कला प्रतिनिधि,इंदौर स्टुडियो। शायर नज़ीर अकबराबादी इसलिये एक बेनज़ीर शायर हैं क्योंकि उनकी शायरी में हिंदुस्तानी तहज़ीब की महक है। उनकी पूरी शायरी हिंदुस्तानी माहौल में सांस लेती नज़र आती है। उनसे पहले उर्दू शायरी में भारतीय माहौल और हिन्दुस्तानी अवाम की ज़िंदगी इस तरह पेश नहीं की गई कि जिसमें ज़िंदगी के तमाम रंग नज़र आयें। यह बात मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी की निदेशक डॉ.नुसरत मेहदी ने कही। वे उर्दू ड्रामा फेस्टिवल में नज़ीर अकबराबादी की ज़िदंगी पर आधारित नाटक “नज़ीर तू बेनज़ीर” के मंचन से पहले दर्शकों को संबोंधित कर रही थीं।
नज़ीर की नज़्मों में जीती-जागती ज़िंदगी: डॉ.नुसरत मेहदी ने कहा, ‘शायर नज़ीर की नज़्मों में अवामी ज़िंदगी जीती-जागती, हँसती-बोलती और चलती-फिरती नज़र आती है। साथ ही दरबारों, शहरों, बाज़ार, ख़ानख़ाहों और मंदिरों की रौनक़ और चहल-पहल भरपूर दिखाई देती है। उन्हें भारत के ज़र्रे-ज़र्रे से बेपनाह मोहब्बत थी। इसलिए उन्होंने भारत के त्योहारों, मेलों-ठेलों और धर्म गुरुओं की शान में बहुत नज़्में लिखीं। उन्होंने जहां ईद, शबे-बारात, और हज़रत सलीम चिश्ती पर नज़्में लिखी,वहीं होली, दिवाली, राखी, कन्हैया जी, राम, कृष्ण जी, बलदेव जी और गुरु नानक पर भी नज़्में लिखीं। “नज़ीर तू बेनज़ीर” नाटक में उनकी शायरी के साथ उनके किरदार को शामिल किया जाना बड़ी ख़ूबी की बात है।
कामयाब रहा नाटक का मंचन : डॉ.नुसरत के संबोंधन के बाद नाटक का प्रभावी मंचन हुआ। मंच पर मुख्य कलाकारों के रूप में योगेश तिवारी, अनूप शर्मा, निधि दीवान, तलत हसन, शिव कटारिया, पुष्पेन्द्र सिंह राहुल सिंह नज़र आये। नज़्मों की संगीतमयी प्रस्तुति इस नाटक की एक और ख़ूबी रही। नाटक का लेखन डॉ.रिज़वान उल हक़ ने किया। निर्देशन राजीव सिंह ने किया। सहायक निर्देशक सौरभ परिहार और प्रिया भदौरिया रहे।
नाटक में मुख्य किरदार के रूप में ख़ुद नज़ीर अपनी शेरो शायरी और ज़िदंगी पर बात करते हैं। अवाम से कही अपनी गईं नज़्में सुनाते हैं। इनमें आदमी नामा, बंजारा नामा मुफ़लिसी, बरसात की बहारें, होली जैसी नज़्में रहीं। आदमी नज़्म में वे कहते हैं –
दुनिया में पादशह है सो है वो भी आदमी
और मुफ़्लिस-ओ-गदा है सो है वो भी आदमी
ज़रदार-ए-बे-नवा है सो है वो भी आदमी
नेमत जो खा रहा है सो है वो भी आदमी
नाटक नज़ीर के ज़रिये न सिर्फ उनके दौर के हिंदुस्तानी मसाइल और माहौल की बात करता है। बल्कि आपसी मेल-मिलाप और मुहब्बत का पैग़ाम भी देता है। नाटक के अंत में सभी कलाकारों का उर्दू अकादमी की तरफ से इस्तकबाल किया गया।

