शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। ‘नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा (एनएसडी) कमाल की चीज़ है। मैं बड़े-बड़े इंस्टीट्यूट गया हूँ। मगर जो बात यहां है वो कहीं नहीं। ख़राब से ख़राब स्थिति होने के बावजूद’। 25 वें भारत रंग महोत्सव में यह बात चर्चित अभिनेता पीयूष मिश्रा ने कही। पियूष मिश्रा का यह विशेष सत्र एनएसडी, दिल्ली में स्टूडेंट्स यूनियन ने आयोजित किया था। विषय था ‘एक्टर्स ऑन एक्टिंग’। पहले भाग में आपने पढ़ा, किस तरह उनके अंदर एक एक्टर का जन्म होने लगा। अब पढ़िये उनकी अभिनय यात्रा का दूसरा भाग। तस्वीर में एनएसडी के रजिस्ट्रार प्रदीप के.मोहंती और स्टूडेंट यूनियन के शेखर कावंत, पीयूष मिश्रा लिखित किताब ‘तुम्हारी औकात क्या है’ के विमोचन पर स्वागत करते हुए।
हमने यहाँ की घास खाई है: एनएसडी से भावनात्कम लगाव रखने वाले अनुभवी एक्टर ने कहा – ‘हमने तो यहां की घास खाई है। सच में एनएसडी में मैंने बड़ी खूबसूरत ज़िदंगी बिताई है। इसके लिये मैं आज भी रो पड़ता हूँ’। मुंबई वालों के बारे में कहते हैं कि आप जब तक वहाँ बस नहीं जाते, आप वहाँ रह नहीं सकते। ऐसी ही एनएसडी है। जब तक इस कैम्पस में कोई रहता नहीं। तब तक आप समझ ही नहीं पाते कि यहाँ है क्या’! नीचे की तस्वीर में पीयूष मिश्रा अभिनीत नाटक ‘मैन इक्वल मैन’। एनएसडी में मंचित इस नाटक का निर्देशन फ्रिट्ज़ बेनेविट्ज़ ने किया था।
कमरे में एक्टिंग के शो करने लगे: एनएसडी स्टूडेंट के इस चहेते एक्टर ने कहा – ‘हमने मंडी हाउस के किस-किस हिस्से में थियेटर नहीं किया। कुछ नहीं हुआ। ग्रुप छूट गये सारे के सारे। हमने कहा, कोई बात नही। ग्रुप छूट गये ना ! हमने एक्टिंग ही तो करना है। देखते हैं। फिर हम अपने कमरे में एक्टिंग करने लगे। दस बाय बारह के कमरे में। तीन-तीन घंटे, अकेले। देखने वाला कोई भी नहीं। खुद ही करता। थक कर गिर पड़ता। तीन-तीन शो, तीन-तीन घंटे तक खुद ही करता था। खाली एक्टिंग। उस चक्कर में मैंने परिवार को छोड़ दिया। अजीब सा पागलपन हो गया। फितूर था, दीवानगी थी। लगा बस ऐसी ही चलती जायेगी ज़िन्दगी। थियेटर करते रहेंगे और सब चलता रहेगा। मगर जब हालात बिगड़े। ज़िदंगी तंगहाल हुई। तब भूख लगी, बहुत ज़ोरों की। ज़रूरतों का प्रेशर बढ़ने लगा था और तब होश आया’। नीचे दी गई तस्वीर में पत्नी रेखा के साथ पीयूष मिश्रा।
आज कम्युनिलिज़्म की बात नहीं करूँगा: पीयूष मिश्रा ने कहा – ‘आज मैं कम्युनिल्ज़म की बात नहीं करूंगा। बहुत बात कर चुका। 20 साल के उस दौर में बच्चे की करियर की किसी बात की चिंता नहीं थी। मेरी बीवी रेखा सर्विस करती थी। रेखा कहा करती थी, तुम सिर्फ थियेटर करो। बाकी मैं संभाल लूंगी। मुझे नहीं मालूम, मेरा घर कैसे और किस तरह से चलता था। मैं तो जैसे अपने होश गवाँ बैठा था। पागलों की तरह एक्टिंग, एक्टिंग सिर्फ एक्टिंग ! मगर 2003 में लगा कि अपनी ज़िम्मेदारी को समझना होगा। मुझे मेरे साथी मुंबई बुला रहे थे। चिट्टियां लिख रहे थे। मैं थियेटर की ज़िद पर अड़ा था। सोच रहा था थियेटर से ही बड़ी क्रांति ला दूँगा। मगर जब अहसास हुआ तब मुंबई शिफ़्ट होने का फ़ैसला कर लिया’।
