शशिभूषण, इंदौर स्टूडियो। ‘नाटक का भविष्य क्या है? इसका जवाब है कि नाटक मारे से नहीं मर सकता’। यह बात शिक्षाविद, लेखक और पूर्व कुलपति प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने कही। वे अभिनव रंगमंडल संवाद श्रंखला में “भारतीय रंगमंच: परंपरा और इतिहास” विषय पर अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। संवाद कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार एवं जलेस उज्जैन के अध्यक्ष प्रो. अरुण वर्मा ने की।
प्रो. त्रिपाठी ने कहा, ‘मनुष्य के साथ आरम्भ से ‘नाट्य’ है। जब तक मनुष्य है और मुझे विश्वास है कि आज भी मनुष्य है, तब तक नाट्य है। नाट्य रहेगा। नाट्य को एक वृक्ष कह सकते हैं। यह साठ हज़ार साल प्राचीन साथ ही प्रयोग नवीन वृक्ष है।’ उन्होंने बताया कि यदि भारतीय रंगमंच की बात करें, तो ‘रंगमंच’ हमारी परंपरा का शब्द नहीं है। संस्कृत में ‘रंगमंच’ के लिए नाट्य शब्द है।
प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने रंगमंच के उद्भव और विकास को सात चरणों में विभाजित किया और प्रत्येक चरण पर विस्तार से प्रकाश डाला। उनके इतिहासपरक, साहित्यिक, आलोचनात्मक और सुचिंतित आख्यान-से व्याख्यान ने भारतीय रंगमंच की हज़ारों साल की सुदीर्घ परम्परा को प्रकट कर दिया। लोक नाट्य से लेकर सिनेमा तक रंगमंच के बारे में उन्होंने अपनी बात रखी। उन्होंने बातचीत जैसी अनौपचारिक शैली में अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया और अपने विचार रखने के लिये कभी कथा कहन, तो कभी भावपूर्ण संवाद शैली का उपयोग किया।
उन्होंने कहा, ‘ब्रिटिश औपनिवेशिक काल ने भारतीय नाट्य को धूमिल किया। मुग़ल शासकों ने नाट्य को प्रोत्साहित किया था। इतिहास में हिंदू राजाओं ने भी मंदिर तोड़े और लूटे हैं। औपनिवेशिकता ने भारतीय सपने को धूमिल कर दिया। उपनिवेशवाद के कीड़े किसी में भी हो सकते हैं। पंडितों के मस्तिष्क कोलोनाइज़्ड मिलते हैं।’
भीम बेटका की गुफा के चित्र नाट्य की स्मृति हैं। जनजातियों में नृत्य, संगीत के साथ अनुभव कथन की स्मृति मिलती है। बीते हुए के बयान में नाट्य है। चित्र में भी नाट्य है। कालिदास ने शिव-पार्वती के विवाह में नाट्य का वर्णन किया है। ऋग्वेद में नाटकीय संवाद हैं। वेद की ऋचाएँ काव्य हैं और कविताएँ पौरुषेय हैं। तो वेद कैसे अपौरुषेय हो सकते हैं? वेदों को हज़ारों साल श्रुति और स्मरण से जीवित रखा गया। संस्कृत में गालियां मिलती हैं। ज़िंदा भाषा में गालियां होंगी। विवाह में गालियां गायी जाती हैं।
थियेटर रिचुअल से उपजा। यज्ञ से नाटक निकला। यज्ञ में अग्नि के चारों ओर लोग आए, समाज इकट्ठा हुआ। यज्ञ एक संस्था थी, उसमें नाटक था। नाट्य में वही घटित होता है जो यज्ञ में। सीमित अहंकार की आहुति देकर असीम हो जाना यज्ञ का उद्देश्य है। नाट्य का उद्देश्य भी यही है- असीम हो जाना। अश्वमेध यज्ञ में घोड़ा छोड़ा जाता। जब तक घोड़ा लौटकर आता, यज्ञ-स्थल पर आख्यान चलते थे। तीन सौ साठ दिन लगातार आख्यान। आख्यान नाट्य है। रामायण-महाभारत महा आख्यान हैं। कुशीलव रामायण सुनाते थे, यह नाट्य है।
