प्रसन्ना की ‘थियेटर वर्कशॉप’: एक्टर्स के लिये क्यों है ख़ास?

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विनीत तिवारी, इंदौर स्टूडियो। भारतीय रंगमंच की दुनिया में जब प्रशिक्षण और अभिनय की गहरी समझ की बात होती है, तो प्रसन्ना का नाम बड़े सम्मान और जिज्ञासा के साथ लिया जाता है। वे सिर्फ़ एक निर्देशक नहीं, बल्कि एक विचारक, एक गुरु और एक आंदोलनकारी हैं, जिन्होंने अभिनय की एक ऐसी पद्धति को जन्म दिया जो पूरी तरह से भारतीय मिट्टी से जुड़ी है। युवाओं के लिये आज उनकी थियेटर वर्कशॉप का ख़ास महत्व है। उनके सिखाने की शैली कुछ ऐसी है, जो युवाओं को पसंद भी आती है और उन्हें प्रेरित भी करती है। प्रसन्ना की कार्यशालाएँ मुंबई से लेकर इंदौर और देश के छोटे-छोटे शहरों तक में आयोजित होती रहती हैं, और नई पीढ़ी के युवा और बाकी आर्टिस्ट उन्हें देखने, सुनने और उनसे सीखने के लिए उत्सुक रहते हैं। प्रसन्ना उन्हें भविष्य का स्टार बनने पर या एक सच्चा कलाकार या एक्टर बनने की प्रक्रिया बताते हैं। उदाहरण के लिये – पहले की फिल्मों में रोहिणी हट्टंगड़ी, स्मिता पाटिल, शबाना आज़मी, दीप्ति नवल, संजीव कुमार, नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, फारूख़ शेख़ जैसे कलाकार होते थे- जिन्हें हेमा मालिनी, श्रीदेवी, माधुरी दीक्षित, अमिताभ, धर्मेंद्र, अनिल कपूर, जैसे स्टार अभिनेत्रियों और अभिनेताओं से अलग किस्म का सम्मान हासिल होता था। ये एक्टर्स स्टार नहीं, लेकिन ‘असली कलाकार’ माने जाते थे। स्टार जनता में ज़्यादा लोकप्रिय होते थे – लेकिन कलाकारों को आदर स्टार भी देते थे। वही आज भी है, आज भी नवाजुद्दीन सिद्दीक़ी, पंकज त्रिपाठी, इरफ़ान ख़ान, मीता वशिष्ठ जैसे कई नाम हैं-िजिन्हें रियल एक्टर माना जाता है। ये सभी प्रसन्ना से प्रभावित रहे हैं। प्रसन्ना का ये कहना युवाओं को अच्छा लगता है कि कामयाबी पैसा या शोहरत हासिल कर लेने में नहीं है – बल्कि करते रहने में है। वे युवाओं को फ़िल्मों में काम करने के लिये मना नहीं करते लेकिन रंगमंच पर लगातार काम करते रहने पर ज़ोर देते हैं। उनकी नज़र में नाटक करना अपने कलाकार को और अपने भीतर के इंसान को मांजते रहना है जो एक अभिनेता के होने की ज़रूरी शर्त है। आज का युवा कलाकार विदेशी या वेस्ट की एक्टिंग टेक्निक्स (जैसे स्टैनिस्लावस्की) से परिचित है, लेकिन वह अपनी जड़ों से उतना नहीं। प्रसन्ना की थियेटर वर्कशॉप में युवा कलाकारों को यही मौका मिलता है। वे वेस्टर्न तकनीकों या एक्टिंग के स्कूल को नकारते नहीं हैं लेकिन वे नाट्य शास्त्र, लोक कलाओं, योग और आसपास के लोगों को लेकर एक ऐसी ‘भारतीय विधि’ सिखाते हैं, जो युवाओं को अपनी और सहज लगती है, आकर्षित करती है। प्रसन्ना अभिनय के भारी-भरकम और अकादमिक सिद्धांतों की जगह- उसे शरीर, श्रम और रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जोड़ते हैं। वे एक कुम्हार, एक बुनकर या एक किसान के काम करने की लय में अभिनय के रहस्य को खोजते हैं। यह नज़रिया एक्टर्स को ज़्यादा प्रैक्टिकल और सहज लगता है। वे इन बातों को आसानी से अपनी रिहर्सल या अभ्यास में शामिल कर सकते हैं। प्रसन्ना श्रम को जीवन का सहज हिस्सा बना देते हैं।