Wednesday, May 20, 2026
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‘नि:शब्द’ में कोरोना की त्रासदी, ‘अनुकृति’ के कलाकारों की झकझोर देने वाली प्रस्तुति

इंदौर स्टूडियो, कला प्रतिनिधि। ‘सोशल मीडिया पर संवेदनाओं का मैं क्या करूं, मुझे पत्नी का अंतिम संस्कार करने के लिए चार कंधे चाहिए … सिर्फ चार कंधे’। नाटक ‘नि:शब्द’ में अजय साहनी के यह कातर शब्द कोरोना की त्रासदी को पूरी शिद्दत से बयान करते हैं। लखनऊ की वाल्मीकि रंगशाला में आयोजित अमृत नाट्य समारोह में ‘अनुकृति रंगमंडल’ कानपुर के कलाकारों ने यह नाटक प्रस्तुत किया। रजेश कुमार लिखित और कृष्णा सक्सेना द्वारा निर्देशित समारोह के पहले दिन की यह झकझोर देने वाली प्रस्तुति थी। दर्शकों ने किसी आप बीती की तरह कोरोना काल के हालात को महसूस किया। नाटक ऐसे हालात में भी एक आम आदमी के साथ पेश आने वाली मुश्किलों को फिर एक सवाल की तरह उठाता है। माँग करता है कि भविष्य में हमें ऐसे हालात से निपटने के लिये पूरी सजगता के साथ तैयार रहना होगा। संस्कृति निदेशालय,उत्तर प्रदेश और दर्पण लखनऊ के सहयोग से आयोजित समारोह में यह नाटक मंच पर अवतरित हुआ। सावघानी बरतने के बावजूद ‘कोविड 19’ का हमला  : नाटक में अजय साहनी (शैलेन्द्र अग्रवाल) और गार्गी (आरती शुक्ला) दिल्ली-एनसीआर के एक अपार्टमेंट में रहते हैं। अजय साहनी को रिटायर हुए करीब दस साल हो चुके हैं। उनकी लड़की कुक्कू (संध्या सिंह) अपने पति के साथ बेंगलुरू में रहती है। जबकि बेटा नकुल (अलख त्रिपाठी) अमेरिका की एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी करता है। अजय और गार्गी प्राइवेट हॉस्पिटल से कोरोना का पहला डोज़ लगवा कर अपने घर आते हैं । सरकार द्वारा जारी गाइड लाइन्स से गार्गी काफी सतर्क दिखती है, हालांकि अजय उतने गंभीर नहीं हैं। हॉस्पिटल से लौटने के बाद अजय को थोड़ा बुखार महसूस होता है। गार्गी कोरोना टेस्ट कराने को कहती है। नकुल टेस्ट के लिए ऑनलाइन बुकिंग कर देता है। टेस्ट रिजल्ट में अजय नेगेटिव और गार्गी पॉजिटिव निकलती हैं।बुरे हालात के बीच ऑनलाइन लुटेरों ने दिया आघात : एहतियातन गार्गी अपने को एक कमरे में खुद को क़वारन्टीन कर लेती है। रसोई का जिम्मा अब अजय साहनी पर आ जाता है। गार्गी से बात करने के दौरान अजय महसूस करता है कि उसे सांसें लेने में परेशानी हो रही है। ऑक्सिमेटर से जांचने पर गार्गी का ऑक्सीजन लेवल काफी कम मिलता है। नकुल ऑक्सीजन सिलिंडर के लिए काफी प्रयास करता है लेकिन कहीं नहीं मिलता। एक एजेंसी ब्लैक में देने को तैयार  होती है। नकुल ऑनलाइन पेमेंट भी कर देता है, लेकिन पता चलता है कि वे सब फ्रॉड है। यह एक ऐसा सत्य है जिसे कोरोना संकट के दौरान किसी न किसी स्तर पर पचासों पीड़ितों ने भुगता। उन्हें जानलेवा हालात के बीच मौके का फायदा उठाने वाले हर तरफ लुटेरे नज़र आने लगे। ऐसे वक्त जब कुछ देश भक्त और मददगार भारतीय अपने हिंदुस्तानी भाइयों की सेवा कर रहे थे, धोखेबाज़ अस्पताल से लेकर दवा के नाम पर डरे और संकटग्रस्त अपनों को ही लूट रहे थे। झकझोरकर रख देने वाला अंत: कहानी में कुक्कू के अथक के प्रयास से एक एनजीओ के माध्यम से ऑक्सीजन का सिलेंडर मिलता है मगर वह एक सिलेंडर आख़िर कितने दिन चलता। सिलेंडर खत्म होते ही गार्गी की सांसें थमने लगती हैं। गार्गी की जान बचाने के लिये अब अजय और नकुल सारे हॉस्पिटल छान मारते हैं, मगर कहीं एक बेड नहीं मिलता। आखिरकार सांसों से जंग लड़ती गार्गी दम तोड़ देती है। त्रासदी का यहाँ भी अंत नहीं होता। गार्गी का अंतिम संस्कार करना भी मुश्किल हो जाता है। श्मशान घाट में रजिस्ट्रेशन के लिए लंबी कतार लगी है। तीन दिन के बाद भी नगर निगम  वाले शव ले जाने की व्यवस्था नहीं कर पाते। ऐसे बेबस परिजन ख़ून के आँसू रोने पर मजबूर हो जाते हैं।
मंच के कलाकार और नेपथ्य के सूत्रधार: नाटक की प्रमुख भूमिकाओं में शैलेन्द्र अग्रवाल, आरती शुक्ला, संध्या सिंह, अलख और सहयोगी भूमिकाओं में दिलीप सिंह और सुमित गुप्ता ने दिल को छून वाला अभिनय किया। पार्श्व में दीपिका सिंह, महेश जायसवाल, शिवेन्द्र त्रिवेदी, विजय भास्कर (संगीत), राजू कश्यप (प्रकाश व्यवस्था) का योगदान रहा। नाटक के मंचन से पहले अनुकृति रंगमंडल के सचिव, वरिष्ठ रंगकर्मी  डॉ.ओमेन्द्र कुमार, दर्पण लखनऊ के सचिव राधेश्याम सोनी और लखनऊ के वरिष्ठ रंगकर्मी अश्विनी श्रीवास्तव ने दीप प्रज्जवलित किया।

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