हिमांशु राय, इंदौर स्टूडियो। कारवां थियेटर ग्रुप के अभिषेक नारायण, कुलविंदर सिंह बक्शीश और क्यूरेटेड क्लासिक्स के रवि मिश्रा व भाविक शाह ने मिलकर स्व. रतन टाटा को नाट्यांजलि अर्पित करने के उद्देश्य से ‘नाट्य रतन’ नाट्य समारोह का आयोजन किया। अभिषेक नारायण पिछले बीस वर्षों से रंगकर्म में सक्रिय हैं और वर्तमान में मुम्बई में फिल्म एवं रंगमंच के निर्माता के रूप में कार्यरत हैं। स्व. रतन टाटा को अपना आदर्श मानते हुए उन्होंने यह समारोह श्रद्धा की अभिव्यक्ति के रूप में आयोजित किया। समारोह में नाट्य जगत की कई हस्तियां शामिल हुई और महाराज कुमार होजाईगम्बा सिंह को कला क्षेत्र में उनके योगदान के लिये ‘नाट्य रतन सम्मान’ प्रदान किया गया।
समय-सारिणी और विविधता : 25 से 28 दिसंबर 2025 तक आयोजित इस समारोह में कुल बारह नाटकों का मंचन हुआ—प्रत्येक दिन तीन नाटक। समय-सारिणी के अनुसार प्रातः 11:30 बजे, अपराह्न 4:00 बजे तथा रात्रि 8:30 बजे नाटक प्रस्तुत किए गए। चारों दिनों के प्रातः सत्र में मराठी नाटक हुए। कुल 7 मराठी, 4 हिन्दी और 1 अंग्रेज़ी नाटक शामिल थे।
प्रतिबद्ध आयोजन और प्रबंधन: मुम्बई जैसे महानगर में चार दिनों तक बहुभाषी नाट्य समारोह आयोजित करना साहस, प्रतिबद्धता और सुदृढ़ प्रबंधन की मांग करता है। अभिषेक, कुलविंदर, रवि और भाविक के साथ समर्पित कार्यकर्ताओं की बड़ी टीम सक्रिय रही। नौ नाट्य दल बाहर से आए थे, जिनके आवास, भोजन, आवागमन और मंचन की सभी सुविधाएँ सुनिश्चित की गईं। प्रचार-प्रसार और दर्शक संख्या बढ़ाने के लिए भी व्यापक प्रयास किए गए।
स्थल और दर्शक प्रतिक्रिया: माटुंगा स्थित यशवंत नाट्य मंदिर जैसे प्रतिष्ठित स्थान पर आयोजित इस समारोह में पहले वर्ष होने के बावजूद बड़ी संख्या में दर्शक उपस्थित रहे। आयोजक टीम द्वारा नाटकों का चयन सोच-समझकर किया गया था। मराठी नाटकों ने विशेष रूप से प्रभावित किया। हिन्दी नाटकों में पौराणिक पात्रों पर केंद्रित प्रस्तुतियाँ थीं, जबकि मराठी नाटकों में विषयगत विविधता और समकालीन संवाद स्पष्ट दिखाई दिया।
कई प्रतिष्ठित हस्तियां आमंत्रित: समारोह को चर्चित बनाने के लिए अनेक प्रतिष्ठित हस्तियों को आमंत्रित किया गया। प्रख्यात अभिनेता दिलीप जोशी, परेश रावल, अनिल रस्तोगी, मीता वशिष्ठ; गायक रूप कुमार राठौर; गीतकार स्वानंद किरकिरे; निर्देशक चंद्रकांत कुलकर्णी, विजय केंकरे, वामन केंद्रे; वरिष्ठ साहित्यकार भालचंद्र नेमाडे; निर्माता विद्याधर पठारे, रणधीर रंजन रॉय तथा कला प्रबंधक हिमांशु राय सहित अनेक अतिथि उपस्थित रहे।
मद्यपि-समाज में असमानताओं पर व्यंग्यात्मक दृष्टि: पहले दिन के प्रातः सत्र में मकरंद देशपांडे द्वारा लिखित, निर्देशित और अभिनीत एकल नाटक ‘मद्यपी’ का मंचन हुआ। इस नाटक में अमीर और गरीब शराबियों के माध्यम से समाज में व्याप्त असमानताओं की पड़ताल की गई। मकरंद की व्यंग्यात्मक और विनोदी भाषा दर्शकों को हँसाते हुए सोचने पर विवश करती है। यह नाटक समाज को आत्ममंथन की दिशा में प्रेरित करता है।
