शकील अख़्तर, इंदौर स्टुडियो। ‘रूप भी औरत के लिये अजीब सी आफ़त है..सुंदर हो तो दुनिया सताती है और न हो तो आईना…लेकिन मेरे लिये तो हालात इससे भी बदतर है’। दिल को छू जाने वाला यह मार्मिक संवाद है नाटक ‘शौर्या: मेरी कहानी, मेरी ज़ुबानी’ का। नाटक के वाचन के दौरान नायिका शौर्या के किरदार में जब समृद्धि कुलकर्णी ने इस संवाद को भावानुरूप अभिव्यक्ति दी, दर्शकों की आँखें भर आईं। असाध्य चर्मरोग इक्थियोसिस (ichthyosis) के रोगियों के प्रति संवेदना जगाते इस नाटक का लेखन रंगमंच अभिनेत्री और निर्देशिका प्रियंका शक्ति ठाकुर ने किया है। 5 जनवरी को इस नाटक के वाचन का कार्यक्रम नागपुर के चिटनिस सेंटर स्थित मिमोसा सभागार में संपन्न हुआ। आयोजन सामाजिक,सांस्कृतिक संस्था प्रयास ने किया था।
प्रियंका,हिंदी रंगमंच की नई सशक्त लेखिका: प्रियंका अब तक रंगमंच पर अभिनय के साथ ही निर्देशन के लिये पहचानी जाती रही हैं। परंतु उन्होंने पहली बार अपना नाटक लिखा है। यद्धपि नाटक का मंचन होना अभी बाकी है लेकिन उन्होंने जिस तरह से यह नाटक लिखा है, उसमें दृश्यों और पात्रों की रचना की है, उसमें उनके रंगमंच के अनुभव की झलक साफ़ दिखाई देती है। यह भी निश्चित ही माना जा सकता है कि हिन्दी रंगमंच की दुनिया को एक नई और सशक्त कलम वाली लेखिका का साथ मिल गया है। बड़ी बात यह है कि प्रियंका शक्ति ठाकुर ने यह नाटक एक मकसद के साथ रचा है। बता दें कि प्रियंका ने रंगमंच का सफ़र भोपाल से शुरू किया था, विवाह के बाद से वे नागपुर में हिंदी रंगमंच के लिये काम कर रही हैं। ‘झलकारी’ जैसे नाटक से नागपुर में उन्हें बड़ी पहचान मिली है, महाराष्ट्र राज्य सरकार की तरफ से उन्हें श्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार भी मिल चुका है।
असाध्य बीमारी इक्थियोसिस का शिकार शौर्या : नाटक की नायिका शौर्या खुद इस असाध्य रोग की शिकार है। इस रोग की वजह से उसके पूरे शरीर की त्वचा भद्धी हो गई है। शौर्या इस बीमारी की वजह से बदसूरत नज़र आने लगी है। उससे घर की मेड और यहाँ तक के उसके भाई-बहन घृणा करने लगे हैं। परिवार से लेकर समाज तक यह युवती तिरस्कार,नफ़रत और उलाहनों का दंश अपनी आत्मा पर झेल रही है। हालात इतने बिगड़ते हैं कि एक दिन वह अपना घर छोड़ देने का फैसला कर लेती है। उसे यह भी लगने लगता है कि अगर जन्म से पहले ही उसे कोख में मार दिया जाता तो उसका जीवन नासूर बनने से बच जाता। परंतु अंत में नाटक एक सुखद नतीजे पर पहुंचता है। शौर्या NEET के इम्तेहान में सफल हो जाती है और वह डॉक्टर बनकर इक्थियोसिस बीमारी को लेकर शोध करने और इसके रोगियों की सेवा का इरादा कर लेती है।
अपनों,परायों की परतें खोलता नाटक: नाटक अपने दृश्य क्रम में जैसे-जैसे आगे बढ़ता है, वह परिवार,समाज और ऐसे रोगियों के अंतरमन पर पड़ने वाले असर की परतें खोलता चला जाता है। यहीं पर प्रियंका की सशक्त लेखनी का अंदाज़ा भी लगता है। प्रियंका ने उनसे हुई मुलाक़ात के दौरान बताया- ‘मेरे मन में बहुत से विषय आते-जाते रहते हैं। मैं इस स्किन डिसीज़ को लेकर भी बहुत बेचैन थीं। जब लॉक डाउन में मंचनों का दौर थमा। तब मैंने इस नाटक को लिखना शुरू किया और करीब एक साल में यह नाटक पूरा हुआ।’
पात्रानुकूल मेकअप,वेश धारण कर वाचन: नाटक के वाचन में प्रियंका ने सभी कलाकारों को पात्रों के अनुरूप ही प्रस्तुत किया। उनका मेकअप और कॉस्ट्यूम प्रतीकात्मक रूप से चरित्रानुकूल रहा। शौर्या के साथ ही नाटक के सभी कलाकारों ने अपने पात्रों के अनुकूल वाचन किया। दर्शकों को महसूस हुआ कि वे नाट्यपाठ के साथ नाटक को मंचित होता देख रहे हैं। इस वाचन में लेखिका,निर्देशिका प्रियंका के साथ ही समृद्धि कुलकर्णी श्वेता केवलरामानी,कोमल भालधरे, रौनक पलसापुरे,रोहित कतरे,नचिकेत दामगोरे ने हिस्सा लिया। नाटक की एक और खूबी इसका पार्श्व संगीत रहा। संगीत ने नाटक के पाठ को प्रभावी बनाया। इसे श्री अनिल इंदाने ने संयोजित किया था। किसी वास्तविक चर्मरोगी की तरह ही नायिका शौर्या का मेकअप कार्तिकेय ने किया। इस तरह कम पात्रों और एक घंटे की अवधि वाला यह नाटक दर्शकों के लिये एक यादगार पाठ बन गया। मुझ जैसे तमाम दर्शकों की नाटक को लेकर यही प्रतिक्रिया रही कि ‘शौर्या’ का मंचन जल्द हो और प्रियंका शक्ति ठाकुर यह नाटक ज़्यादा से ज़्यादा दर्शकों तक पहुंच सके, जिसका करूणामयी संदेश है – ‘असाध्य बीमारी के रोगियों से घृणा या नफ़रत नहीं प्यार करो’।
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