इंदौर स्टूडियो डॉट कॉम। साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली के सभागार में ख्यात आलोचक नेमिचंद जैन की जन्मशती के उपलक्ष्य में नटरंग प्रतिष्ठान ने रंगमंच पर एकाग्र संगोष्ठी में उनके अवदान को रेखांकित किया गया। वरिष्ठ नाटककार असगर वजाहत ने संगोष्ठी की अध्यक्षता की। सबसे पहले ज्योतिष जोशी ने नेमिजी के रंग अवदान पर सुगढ़ वक्तव्य दिया।
भारतीय रंग परिदृश्य को विकसित करने वाले पहले आलोचक : नेमिजी के रंगचिन्तन के महत्त्वपूर्ण पक्षों पर बात करते हुए ज्योतिष जोशी ने नटरंग के प्रकाशन से लेकर रंग दर्शन, रंग परम्परा, रंग कर्म की भाषा और तीसरा पाठ जैसी उनकी ख्यात पुस्तकों की प्रासंगिक स्थापनाओं को सामने रखते हुए यह बताने की चेष्टा की कि नेमिजी स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिन्दी और सम्भवतः भारतीय रंग परिदृश्य में पहले ऐसे आलोचक थे, जिन्होंने रंग आलोचना का प्रतिमानीकरण कर उसे विकसित किया। उन्होंने रंगकर्म को एक कलात्मक उपलब्धि और सार्थक संस्कृतिकर्म के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने नाटक और रंगमंच के सभी अवयवों की व्याख्या की और परम्परा के साथ आधुनिकता तथा शास्त्र के साथ लोक की समन्विति पर बल दिया। उनका महत्त्व निश्चय ही स्टेनिस्लावस्की, ब्रेख्त, आर्तो, यूगोबेट्टी जैसे पश्चिमी रंग विचारकों की तरह महत्त्वपूर्ण है जिन्होंने समूची रंग परम्परा को एक व्यवस्था दी और रंग कर्म को एक श्रेष्ठ कला कर्म की तरह बरता।
बाजारीकरण से नाटक की आलोचना हुई लुप्तप्राय : इस दौर में नाटक में आलोचना की अनुपस्थिति पर चर्चित रंग निर्देशक देवेंद्रराज अंकुर ने अपनी बात कही और ठीक ही कहा कि आज के बाजारीकरण के दौर में आलोचना लुप्तप्राय हो गई है। न किसी को परिश्रम करने की ज़रूरत रह गई है और न नाटक को गम्भीर कला कर्म की तरह बरतने की। प्रस्तुति अब सिर्फ़ कथा कहने तक सीमित हो गई है जिसने रंग आलोचना को सतही बना डाला है।
नाटकहीन रंगमच पर बात : इसके बाद के सत्र में नाटकहीन रंगमंच पर विस्तार से चर्चा हुई. इसमें रंग निर्देशक अभिलाष पिल्लई, अभिनेता राजेश तैलंग तथा नाट्य आलोचक रवींद्र त्रिपाठी ने भागीदारी की। इस सत्र में काफी विचारोत्तेजक चर्चा हुई और यह बात उभर कर आई कि पारम्परिक रूप से आलेख रखकर नाटक करने के बजाय अभ्यास के दौरान सामूहिक प्रयत्नों से तैयार नाटकों का समय आ गया है। राजेश तैलंग तथा अभिलाष पिल्लई ने अपने प्रयोगों के उदाहरण से इसे बताया। रवींद्र त्रिपाठी ने विस्तार से पाठ के न होने के बावजूद नाटक की संभावना को परखा और अनेक उदाहरणों के जरिए यह बताया कि परम्परा निरन्तर बननेवाली प्रक्रिया है। वह बद्धमूल नहीं होती।
संगोष्ठी काफी हद तक सार्थक रही जिसमें श्रोताओं की सवालों के ज़रिए भागीदारी रही और कई स्तर पर कई कोणों से रंगमंचीय समस्याओं पर बहस हो सकी।