बोहाडा- जनजातीय परंपरा और रामायण-महाभारत का लोक रूप: दोपहर के सत्र में मराठवाड़ा मित्रमंडळाचे शंकरराव चव्हाण विधि महाविद्यालय, पुणे द्वारा मराठी नाटक ‘बोहाडा’ प्रस्तुत किया गया। ‘बोहाडा’ महाराष्ट्र के पालघर, ठाणे और नासिक जिलों की कुछ जनजातियों की लोक परंपरा है, जिसमें देवी-देवताओं के जुलूस के माध्यम से रामायण और महाभारत की कथाएँ प्रस्तुत की जाती हैं। मुखौटों के प्रभावी प्रयोग, सशक्त कथा-सूत्र और जीवंत ऊर्जा से भरी इस प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
महादेव-अभिनेत्रियों द्वारा साकार पौराणिक त्रयी का तीसरा भाग: पहले दिन के रात्रि सत्र में ‘महादेव’ का मंचन हुआ, जिसे अभिषेक नारायण, सम्पत कुमार राठौर और कुलविंदर सिंह बक्शीश ने प्रस्तुत किया। लेखक आशुतोष द्विवेदी और निर्देशक कुलविंदर सिंह बक्शीश की इस प्रस्तुति की मूल परिकल्पना महाराज कुमार होजाईगम्बा सिंह की है। मीता वशिष्ठ ने शिव के रूप में एक खिलंदड़े, मानवीय और आकर्षक शंकर को साकार किया। संगीत, नृत्य, प्रकाश और मेकअप का सशक्त संयोजन इस प्रस्तुति को अविस्मरणीय बनाता है।
जॉयराइड-अपराधबोध और स्मृति की मनोवैज्ञानिक पड़ताल: दूसरे दिन के प्रातः सत्र में ‘आसक्त’, पुणे द्वारा प्रस्तुत मराठी नाटक ‘जॉयराइड’ का मंचन हुआ। विभावरी देशपांडे द्वारा लिखित और सुयोग देशपांडे द्वारा निर्देशित यह नाटक जर्मन नाटक ‘रिस्पेक्ट’ पर आधारित है। बीस वर्ष पूर्व घटित एक भयावह घटना और उसके मनोवैज्ञानिक प्रभावों को फ्लैशबैक और वर्तमान संवादों के माध्यम से उकेरा गया।
पालखी- वारी परंपरा का आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व: 26 दिसंबर को परिवर्तन समूह, जलगांव द्वारा प्रस्तुत ‘पालखी’ लेखक-निर्देशक शंभू पाटील की सशक्त प्रस्तुति रही। यह नाटक शोधकर्ता डी. बी. मोकाशी के वास्तविक जीवन अनुभवों पर आधारित है और वारी परंपरा की आध्यात्मिक एवं सामाजिक महत्ता को रेखांकित करता है।
कनुप्रिया -धर्मवीर भारती की काव्यात्मक व्याख्या: दूसरे दिन के रात्रि सत्र में कला समूह, ग्वालियर द्वारा प्रस्तुत ‘कनुप्रिया’ धर्मवीर भारती की काव्य रचना पर आधारित थी। निर्देशक महाराज कुमार होजाईगम्बा सिंह ने इसे नृत्य, संगीत और प्रतीकों के सहारे प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।
इथेच टाका तंबू – नैतिकता और आत्मबोध की संवेदनशील यात्रा: 27 दिसंबर के प्रातः सत्र में यशवंतराव चव्हाण महाराष्ट्र मुक्त विद्यापीठ, नाशिक कला केंद्र द्वारा प्रस्तुत ‘इथेच टाका तंबू’ एक सशक्त और मानवीय कहानी रही। दत्ता पाटिल द्वारा लिखित और सचिन शिंदे द्वारा निर्देशित इस नाटक ने नैतिकता, अपराधबोध और आत्मबोध की यात्रा को हास्य और संवेदना के साथ प्रस्तुत किया।
