इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। नाटकों पर समीक्षा लिखने या उसपर टिप्पणी करने से पहले उसकी बुनियादी बातों को जानना चाहिये। भले ही कला पर लिखने वाले रंगमंच के तकनीकी पहलुओं से अनिभिज्ञ हों उनमें सौंदर्य बोध होना चाहिये। कला के प्रति स्वाभाविक दिलचस्पी होना चाहिये। इंदौर स्टुडियो को दिये अपने वीडियो इंटरव्यू में यह बात वरिष्ठ कला समीक्षक बीएस बाजेली ने कही। बाजेली पिछले 15 साल से द हिंदू के लिये कला समीक्षाएं लिख रहे हैं। दिल्ली से प्रकाशित राष्ट्रीय समाचार पत्रों के लिये भी वे रंगमंच गतिविधियों के साथ सिनेमा पर लिखते रहे हैं।
कला पर लिखने वालों की ज़रूरत : बाजेली ने कहा,’ बेशक अच्छे कला समीक्षकों या कला गतिविधियों पर लिखने वालों की बहुत ज़रूरत है। इसपर लिखने वाले और साथ ही कला की समझ रखने वालों की बहुत कमी है। असल में नाटकों पर लिखा जाना इसलिये भी बेहद ज़रूरी है क्योंकि नाटकों के शोज़ बहुत ही कम होते हैं । बड़े से बडे नाटक के भी शोज़ बहुत कम ही हो पाते हैं। ऐसे में इस जीवंत कला के बारे में लिखी जाने वाली बाते ही उसकी याद को संरक्षित करती है। उनकी लिखी बातें ही और लोगों तक पहुंचती है। भविष्य में कला पर शोध करने वाले लोगों का मार्गदर्शन करती है।बाजेली ने कहा, ‘इस काम में रंगमंच के लिये का कर रही सरकारी या ग़ैर सरकारी संस्थाओं को भी मदद के लिये आगे आऩा चाहिये। उन्हें कला पर लिखने वाले लोगों को मान देना चाहिये। साथ ही इस तरह के लेखन में रूचि रखने वाले लोगों को संस्कारित और प्रक्षिशित करने का प्रयास करना चाहिए। इससे कला का ही भला होगा।‘
लोक नाटकों ने जगाई रंगमंच के प्रति रूचि : वरिष्ठ कला समीक्षक ने बताया, कला के क्षेत्र में उनकी दिलचस्पी बचपन में लोक नाटकों की वजह से जागी। रामलीला के आयोजन उनके मन मस्तिष्क में इस रंगमंच कला के प्रति लगाव पैदा करने लगे। दिल्ली आने के बाद राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से जुड़े बीएम शाह और मोहन उप्रेति जैसे रंग निर्देशकों के वे संपर्क में आए। उनके ज़रिये उन्हें मॉर्डन थिएटर के बारे में जानने और समझने का मौका मिला। धीरे-धीरे इस रूचि ने उन्हें लेखन की ओर बढ़ाया। वे रंगमंच पर लिखने लगे।

