शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। दिल्ली में ‘नटसम्राट’ का अभिनय, मंच पर फिर विराट बन गया। नाटक में आलोक चटर्जी के सशक्त अभिनय ने दर्शकों को पूरे 2 घंटे 10 मिनट तक बाँधकर रख दिया। इनमें दिल्ली के रंगमंच कलाकारों के साथ ही युवा दर्शकों की सबसे अधिक संख्या रही। आज के दौर में दो घंटे से अधिक बिना हिले नाटक देखना और हर दृश्य को महसूस करना, आसान बात नहीं है। इस दृष्टि से एकरंग, भोपाल की यह प्रस्तुति अभीभूत करने वाली रही।
परफॉरमिंग आर्ट्स फेस्टिवल में मंचन: संगीत नाटक अकादमी द्वारा आयोजित ‘फेस्टिवल ऑफ परफॉरमिंग आर्ट्स’ में इस नाटक का मंचन किया गया। मेघदूत थियेटर में इस नाटक का मंचन हुआ। मंचन के बाद दर्शकों ने खड़े होकर अभिनेता आलोक चटर्जी और निर्देशक जयंत देशमुख सहित सभी कलाकारों का करतल ध्वनि से स्वागत किया।
संगीत नाटक अकादमी के पुरस्कृत अभिनेता: आपको बता दें, भारत भवन, एनएसडी रंगमंडल और एमपीएसडी के पूर्व निदेशक और वरिष्ठ रंगमंच अभिनेता और निर्देशक आलोक चटर्जी को वर्ष 2019 के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने हाल ही नई दिल्ली के विज्ञान भवन में यह पुरस्कार प्रदान किया। आलोक, देश के इकलौते ऐसे कलाकार हैं जिन्हें वर्ष 2019 में अभिनय में योगदान के लिए पुरस्कार मिला है। वे करीब 350 नाटकों में अभिनय के साथ 125 से अधिक नाटकों का निर्देशन कर चुके हैं।
‘अप्पा’ की व्यथा-कथा 39 वाँ शो: ‘नटसम्राट’ का यह 39 वाँ प्रदर्शन था। यह एक बेहद संवेदनशील नाटक है। नाटक एक ऐसे अभिनेता, गणपत राव रामचंद्र बेलवलकर ‘अप्पा’ की व्यथा-कथा है जो कभी रंगमंच की दुनिया का ‘सम्राट’ रहा है। विसंगति ये है कि मंच पर शेक्सिपयर के लिखे नाटकों के किरदारों को निभाने वाला ये कलाकार ख़ुद अपनी संतानों के चरित्रों को समझ नहीं पाता और उनकी ‘कलाकारी’ से मात खा जाता है। इस व्यथा में ‘एक सच्चा कलाकार और अच्छा इंसान’ अपनी ‘सरकार’ यानी पत्नी को भी खो देता है। आखिर में खुद, दुनिया के इस रंगमंच से चला जाता है। नाटक में अपने किरदार को आलोक इतनी शिद्धत से जीते हैं कि दर्शक अपनी जगह से हिल नहीं पाते।
कलाकारों का समन्वित अभिनय:आलोक चटर्जी के साथ ही सभी कलाकार भी बड़े प्रभावशाली ढंग से अपनी भूमिकाएं निभाते हैं। इनमें बेटी, बेटा, दामाद ,बहू, नातिन, नौकर की भूमिकाएं निभाने वाले सभी कलाकार शामिल हैं। एकरंग, भोपाल की इस प्रस्तुति में रश्मि मुकादम, हरीश वर्मा, ज्योति दुबे, तपस्या, राहुल तिवारी, अंजलि सिंह, प्रतीक शर्मा, आशीष ओझा, हरीश वर्मा, ज्योति दुबे, प्रियेश पॉल ने अभिनय किया है। इनमें से बहुत से कलाकार पहले मंचन से इस नाटक का हिस्सा हैं। यह उनके लिये आज सबसे बड़ी बात भी है। यद्धपि पूरा नाटक ‘अप्पा’ के किरदार पर केंद्रित है।
