कला प्रतिनिधि,इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। महाकवि कालिदास रचित नाटक ‘शकुन्तला’ का उज्जैन के कालीदास अकादमी संकुल प्रेक्षागृह में मंचन हुआ। अंकुर रंगमंडल के कलाकारों ने यह प्रस्तुति मालवा की लोकनाट्य कला तुर्रा,कलंगी,माच शैली में दी। इसका निर्देशन प्रसिद्ध मार्च कर बाबूलाल देवड़ा के साथ मिलकर श्री हफीज खान ने किया। मुख्य परामर्श श्रीमती कृष्णा वर्मा का रहा, वे कार्यक्रम में बतौर अतिथि शामिल हुईं। उनके साथ ही श्री प्रकाश बांठिया और श्री व्यास शामिल भी अतिथि थे। संचालन पाखुरी जोशी और सुदर्शन आयाचित ने किया।
‘शंकुतला’ का मालवी में नाट्य रूपांतरण स्व. सिद्धेश्वर सेन और डॉ.भगवतीलाल राजपुरोहित द्वारा किया गया। दुष्यंत के चरित्र के रूप में बाबूलाल देवड़ा,कणव ऋषि के रूप में प्रसिद्ध माचकार सुधीर सांखला,शकुंतला के रूप में माचकार सिद्धेश्वर सेन के परिवार से हीरामणि वर्मा, प्रधान के रूप में अधिराज पवार,तपस्वी के रूप में राजू भाटी,सीमा,वैशाली देशमुख (सहेलियां),वर्षा शर्मा (गौतमी),दीपक और धीवर (भंवरा), शेर और हरिन के रूप में ईवान खा़न एवं भरत में चित्रांश सांखला ने अभिनय किया और लोकनाट्य को माच के रंग में सजा दिया। नये कलाकारों में युवा भजन गायक अजय गांगोलिया, रंगकर्मी ईवान खा़न,वर्षा शर्मा,अधिराज पवार,दीपक एवं चित्रांश बाबूलाल देवड़ा जी से माच का प्रशिक्षण लिया। माच संगीत का संचालन बबलू देवड़ा ने हारमोनियम पर किया। रमेश अस्वार ने ढोलक, पप्पू चौहान और जगदीश देवड़ा,सिंथेसाइज़र पर नीलेश मनोहर एवं नगाड़े पर जयेंद्र रावल ने संगत की। माच की टेंक पर बबलू देवड़ा, इरशाद खान एवं लखन देवड़ा ने साथ निभाया। नाटक के संयोजक सुधीर सांखला रहे। प्रकाश व्यवस्था श्री राजेंद्र चावला ने की रही और मंच सज्जा ईवान खा़न द्वारा की गई।
कुल मिलाकर इस माच प्रस्तुति ने लोकनाट्य कला में एक नया अध्याय जोड़ दिया। प्रस्तुति से यह बात महसूस हुई कि अगर नये और पारंपरिक माचकार मिलकर अगर इस तरह के प्रयोग करते रहें तो माच परंपरा की सार्थकता और प्रतिष्ठा को फिर से स्थापित किया जा सकता है। ‘अंकुर रंगमंडल’ के संस्थापक और निर्देशक हफीज ख़ान ने कहा कि इस नाट्य प्रस्तुति में ख्याल, तुर्रा कलंगी और माच के लोकनाट्य तत्वों का उपयोग किया गया। इस तरह हम इस प्रस्तुति को तुर्रा,कलंगी,खयाल,माच का एक गुलदस्ता भी कह सकते हैं। उन्होंने कहा कि मालवा की लोकनाट्य शैली माच एवं तुर्रा कलंगी लगभग 300 वर्ष पुरानी लोकनाट्य कला है। परंतु यह लोक नाट्य परंपरा अब ख़त्म होती जा रही है। एक समय ऐसा भी था जब मालवा में जहां पहले 40-50 माच एवं तुर्रा कलंगी मंडलियां कार्यरत थी। बहुत कोशिशों के बाद हमने किसी तरह करीब छह कला मंडलियों को नये सिरे से रचनात्मक गति दी है।
माच एवं तुर्रा कलंगी ऐसे लोकनाट्य हैं जो मनोरंजन के साथ इतिहास, संस्कृति और शिक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम रहे हैं। हफीज़ खान ने बताया कि अंकुर रंगमंच,उज्जैन ने पिछले चार दशकों में रंगमंच, शैक्षिक रंगमंच, लोकनाट्य, साहित्य एवं कला माध्यमों को लेकर शिक्षा, साक्षरता, स्वास्थ्य जनविज्ञान और सामाजिक न्याय से जुड़े नाट्य महोत्सव, नाट्य शिविर, कार्यशालायें आयोजित की हैं। दिव्यांगों के साथ ही आदिवासी अंचलों में भी कई नाट्य कार्यशालाओं का आयोजन किया है। इनमें 86-87 में रामलीला महोत्सव,लोकनाट्य माच महोत्सव एवं वाकणकर नमन प्रसंग 1987, सिंहस्थ रंग शिविर 1992, 2004 और 2016 यादगार रहे हैं।

