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शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। पद्मश्री नीलम मानसिंह चौधरी द्वारा निर्देशित नाटक ‘हयवदन’ वो नहीं है जो मंच पर पहले की प्रस्तुतियों में देखा गया है। नीलम जी का ‘हयवदन’ गिरीश कर्नाड के नाटक और बीवी कारंत के संगीत को साथ लेकर तो चलता है, परंतु अपने प्रयोग में यह नाटक खुदको नई तरह से परिभाषित करता है। इसलिये यह अलग और अनूठा है। नाटक में लोक अभिव्यंजना के साथ आधुनिक नाटक के तत्व हैं। 40 साल पुराने नाटक की कहानी ऐसी है, जो हर स्त्री-पुरूष के मन में कभी ना कभी घटती है। मन और मस्तिष्क की ऐसी जंग जिसमें एक अधूरा और खालीपन हमेशा रह जाता है। इस नाटक का मंचन महिन्द्रा एक्सलेंस इन थियेटर अवार्ड एंड फेस्टिवल के तहत श्रीराम सेंटर में हुआ।
नई रंग कल्पना से सजा नाटक: दिग्गज रंग हस्ती नीलम मानसिंह का यह नाटक एक नई रंग कल्पना और साज-सज्जा के साथ मंच पर आता है। नाटक में सेक्सोफोन का प्रयोग, एक पद्मिनी के लिये दो अभिनेत्रियों की मौजूदगी, दूल्हे की तरह सजे घोड़े के मुख वाला पात्र हयवदन, गुड़ियों और मां काली की नई अभिव्यक्तियां और सैट की जगह घूमने वाले रंग-बिरंगे ट्रक को देखकर आप चौंक सकते हैं। नाटक का अंत भी नई दृष्टि लेकर आता है। जहां पदमिनी बदली देह और मस्तकों वाले कपिल और देवदत्त को छोड़कर चली जाती है।
कला मंडली का ठौर-ठिकाना ट्रक: नाटक में ट्रक को इसके कलाकारों का ठौर-ठिकाना बनाया गया है। इसमें ट्रक के ऊपर संगीत कलाकारों के बैठने की जगह है। वहीं सामान रखने वाले स्थान पर नाटक में विभिन्न भूमिकाएं निभाने वाले कलाकारों का डेरा है। इसी में उनके वेश-विन्यास की पेटियां हैं। वहीं पर वे तैयार होते हैं। कपड़े बदलते और प्रॉपर्टीज़ लाते, ले जाते हैं। बदलते दृश्यों के साथ मंच के अगले हिस्से में आकर, नाटक को अभिनीत करते हैं।
दो अभिनेत्रियों की सुविचारित मौजूदगी: नाटक की नायिका तो एक ही है – पदमिनी। मगर इसके लिये दो अभिनेत्रियों की मौजूदगी भी सुविचारित है। दोनों महिला कलाकारों की कल्पना – पद्मिनी के शरीर और मनोभावों के साथ ही बहुत से मंच के बहुत से क्रियाकलापों को सुचारू रूप से चलाने के लिये की गई है। संवाद भी बांटकर या साथ में बोले गये हैं। कहने की ज़रूरत नहीं इस तरह के प्रयोग रंगमंच पर दिखाई देने लगे हैं।
संवादों की बुनावट में नयापन: नाटक में कथ्य वही है लेकिन अभिनय और संवादों की बुनावट में नयापन है। इसमें काली माता या गुड़ियों की अभिव्यक्ति में लोक नाट्य परंपरा और उसका जादूई तालमेल है, मगर प्रस्तुति और अभिनय अलग है। इसमें कलाकारों की अपनी अभिनय प्रतिभा और इम्प्रोवाइज़ेशन का योगदान है। नाटक का मूल कथ्य वही है कि ‘पूर्णता केवल एक स्वपन या कल्पना है’। प्रश्न भी वही है कि ‘शक्तिशाली कौन है – शरीर या मस्तिष्क’? नायिका पदमिनी को कौन चाहिये – बलशाली शरीर वाला कपिल या बुद्दि से भरा देवदत्त? या फिर दोनों या फिर कुछ नहीं। (बीवी कारंत निर्देशित ‘हयवदन’ की फाइल फोटो। रंगमंडल, भारत भवन के कलाकारों की प्रस्तुति।)
बीवी कारंत ने किया था मंचित: यह नाटक 1970 में कन्नड़ में आया था और उसके बाद इसे लोकनाट्य के तत्वों को लेकर ही मंच पर बीवी कारंत ने मंचित किया था। इसमें भारत भवन के कलाकारों ने काम किया था। वह नाटक मुझे अब भी याद है। इसी तरह से ‘दिशांतर’ ने भी इस नाटक को दिल्ली में खेला था। बाद के दिनों में इसे रामगोपाल बजाज ने कोलकाता में किया। इस नाटक के बारे में नीलम जी कहती हैं- ‘उन्हें यह एनएसडी के दिनों से प्रेरित करता रहा है। उनकी फेहरिस्त में यह नाटक हमेशा से शामिल रहा। पिछले साल जब ‘भूमिजा ट्रस्ट द्वारा आद्यम थियेटर फेस्टिवल’ के लिये नाटक तैयार करने का अवसर आया। तब मैंने चंडीगढ़ में ‘हयवदन’ की तैयारी शुरू की। हर बार की तरह रिहर्सल करते-करते नाटक को जीने और इसके नये सिरों को खोजने की कोशिशें शुरू हुईं’।