तुझे हसू आरशात आहे – मधुबाला के जीवन का आत्मसंघर्ष: 27 दिसंबर को अपराह्न सत्र में ‘तुझे हसू आरशात आहे’ का मंचन हुआ। रवि मिश्रा की परिकल्पना और सुनील हरिश्चंद्र के लेखन-निर्देशन में यह नाटक मधुबाला के जीवन और आत्मसंघर्ष की संवेदनशील पड़ताल करता है।
श्री लीला-राधा की दृष्टि से श्याम का दिव्य अनुभव: तीसरे दिन के रात्रि सत्र में अतुल सत्य कौशिक द्वारा लिखित और निर्देशित ‘श्री लीला’ एक भव्य नृत्य-नाट्य प्रस्तुति रही। राधा की दृष्टि से श्याम को देखने वाली यह कथा प्रेम, विरह और भक्ति का दिव्य अनुभव रचती है।
पॉपकार्न -समकालीन पारिवारिक मूल्यों पर विचारोत्तेजक प्रस्तुति: 28 दिसंबर के प्रातः सत्र में विवेक बेळे द्वारा लिखित और निर्देशित ‘पॉपकार्न’ एक समकालीन, विचारोत्तेजक पारिवारिक नाटक रहा। आनंद इंगळे सहित सभी कलाकारों के सशक्त अभिनय और सुदृढ़ कथानक ने दर्शकों को अंत तक बाँधे रखा।
आखिरी वसंत – अप्रत्याशित मोड़ से दर्शकों को सोचने पर विवश करता नाटक: चौथे दिन के अपराह्न सत्र में लखनऊ दर्पण द्वारा प्रस्तुत ‘आखिरी वसंत’ का मंचन हुआ। शुभदीप राहा द्वारा लिखित और निर्देशित इस नाटक में वरिष्ठ अभिनेता अनिल रस्तोगी की उपस्थिति इसे विशेष बनाती है। कथानक का अप्रत्याशित मोड़ दर्शकों को सोचने पर विवश करता है।
कर्ण – अंग्रेज़ी प्रस्तुति में लोक कलाओं का अद्भुत प्रयोग: समारोह का अंतिम नाटक ‘कर्ण’ अंग्रेज़ी भाषा में प्रस्तुत किया गया। कुलविंदर सिंह बक्शीश के निर्देशन में तीन महिला कलाकारों द्वारा प्रस्तुत यह नाटक मयूरभंज छाऊ और मणिपुर मार्शल आर्ट जैसी लोक कलाओं के प्रयोग से विशिष्ट बन पड़ा।
होजाईगम्बा सिंह को ‘नाट्य रतन सम्मान’: अंतिम दिन 28 दिसंबर को ‘कर्ण’ के मंचन के पश्चात नाट्य समारोह का समापन हुआ। 28 दिसंबर को स्व. रतन टाटा का जन्मदिन भी है, इस मौके पर मुख्य अतिथि महाराज कुमार होजाईगम्बा सिंह के हाथों केक काटा गया। साथ ही श्री होजाईगम्बा सिंह को मीता वशिष्ठ द्वारा ‘नाट्य रतन सम्मान’ प्रदान किया गया, जिसमें एक लाख रुपये की राशि वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल रस्तोगी ने उन्हें भेंट की।
नाट्य समारोह में अतिथियों का अभिनंदन: नाट्य रतन समारोह में आये अतिथियों हिमांशु राय और आशुतोष द्विवेदी को स्मृति-चिह्न देकर उनका अभिनंदन किया गया। आपको बता दें कि ‘नाट्य रत्न पुरस्कार’ सेवा, करुणा और नैतिकता के मूल्यों को समर्पित एक पवित्र सम्मान है। यह हर वर्ष देश के एक विशिष्ट व्यक्तित्व का चयन कर यह सम्मान प्रदान किया जाता है। (लेखक हिमांशु राय प्रतिष्ठित लेखक, कला प्रबंधक और विवेचना,जबलपुर के सचिव हैं। नाट्य रतन उत्सव के लिये आप विशेष तौर पर मुंबई के इस आयोजन में शामिल हुए।) आगे पढ़िये – कला फ्यूज़न प्रदर्शनी: कला और क्राफ्ट का जीवंत संगम https://indorestudio.com/kala-fusion-kala-craft-chandigarh/
मुंबई में ‘नाट्य रतन’ उत्सव : 12 नाटकों का बहुभाषी रंगारंग मेला
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