ कर रहा है। मंच पर अभिनेता नियंत्रण में है तो इसका श्रेय निर्देशक को जाता है कि उसने उसे काबू में रखा। उसकी आवाज़ के वाल्यूम से लेकर शरीर के हर हरकत की सीमा तय कर निर्देशक जब अभिनेता को संभालता है तब मंच पर प्रभाव स्थापित होता है और प्रस्तुति सफल प्रस्तुति बनती है।

योग मिश्रा के निर्देशन को सराहा दर्शकों ने : अभिनय नाटक का चेहरा होता है। चेहरे से ही शरीर की शिनाख्त होती है। नाटक को शक्ल निर्देशक की अक्ल देती है। निर्देशक थे योग मिश्रा। वे रायपुर से दिल्ली-मुंबई तक में कला के महत्त्वपूर्ण प्रदर्शन करते रहे हैं। फ़िल्म और टेलीविज़न से भी इनका वास्ता रहा है। योग लम्बे समय से रंगमंच में कुछ बड़ा करने की कोशिश में थे, उनके अंदर की छटपटाहट दयाशंकर के रूप में बाहर निकली है। इस एक पात्रीय नाटक में दरअसल दो पात्र थे, एक रवि और दूसरे योग। रवि दिखते हुए नज़र आ रहे थे योग बिना दिखे नज़र आ रहे थे। निर्देशक नाटक का खुदा होता है, वह नहीं दिखता पर उसका काम दिखाई देता है। रायपुर के रंगमंच के अनुभवी लेखक निर्देशक अभिनेता योग मिश्रा हबीब तनवीर के शिष्य रहे है और यह हिम्मत कि छह दिन तक लगातार दो शो करना हबीब तनवीर की छोड़ी हुई जायदाद में योग मिश्रा का हिस्सा है।

‘दयाशंकर की डायरी’ हिन्दी रंगमंच का बहुचर्चित नाटक : यह हिन्दी रंगमंच का बहुचर्चित, बहुप्रशंसित नाट्य आलेख है। यह बहुत बार पढ़ा और देखा गया है, बहुत बार विभिन्न माध्यमो से इसके बारे में सुना और समझा गया है। प्रसिद्ध अभिनेता आशीष विद्यार्थी का कैरियर इसी नाटक से बना है।

ध्वनि, मंच सज्जा और प्रकाश सब कुछ बेहतर : एक नाटक बहुत अच्छा सिर्फ़ अभिनय और कथानक के कारण नहीं होता है, नाटक के और भी बहुत सारे तत्व होते है जिनके सहारे प्रस्तुति को सजाया और संवारा जाता है ताकि उसे निहारा जा सके. इस प्रस्तुति को खूबसूरत बनाने में मंच सामग्री और साउंड इफेक्ट का भी इस्तेमाल किया गया। ध्वनि रिकार्डेड थी, नेट पर से इसे खोजा गया होगा। महत्त्व इस बात का नहीं कि नाटक के लिए सामग्री का संकलन कहा से किया गया। महत्त्वपूर्ण है संकलित सामग्री का इस्तेमाल कैसे किया गया। माइक पर जब साउंड इफेक्ट का इस्तेमाल किया जाता है तब अक्सर वह लाउड हो जाया करते है। कुछ-कुछ यहाँ भी हुआ, निर्देशक को आगामी प्रयोग में इसे नियंत्रित करना चाहिए. अभिनेता और कथानक को देखने लायक आकर्षक बनाना ही नाटक का निर्देशन करना है। पसीना बहाने से नाटक तैयार नहीं होते, नाटक आइडिये से, टेक्निक से तैयार होते है। योग के काम में वह बारीकी नज़र आती रही जिससे दृश्य को तराशा जाता है। दृश्य में छिपे हुए गड्ढो को भरने में जो कलात्मकता का इस्तेमाल किया गया वह उनकी रंगमंचीय समझ को दर्शाती है। लिखते समय नाटक की हथेली में कामयाबी की लकीरे नहीं होती, निर्देशक मेहनत से नाटक का मुकद्दर गढ़ता है।

नाटक में लाईटिंग मिज़ान खान ने की थी। मंच पर अभिनेता जो करता है उसे लाइटमैन दिखाता है, लाईट की तकनीकी गड़बड़ियाँ एक अच्छे नाटक का आनंद बिगाड़ सकती है। मिज़ान ने नाटक का आनंद बनाए रखा। हालाँकि प्रकाश में किसी भी प्रकार का नया प्रयोग नहीं था लेकिन काम में गंभीरता झलक रही थी। मिज़ान को अभिनय से अपना ध्यान हटाकर लाईट की तरफ रुख करना चाहिए। आने वाले समय में मिज़ान एक अच्छे लाईट डिज़ाईनर हो सकते है। सुभाष मिश्रा ने अपने मिनी थियेटर जनमंच में प्रदर्शन की सभी सुविधाये मुफ्त में उपलब्ध कराई। लेकिन ऐसा नहीं है कि यह सुविधा सिर्फ़ इस नाटक भर के लिए थी। यह सुविधा हर नाट्य संस्था के लिए है कि जो दम लगाकर कम करने का माद्दा रखती हो।

नाटक के छत्तीसगढ़ी अनुवाद की कोई आवश्यकता नहीं थी। अनुवाद की ज़रूरत तब होती है जब रचना को उन तक पहुँचाना हो जो उस मूल भाषा के जानकार न हो जिस भाषा में लेखन हुआ है, लेकिन यह तो मूल रूप से हिन्दी में ही है और हम हिन्दीभाषी ही हैं, तब इसकी कोई ज़रूरत नहीं थी। योग मिश्रा चतुरता से इसे छत्तीसगढ़ी में खेल कर इसकी हिन्दी प्रस्तुति जो स्वयं लेखिका के निर्देशन में होती है से तुलना होने से रोक दिया और अपने अभिनेता को आशीष विद्यार्थी के दबाव से भी बचा लिया। छतीसगढ़ी ने नाटक में मिठास घोल दी, अभिनेता के मुँह से छत्तीसगढ़ी खूब फब रही थी।

नाटक की समाप्ति पर प्रस्तुति से सम्बंधित बातचीत में भारत भवन और नया थियेटर के अभिनेता दिनेश दुबे, इंदिरा संगीत विश्व विद्यालय नाट्य विभाग से सम्बंधित आनंद कुमार पांडेय तथा इप्टा रायपुर के हरजीत जुनेजा ने सार्थक बातचीत की। योग मिश्रा और रवि शर्मा की यह प्रस्तुति देखने के लालच को बढ़ाती है, उम्मीद करते है कि योग मिश्रा जल्द नई प्रस्तुति और लगातार प्रस्तुतिया कर के छत्तीसगढ़ी अंचल के रंगमंच को और अधिक समृद्ध करेंगे।

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