(नाट्य समीक्षा -अख़तर अली )
नाटक – गाँव के नाँव ससुराल मोर नाँव दामाद
लेखक – हबीब तनवीर
निर्देशिका – रचना मिश्र
प्रस्तुति- छत्तीसगढ़ फिल्म्स एंड विजुअल आर्ट सोसाइटी रायपुर
रायपुर के रंगमंच पर एक बार फिर हबीब तनवीर कृत नाटक ‘गाँव के नाँव ससुराल मोर नाँव दामाद’ की प्रस्तुति हुई । एक बार फिर यादों का पिटारा खुल गया, एक बार फिर लोक गीत , लोक संगीत , लोक नृत्य का समा बंध गया । एक बार फिर दर्शक झूमने लगे , एक बार फिर मंच पर हबीबी रूप और तनवीरी अदाओं का अहसास होने लगा ।

हबीब की रचना को रचना का रचना एक बार फिर भा गया। छत्तीसगढ़ की लोक कथा को आधार बनाकर हबीब तनवीर ने एक समूचा लोक संसार रचा था । लोक कथा में लोक कला के सभी तत्व समाहित थे । अब न वो रचनाकार था न वो कलाकार लेकिन लोक का वह प्रभाव मौजूद था , लोक कला समय के गुज़र जाने के बाद भी बूढी नहीं होती,उसका जादू हमेशा बरकरार रहता है । लोक में नृत्य , गीत , संगीत के साथ साथ रीति रिवाज और उत्सव भी शामिल होते है । हबीब साहब ने एक प्रेम कहानी के माध्यम से बड़ी कुशलता के साथ छत्तीसगढ़ के लोक गीत ,संगीत ,नृत्य , रीति रिवाज और तीज त्योहारों को प्रस्तुत किया है । नाटक में भाषा नहीं है केवल बोली है और मनमोहक दृश्य है या नाटक के दृश्य ही इसकी भाषा है। इस नाटक में दृश्य फूल की तरह खिलते है और संगीत तितली की तरह उस पर मंडराता है | यह नाट्य लेखन का ऐसा प्रारूप है जिसमें अभिनेता को पूरी छूट होती है कि मंच पर जितना खेल सकते हो खेलो , हमारे दृश्य इतने सम्मोहक है , लहजा इतना चटकदार है कि तुम कैसा भी करो एवज में तालियाँ ही बजनी है |

सुभाष मिश्र और रचना मिश्र की जोड़ी ने रायपुर के रंगमंच को गतिशीलता दी
हबीब तनवीर के बाद हबीब तनवीर के शहर रायपुर में हबीब तनवीर की पुण्य तिथी 8 जून को हबीब तनवीर की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में हबीब साहब की दो कृतियाँ देखने का अवसर मिला । दोनों नाटक गाँव के नाँव ससुराल मोर नाव दामाद और पोंगा पंडित उर्फ़ जमादारिन का निर्देशन रचना मिश्र ने किया था , ऐसा निर्देशन कि मानो रचना के चेहरे में खुद हबीब साहब आये हो । रचना मिश्र इस समय ज़बरदस्त लय में है वरना हबीब तनवीर के नाटकों को खेलना हंसी खेल नहीं है । सुभाष मिश्र और रचना मिश्र की जोड़ी ने इस समय रायपुर के रंगमंच में गतिशीलता ला दी है , इनके कलेंडर में विश्राम के लिए कोई तिथी चिन्हित नहीं है ।

नाटक में अभिनेता का अहम
नाटक में अभिनेता का महत्व एक बार फिर साबित हो गया । अभिनेता ही सब को स्थापित करता है ।लेखक की परिकल्पना , निर्देशक के प्रयोग , गायक के स्वर , संगीत की स्वर लहरियां , प्रकाश के बिम्ब , रूप सज्जा , मंच निर्माण , वेश भुषा के तमाम आधुनिक तरीको का इस्तेमाल , उसका महत्व , उसकी उपयोगिता सब कुछ दर्शको तक अभिनेता के माध्यम से ही पहुचते है | नाटक में से मंच सज्जा को निकाला जा सकता है , संगीत को निकाला जा सकता है , प्रकाश के विशेष प्रयोगों को हटाया जा सकता है लेकिन जो नाटक से अभिनेता को निकाल दिया जाए तो फिर कुछ बचेगा ही नहीं।

अभिनेताओं की नई पौध से परिचय
मंच पर अभिनेताओं की नई पौध से परिचय हुआ । रवि शर्मा , ऋषिता दीवान , साकेत साहू , हेमंत यादव , मोनिका जैन , अनुभव मोती , प्रियांश तिवारी , प्रीति नायक ने अपनी क्षमता का भरपूर अहसास कराया है । रवि शर्मा और साकेत साहू ने अभिनय के नये आयाम प्रस्तुत किये । रचना मिश्र के गमले के ये फूल पूरे नाटक में अपनी महक बिखेरते रहे । मंच पर जब नया अभिनेता प्रवेश करता है तब पुराना अभिनेता अपने स्थान से थोडा सा खिसक जाता है , यह हमेशा से होता आया है और हमेशा होता रहेगा ।दामाद की भूमिका में रवि शर्मा का चयन रचना की निर्देशकीय दृष्टि का परिचायक है।
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