सिनेमा मेरा पैशन कभी नहीं रहा: ‘मुंबई आकर भी चैन नहीं पड़ा। फिल्म ‘मकबूल’ कर ली, ‘गुलाल’ कर ली, ’गैंग्स ऑफ वासेपुर’ कर डाली। लेकिन सच ये है कि सिनेमा मेरा कभी भी पैशन नहीं रहा, आज भी नहीं है। जैसा कि अनुराग कश्यप का है, इम्तियाज़ अली या रणवीर कपूर का है। मेरा नहीं’। हां मुंबई में मैं एक मज़दूर की हैसियत से आया था। सोचा था कि इतनी प्रतिभा है कि पेट भर लूँगा। मगर ये पता नहीं था कि इतना कुछ हो जायेगा। मेरे पास अब सबकुछ है। किसी बात की कमी नहीं’। नीचे ‘गगन दमामा बाज्यो’ की तस्वीर। पियूष इन दिनों इस नाटक के भी मंचन कर रहे हैं।
थियेटर ही मेरा पैशन रहा: पीयूष ने कहा, ‘थियेटर ही मेरा पैशन रहा..बस थियेटर। उसी में सुकून मिलता है। आज भी मैं स्टेज पर ही अपनी दुनिया को देखता हूँ। मुझे रंगमंच पर अभिनय करने में सबसे ज़्यादा आनंद आता है। 2016 में मैंने ‘बल्ली मारान’ नाम का अपना बैंड बनाया। लाइव इंटरेक्शन के लिये, इसके हम 10 शोज़ अमेरिका में कर लौटे हैं’।
एक्टिंग अपने लिये नशा है: पीयूष मिश्रा ने एक्टिंग के बार में दोहराया – ‘एक्टिंग मेरे लिये नशा है, जब तक एक्टिंग आपकी भूख-प्यास ना बन जाये, चैन नहीं पड़ता। हम आज भी थियेटर कर रहे हैं। मैं तो कहता हूं – एक्टिंग हर क़ीमत पर करना है। सीखना है कि एक्टिंग अंदर से कैसे होती है? फिजिकली कैसे होती है, बायो-कैमिकली कैसे होती है? क्या और कैसे रियेक्शन होते हैं। इस बात को जानने के लिये एनएसडी के दिनों में हमने नाट्य शास्त्र को खंगाल डाला था। पीटर ब्रुक्स, ग्रोटोवस्की – क्या नहीं पढ़ा’। (शाहरूख़ ख़ान के साथ फ़िल्म ‘दिल से’ एक दृश्य में पियूष।)
एक्टिंग में सबकी अपनी मेथड: स्टूडेंट्स को सम्बोधित सत्र में पीयूष मिश्रा ने एक्टिंग को लेकर अपने निष्कर्ष को भी साझा किया। उन्होंने कहा – ‘40 साल बाद लगता है कि एक्टिंग बेसिकली आराम से होती है। तल्लीनता से होती है। इसका कोई मेथड नहीं होता है। अगर होता है अभिनेता या अनुभव करने वाले का अपना होता है। नसीरूद्दीन शाह का अपना मेथड है और अमिताभ बच्चन, शाहरूख़ का अपना। इनमें भी रणवीर कपूर अपना तरीका सबसे अलग है।’
रणबीर कपूर कमाल का एक्टर: पीयूष ने रणबीर कपूर की प्रशंसा की। उन्होंने कहा – ‘रणबीर कपूर कमाल का एक्टर है। फिल्म ‘तमाशा’ में मेरी लास्ट स्पीच के दौरान रणवीर कपूर के चेहरे पर कैमरा है। इम्तियाज़ ने कहा, आपके संवाद के दौरान हम रणवीर के चेहरे को कैप्चर करेंगे। आप बुरा तो नहीं मानेंगे? मैंने कहा, बिल्कुल नहीं। और सच में वो कमाल का सीन बना है’।