मर्मांतक और अंतरभेदी संवाद: नाटक के उतार-चढ़ावों के बीच लंबे संवाद भी हैं, जो शेक्सपियर के ही नाटकों किंगलियर,ऑथेलो आदि से लिये गये हैं। आलोक जब इन संवादों को मंच पर परफॉर्म करते हैं, दर्शक विस्मित हो जाते हैं। ऐसे पीड़ादायक, मर्मांतक और अंतरभेदी संवाद या ‘मोनोलॉग’ का नाटक में विशिष्ट घटनाक्रमों के समय आते हैं। ऐसे दृश्यों में आलोक अपनी गर्दन को झटका देकर, एक कलाकार के रूप में अपनी उन भूमिकाओं में चले जाते हैं जो कभी उन्होंने मंच पर जी हैं और उनकी स्मृति अवचेतन में अंकित है।
बेहद सधा और कसा निर्देशन: नाटक की एक और बड़ी विशेषता जयंत देशमुख की परिकल्पना और निर्देशन है। जयंत देशमुख रंगमंच के अभिनेता, निर्देशक और फिल्म इंडस्ट्री के एक प्रतिष्ठित आर्ट डायरेक्टर हैं। उन्होंने इस नाटक को बेहद ख़ूबसूरती से बाँधा हैं। बिना किसी तामझाम के ही, वे दृश्यों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करते हैं। कम प्रॉप्स के साथ कहानी के शक्तिशाली प्रवाह को बनाये रखते हैं। दिल्ली में भी बिना किसी सैट के ही यह नाटक अभिनीत हुआ। मंच के पार्श्व में ज़रूर परिदृश्य के लिये सैट की जगह प्रिटेंट बैनर्स का इस्तेमाल हुआ। इस नाटक का संगीत और गुलज़ार अनुदित गीतनुमा कविताएं नाटक की एक और खूबी है। नाटक में आलोक जब ‘अटकन मटकन’ जैसा गीत गाते वक्त अपनी ख़ास अदा में छाता घुमाते हैं, दर्शक खिल उठते हैं। नाटक में मंच सज्जा – प्रमोद गायकवाड़, प्रकाश परिकल्पना – साऊती चक्रवर्ती, संगीत – उमेश तरकसवार, संगीत संचालन – साहिल का था। आपको बता दें, जयंत देशमुख भारत भवन, रंगमंडल के कलाकार रहे हैं। आपने 45 से अधिक नाटकों में अभिनय और 15 से अधिक नाटकों का निर्देशन किया है।
स्व. विष्णु वामन, श्रीराम लागू को प्रणाम: यह नाटक 2 घंटे 10 मिनट का है। मेघदूत में आये दर्शकों ने नाटक को बिना ब्रेक के लगातार बिना ध्यान हटाये देखा। उनकी तंद्रा तब ही टूटी जब नाटक ख़त्म हुआ। दर्शकों के ज़बरदस्त रिस्पांस पर आलोक चटर्जी ने बड़ी विनम्रता से कहा , ‘इस नाटक के लिये प्रशंसा के असली हक़दार मराठी नाटकों के महान् लेखक श्री विष्णु वामन शिरवाडकर हैं। ये उनका ही कमाल है। उन्होंने 50 साल पहले यह अद्भुत नाटक लिखा था जो आज भी प्रासंगकि है। उन्होंने कहा, ‘इस अवसर पर मैं मराठी के ‘नटसम्राट’ श्रीराम लागू को भी याद कर रहा हूँ। उन्हें प्रणाम करता हूँ। उन्हें मैं फिल्म में अभिनय के लिये नहीं, रंगमंच पर अभिनय के लिये नमन करता हूँ क्योंकि मैं भी रंगमंच का ही कलाकार हूँ। यहाँ यह बताना भी ज़रूरी है कि नाटक का मराठी से हिन्दी में अनुवाद डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने किया है। इस अनुवाद ने मूल पटकथा को जीवंत रखा है। यह इस अनुवाद की बड़ी ख़ूबी है।
प्रो.बनर्जी और सुमन कुमार द्वारा सम्मान: नाटक के मंचन के बाद सभी कलाकारों का आलोक चटर्जी के एनएसडी में साथी रहे, प्रो.अमित बनर्जी और संगीत नाटक अकादमी में ड्रामा विभाग के डिप्टी सेक्रेटरी और कथक केंद्र के डायरेक्टर सुमन कुमार ने अभिवादन किया। रस्म के मुताबिक, कलाकारों का शॉल ओढ़ाकर सम्मान किया गया। आगे पढ़िये –


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