ग्रंथिक-ग्रंथ पढ़कर आख्यान सुनाने वाले कहलाए। हिंदुस्तान की आधी संस्कृति सूतों की बनायी हुई है। बौद्धों के समय में भी नाटक थे। सूत कलावंत थे। वो सारथी से लेकर महामंत्री तक होते। कलाकार और विद्वान तो सूत होते ही थे। भरत मुनि ने नाट्य विधान बनाया। उनके कुछ चालू शिष्यों ने शिल्पक किए, उन्हें दंडित किया गया, किंतु कालांतर में ‘नाटक करना मुख्य है’, इस उद्देश्य से उन्हें वापस बुला लिया गया।
यज्ञ की संस्था को विस्थापित करने के लिए मंदिरों की संस्था आई। जिस मंदिर में गीत-संगीत को आश्रय और सहायता न हो, मैं उसे मंदिर नहीं मानता। मंदिरों ने नाट्य को प्रोत्साहित किया। भवभूति के नाटक मंदिरों के यात्रा महोत्सवों में खेले गये। मंदिरों ने नाटकों को आश्रय दिया। नाटक में ही भक्ति भावना असल रूप में प्रकट होती है। नाटक दुनिया की अनुकृति है। इस्लाम मज़हब के रूप में एक बड़ा कल्चर लेकर आया। धर्म के साथ-साथ भारत की संस्कृति के सामने यह संस्कृति की चुनौती थी। भारतीय संस्कृति का विलय हुआ और अनेक सांस्कृतिक शीर्ष निर्मित हुए। उज्जैन विराट नाट्य भूमि रही है। उज्जैन की कालिदास अकादमी के लिए आदिरंगाचार्य का योगदान अतुल्य है। कालिदास अकादमी में आदिरंगाचार्य की मूर्ति लगनी चाहिए।
संवाद की अध्यक्षता कर रहे प्रो. अरुण वर्मा ने बताया कि आम लोगों के लिए नाटक रचा गया। आम लोगों को ध्यान में रखकर भरत मुनि का नाट्य विधान है। हमारा भारत भरत की परंपरा है। दक्षिण भारत का नाट्य विधान नृत्य से जुड़ा है। भारत वैश्विक दर्शन के आदान-प्रदान की रंगभूमि भी रहा है। नाट्य को रूपक भी कहा जाता है। संस्कृत के साथ-साथ वैश्विक दार्शनिक-वैचारिक आदान-प्रदान से भारतीय रंगमंच में प्रगतिशीलता प्रवहमान रही।
संवाद से पूर्व अभिनव रंगमंडल के निदेशक शरद शर्मा और मनोहर वैरागी ने फूल देकर राधावल्लभ त्रिपाठी और अरुण वर्मा का स्वागत किया। विशिष्ट अतिथि डॉ. सत्यवती त्रिपाठी का स्वागत कविता जड़िया ने किया। संवाद का संचालन कवि-कहानीकार शशिभूषण ने किया। उन्होंने व्याख्यान पूर्व विषय प्रवर्तन किया एवं संवाद हेतु कुछ विचारणीय सवाल रखे। संवाद में पूर्व कुलपति प्रो. बालकृष्ण शर्मा, डॉ. जगदीश शर्मा, पिलकेंद्र अरोरा, मुकेश बिजौले, प्रकाश देशमुख, पांखुरी वक़्त आदि उज्जैन के अनेक सुधी जनों की उपस्थिति रही। कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन शरद शर्मा ने किया। आगे पढ़िये – नाटक जब ख़त्म हुआ तब कोई कुछ कहने की हालत में नहीं था https://indorestudio.com/vasaansi-jirnani-play-review-indore-studio-swati-dubey/
मारे से नहीं मरेगा ‘नाटक’ : प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी
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