Saturday, May 9, 2026
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नायाब हिंदी ग़ज़लों का संग्रह – ‘हिंदकी’, 39 रचनाकारों की संग्रहणीय पुस्तक

शकील अख़्तर, इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिये / कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये .…हिंदी ग़ज़ल संग्रह – ‘हिंदकी’ में दुष्यंत कुमार की यह मशहूर ग़ज़ल स्मृति शेष के रूप में ली गई है। इसका रायपुर में हाल ही में विमोचन छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने किया है। इस ग़ज़ल संग्रह में 39 रचनाकारों की ग़ज़लें शामिल की गई है। सभी की चार-चार ग़ज़लें इसमें पढ़ी जा सकती हैं। यह ऐसी ग़ज़लें हैं जो आज के दौर का हाल सुनाती हैं। वक्त और हालात का तप्सरा करने के साथ ही राह दिखाती हैं। सोचने पर मजबूर करती हैं। इस विशिष्ट संग्रह का संपादक प्रख्यात साहित्यकार डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’ ने डॉ. सुधीर शर्मा के साथ किया है। इसमें आप दोनों के दो महत्वपूर्ण लेख भी हैं जो हिंदी ग़ज़ल के इतिहास पर प्रकाश डालते हैं, नये दौर की ग़ज़लों के तेवर पर अपनी बात रखते हैं। आवरण सज्जा कन्हैया साहू की है। कुल 136 पेज के इस विशिष्ट संग्रह को वैभव प्रकाशन,अमीन पारा,पुरानी बस्ती,रायपुर,छत्तीसगढ़ से मंगवाया जा सकता है। मूल्य मात्र 200 रूपये है। यहां पर हम पाठकों के लिये संग्रह में शामिल कुछ ग़ज़लों के मिसरे साझा कर रहे हैं। ताकि संग्रहणीय संकलन का अंदाज़ा लग सके।

बता ऐ लेखनी तू ही क्या अब क्या लिखा जाए/ लिखा ऐ वक्त जो हम से वही लिखा जाए / डरे सहमे हुए हैं सब न सच को सच लिखा जाए / अगर नंगा है राजा तो उसे नंगा लिखा जाए – चंद्रसेन विराट

मैं कुछ बेहतर ढूंढ रहा हूं / घर में हूं घर ढूंढ रहा हूं -विज्ञान व्रत

होने लगे ख़याल हैं खूंखार इन दिनों / हैं ख़ूं से तर-बतर तेरे अशआर इन दिनों / वो है पुराना झूठ नया बनके छप रहा है/पढ़िये जनाब शौक से अख़बार इन दिनों – कुमार नयन

वो ही जीवन महान जीते हैं / जो सदा वर्तमान जीते हैं / जिनकी पूजा,नमाज़, पर-सेवा /’वेद ‘जीते ‘कुरान’जीते हैं – नासिर अली ‘नदीम’

सफ़र की सोचना, सर मत झुकाना घर के आगे / बहुत से रास्ते हैं और भी दीवार के आगे- कृष्ण सुकुमार

यूँ तो रहबर लगता है / लेकिन उससे डर लगता है / तुझको लगता होगा ईश्वर / मुझको तो पत्थर लगता है – अश्वघोष

प्यार की फ़सल बो गये / आदमी वो किधर को गये – जगदीश तिवारी

सुकूँ अब किसी भी शहर में नहीं है / ग़ज़ल की बहर में नहीं है – छत्रपाल जादौन

बेमियादी क़ैद मुझको दी गई / इस तरह सुनवाई मेरी की गई – मंजूषा मन

संग्रह में हर ग़ज़ल बेहद उम्दा और मार्के की है। पूरी शिद्दत से लेखकीय दायित्व का निर्वहन करती महसूस होती हैं। संग्रह में जिन और रचनाकारों की ग़ज़लें पढ़ने को मिलेगीं, उनके नाम हैं –

दीपक ‘दानिश’, मुकुंद कौशल, रामेश्वर वैष्णव, राम किशोर नाविक, लक्ष्मण दुबे, डॉ.कृपाशंकर शर्मा ‘अचूक’, प्रताप नारायण ‘प्रताप’,विजय राठौर,जयप्रकाश श्रीवास्तव, डॉ. बृजेश सिंह, रघुनाथ मिश्र ‘सहज’, सत्य प्रसन्न राव, अजय विश्वकर्मा ‘शान’, अनुराग सिंह नागपुरे ‘अनुराग’,संतोष झांकी, युनूस दानियालपुरी, कृष्ण रंजन ( स्मृति शेष), हाजी डॉ.एच.आर सैयद, चाँद मुबारक ‘चाँद’ कुरैशी, रमेश राही, सुदेश कुमार मेहर, अशोक कुमार नीरद, लक्ष्मण मस्तुरिया,चित्तरंजन कर । 

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