प्रतिभाशाली कलाकारों का साथ मिला: नीलम जी ने कहा – ‘हयवदन की बड़ी खूबी इसमें निहित नाटकीय संभावनाएं हैं। नाटक परंपरागत कथ्य और यथार्थवाद दोनों को जोड़ता है। मैं खुशनसीब हूँ कि मुझे इस नाटक में बहुत से प्रतिभाशाली कलाकारों का साथ मिला और इसकी नई कल्पना के साकार हो सकी। यह नाटक जितना मेरे अंतर्मन को छूता है, मुझे लगता है, दर्शकों को भी यह उतनी ही गहराई से उद्वेलित करता है’। (नाटक के संगीतकार आमोद भट्ट के साथ उनकी गायिका पत्नी सुभश्री।)
जीवंत हुआ कारंत जी का संगीत: नाटक में बीवी कारंत के संगीत को आमोद भट्ट ने फिर से जीवंत किया है। भारत भवन में रहते हुए आमोद और उनकी पत्नी सुभश्री इस नाटक के संगीत में शामिल थे। दोनों ही कारंत जी की नाट्य संगीत परंपरा को अपने संगीत में संजोये हुए हैं। दोनों ही कारंत जी के संगीत के अलग कार्यक्रम भी करते रहे हैं। नीलम जी ने उनके इसी अनुभव का नाटक में लाभ लिया है। (नाटक के बाद के कुछ पल: तस्वीर में नीलम जी के साथ आमोद भट्ट, सुभश्री भट्ट, पूर्वा और शकुन बंसल और लेखक शकील अख़्तर।)
धुनों के ताने में नई उपज का भाव: आमोद भट्ट ने कारंत जी की धुनों को संजोने के साथ ही इसमें नाटक के अनुरूप में नयापन भी सहेजा है। बड़ी बात ये भी है कि उन्होंने युवा कलाकारों के साथ नीलम जी के पुराने कलाकारों को भी अपने काम का हिस्सा बनाया। उनके साथ मंच पर 86 साल के हरपाल सिंह को संगत करते देखना आश्चर्य में डालता है। नाटक में कुछ जगहों पर सेक्सोफोन की ध्वनि सुनाई देती है। यह रंगमंच के साज़ों से हटकर नई आमद का अहसास कराता है।(तस्वीर में भूमिजा बैंगलोर की सुश्री गायित्री, सिनिक डिज़ाइनर दीपन शिवरामन)
गणपति वंदना, नाट्य जगत की पहचान: एक और बात, ‘हयवदन’ की प्रारंभिक गणपति वंदना, नाट्य जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुकी है। इसमें सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की- ‘बाँचे जो बानी, गाथा पुरानी’ और कवि कुँअर नारायण की कविता – ‘नदी जानती है केवल प्रपात का उद्यम वेग’ की संगीत रचनाएं दिल को छू जाती हैं। नाटक के संगत कलाकारों के नाम है – राघवेंद्र, चैनिस गिल, प्रदीप सिंगर, स्नेहलता, अम्बू और बहादुर जी।
नाटक में इन कलाकारों ने किया अभिनय: नाटक में काली के रूप में अपने अभिनय से पल्लवी जाधव दर्शकों को सबसे ज़्यादा प्रभावित करती हैं। शेष सभी कलाकार अपने-अपने स्तर पर बेहतर अभिनय क्षमता का प्रदर्शन करते हैं। इन कलाकारों में पदमिनी के रूप में बृंदा नायक और इप्शिता चक्रवर्ती / देवदत्त और कपिल बने अजीत सिंह पलावत और महेश सैनी / गायक भागवत के पात्र में पुनीत कुमार मिश्रा शामिल रहे। जबकि घोड़े, गुड़िया की भूमिकाओं में पल्लवी, अंबिका कमल, चमन बंसल, गुरूसेवक बूमराह और पुनीत कुमार मिश्रा शामिल रहे। गुड़ियाओं की भूमिकाओं वाले कलाकार अपनी भाव-भूमिकाओं, चपलता और संवादों से दर्शकों के दिलों में जगह बना लेते हैं। नाटक के सह निर्देशक वंश भारद्वाज हैं। नाटक में तकनीकी और बैकस्टेज टीम की बड़ी भूमिका रही। इनमें सुषमा राव, पी.डोरकास, सार्थक नरूला, इरशाद, अज़मल, फैज़ल, ज्ञान देव सिंह ,परवीन जग्गी, कमलजीत भुंबला, अभिमन्यु, जसवीर का सहयोग रहा। आगे पढ़िये –

