Wednesday, May 13, 2026
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नृत्य की नई पीढ़ी का उत्सव, 48 वां खजुराहो नृत्य समारोह

अजित राय,इंदौर स्टुडियो। फ़्रेंच नृत्यांगना पेरिस लक्ष्मी के लिए खजुराहो में नृत्य करना एक सपने के पूरा होने जैसा है। दक्षिण फ्रांस में जन्मी और केरल के कोट्टायम में नृत्य की साधना कर रही इस युवा नृत्यांगना ने वर्षों पहले एक पर्यटक के रूप में जब खजुराहो नृत्य समारोह को देखा था, तब सोचा भी नहीं सकतीं थीं कि एक दिन उन्हें भारत के दिग्गज कलाकारों के साथ दुनिया के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित भारतीय शास्त्रीय नृत्य के इस मंच पर नृत्य करने का अवसर मिलेगा। उनके माता-पिता ने भारत प्रेम के कारण उनका नाम लक्ष्मी रखा था। बाद में उन्होंने अपने नाम में पेरिस जोड़ लिया।अपने साथी कलामंडलम सुनील के साथ उनकी भरतनाट्यम् और कथकली की जुगलबंदी यह साबित करने के लिए काफी है कि कलाओं की दुनिया में देशों की सीमाएं खत्म हो जाती है। कुछ ऐसी ही अभिव्यक्ति जयपुर की ट्रांसजेंडर कलाकार देविका देवेंद्र (पूर्व नाम एस मंगलामुखी) की थी। प्रचंड सामाजिक विरोध के बावजूद उन्होंने नृत्य की साधना की और अंतरराष्ट्रीय ख्याति पाई। खजुराहो के मंच पर उन्हें देखना एक विस्मयकारी अनुभव है। सौंदर्य में नया आयाम खजुराहो नृत्य समारोह: खजुराहो के सौंदर्य में एक नया आयाम 1974 में मध्यप्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग द्वारा ‘ खजुराहो नृत्य समारोह ‘ के माध्यम से जोड़ा गया जिसे अब अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा मिल चुकी है। यह समारोह  फरवरी 2024 में अपनी पचासवीं सालगिरह मनाने जा रहा है। शुरू में परिसर के भीतर मंदिर के चबूतरे पर नृत्य होता था, पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की आपत्ति के बाद महज तीन साल बाद ही मंदिर परिसर से बाहर चित्रगुप्त मंदिर की पृष्ठभूमि वाले अस्थायी मंच पर उसका आयोजन किया जाने लगा। यह सुखद बात है कि पिछले साल से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने मंदिर परिसर के भीतर खजुराहो नृत्य समारोह के आयोजन की अनुमति प्रदान कर दी है। अब यह आयोजन मंदिर परिसर में कंदरिया महादेव और जगदंबा मंदिर के बीच बने भव्य मंच पर होता है। इससे इस समारोह के सौंदर्य को नई ऊंचाई मिली है।नृत्य की नई पीढ़ी दे रही असरदार दस्तक : खजुराहो नृत्य समारोह को यदि भारतीय नृत्य की दुनिया का एक झरोखा माने तो मानना पड़ेगा कि यह दुनिया तेजी से बदल रही है। बड़ी-बड़ी शख्सियतें नेपथ्य में जा रही है जबकि नृत्य की नई पीढ़ी की असरदार दस्तकें सुनाई दे रही है। नृत्य की सभी प्रस्तुतियों में परंपरा और पुनरावृत्ति के प्रति जबरदस्त आग्रह मौजूद हैं। पौराणिक धार्मिक गाथाएं या नायिका की भाव दशाएं ही नृत्य का आधार बनती है। लेकिन चिंता की बात यह है कि इनमें नई विषय वस्तु नहीं आ पा रही है। सबकुछ ठहर गया है। लेकिन नई पीढ़ी यह जोखिम उठा रही है जिससे दुनिया भर में भारतीय शास्त्रीय नृत्य का नया बाजार विकसित हो रहा है। यह नृत्य का नया ताजगी भरा चेहरा है।नृत्य समारोह को बनाया विश्व स्तरीय: उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी के निदेशक जयंत माधव भिसे और उप निदेशक राहुल रस्तोगी, संस्कृति विभाग के निदेशक अदिति कुमार त्रिपाठी और प्रमुख सचिव शिव शेखर शुक्ला तथा संस्कृति मंत्री उषा ठाकुर की टीम ने खजुराहो नृत्य समारोह को एक बहुआयामी पैकेज में पेश कर विश्व स्तरीय बना दिया है जहां शास्त्रीय नृत्य की कई पीढ़ियां एक मंच पर संवाद कर रहीं हैं। इस टीम ने एक ओर मंदिर से सटे बाहरी परिसर में बुंदेलखंड की संस्कृति के हर पक्ष  को जोड़कर यहां के आम लोगों का का खयाल रखा है तो युवाओं की समूह गायन मंडलियों को बुलाकर इसे नई पीढ़ी से जोड़ा है। मुख्य प्रस्तुति से एक घंटा पहले दविंदर सिंह ग्रोवर के निर्देशन में जबलपुर की लड़कियों के श्री जानकी बैंड आफ वीमेन की प्रस्तुति माहौल में ताजगी भर दी।समारोह में दिग्गज कलाकारों का सम्मान: मध्य प्रदेश के राज्यपाल मंगूभाई पटेल ने नृत्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए सुनयना हजारीलाल  (कथक, मुंबई) और भरतनाट्यम् दंपति शांता – वी पी धनंजयन (चेन्नई) को कालिदास सम्मान से सम्मानित किया। मध्य प्रदेश की संस्कृति मंत्री उषा ठाकुर ने खजुराहो में भारतीय शास्त्रीय नृत्य का एक राष्ट्रीय संदर्भ ग्रंथालय बनाने की घोषणा की। 48 वें खजुराहों नृत्य समारोह की शुरुआत पंडित बिरजू महाराज की संस्था कलाश्रम (दिल्ली) के समूह नृत्य से हुई। सुजाता महापात्र (भुवनेश्वर), निरूपमा और राजेंद्र (बंगलूरू), नीना प्रसाद ( तिरुवनंतपुरम), टीना तांबे (मुंबई), शर्वरी जमेनिस (पुणे), संध्या पुरेचा (मुंबई), श्वेता देवेंद्र एवं क्षमा मालवीय (भोपाल), शमा भाटे समूह (पुणे) तपस्या समूह, (इंफाल, मणिपुर) की नृत्य प्रस्तुतियों में कई तरह के नवाचार देखने को मिला।

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