प्रसन्ना अभिनेता को सिर्फ एक कलाकार नहीं, बल्कि एक ‘शिल्पी’ (Craftsman) मानते हैं। जैसे एक शिल्पी रोज़ अपने औज़ारों के साथ रियाज़ करता है, वैसे ही अभिनेता को अपने शरीर और आवाज़ के साथ रोज़ श्रम करना चाहिए। यह विचार अभिनय को एक गंभीर, अनुशासित और सम्मानजनक पेशे के रूप में देखने के लिए प्रेरित करता है।सिर्फ़ अपने संवाद रटकर उन्हें थोड़े हाव-भाव के साथ बोल देना भर कलाकार या अभिनेता का काम नहीं है। उसे देश-विदेश और समाज के बारे में पढ़ा हुआ होना चाहिए, जीवन के बारे में उसका सही नज़रिया होना चाहिए। प्रसन्ना यह सब बातें वर्कशॉप्स या क्लासेस के दौरान बताते हैं। इस तरह बताते हैं कि समाज, राजनीति और अपने आसपास के वातावरण को जानने में कलाकारों की दिलचस्पी पैदा हो जाए। प्रसन्ना की वर्कशॉप केवल लेक्चर नहीं होतीं। वे सवालों-जवाबों से भरी होती हैं। वे हर कलाकार पर ध्यान देते हैं और उन्हें अपने भीतर के कलाकार को खोजने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। यह इंटरैक्टिव तरीका युवाओं को बहुत आकर्षित करता है। सबसे मुश्किल होता है सहज अभिनय। प्रसन्ना एक एक्टर को यह नहीं बताते कि क्या करो, बल्कि वे देखने की उस प्रक्रिया से गुजारते हैं जिसके बाद किसी किरदार में उतरना -एक कलाकार के लिए सहज हो जाता है।प्रसन्ना का परिचय और कला सफ़र: प्रसन्ना कर्नाटक के एक प्रमुख रंगमंच निर्देशक, कार्यकर्ता और लेखक हैं। नाटक के साथ अपने लगाव के कारण उन्होंने IIT की पढ़ाई छोड़कर प्रतिष्ठित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD), दिल्ली से स्नातक किया। 70 के दशक में उन्होंने कर्नाटक में ‘समुदाय’ नामक एक थिएटर समूह की स्थापना की, अनेक नाटकों का निर्देशन किया। फिर वे शहरी थिएटर से दूर कर्नाटक के हेग्गोडु गाँव में बस गए। यहाँ उन्होंने ‘चरखा’ नामक एक संस्था की स्थापना की, जो ग्रामीण कारीगरों और बुनकरों के साथ काम करती है। उन्हें IPTA का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया। उन्होंने इप्टा के साथ देश के 20 राज्यों में “ढाई आखर प्रेम” सांस्कृतिक यात्रा निकाली थी। इस रंग गुरू को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित कई प्रतिष्ठित रंग- सम्मानों से नवाज़ा गया है। उनकी पुस्तक ‘इंडियन मेथड इन एक्टिंग’ अभिनय प्रशिक्षण के क्षेत्र में एक मील का पत्थर मानी जाती है। नई किताब “एक्टिंग एंड बियोंड” हाल ही में पब्लिश हुई है। (लेखक विनीत तिवारी वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी, लेखक और रंग आलोचक हैं। वे इंदौर में प्रसन्ना की थियेटर वर्कशॉप का समन्वयन कर चुके हैं।) प्रसन्ना पर जारी इस लेख के अगले भाग में पढ़िये – क्या है प्रसन्ना के ‘थियेटर एक्टिंग’ मे सफलता के सूत्र?  

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