Wednesday, May 13, 2026
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‘एनएसडी’ में 20 साल बाद ‘अंधा युग’, 26 मार्च से 3 दिन होंगे शोज़

कला प्रतिनिधि,इंदौर स्टूडियो। ‘अंधा युग’ नाटक के मंचन का सिलसिला अब तक खत्म हो जाना चाहिए था लेकिन दुर्भाग्य से यह नाटक आज भी हमारे समाज में विभिन्न स्तरों पर खेला जा रहा है। यही वजह है कि यह नाटक आज भी प्रासंगिक बना हुआ है, इसका मंचन जारी है’। यह बात प्रख्यात रंग निर्देशक पद्मश्री प्रोफेसर राम गोपाल बजाज ने कही। वे धर्मवीर भारती के इस कालजयी नाटक के एक बार फिर मंचनों से पहले आयोजित पत्रकार वार्ता को सम्बोधित कर रहे थे। इस अवसर पर एनएसडी के निदेशक प्रो.(डॉ) रमेश चंद्र गौड़ ने भी नाटक को लेकर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि इस बहुचर्चित और कालजयी नाटक के 3 शोज़, एनएसडी, दिल्ली के अभिमंच सभागार में 26, 27 और 28 मार्च को शाम साढ़े छह बजे से होंगे।प्रो.बजाज के नेतृत्व में निर्माण:  महत्वपूर्ण है कि प्रो. राम गोपाल बजाज ने ही नाटक का निर्देशन किया है। एक महीने से वे एनएसडी, रंगमंडल के साथ इस नाटक की तैयारियों में जुटे थे। उम्रदराज़ होने और शारीरिक दिक्कतों के बावजूद, सभी के प्रिय बज्जू भाई पूरी तन्मयता से इस नाटक को रचने में जुटे रहे। साल 2002 में भी उनके निर्देशन में इस नाटक का मंचन हुआ था। 20 साल बाद यह नाटक फिर से दिल्ली के दर्शकों के सामने प्रस्तुत होने जा रहा है। नाटक में वेशभूषा-अम्बा सान्याल, प्रकाश योजना-सौती चक्रवर्ती,संगीत और साउंड-अजय कुमार,संतोष और राजेश सिंह का है। दर्शकों ने भी इस शो के प्रति ज़बरदस्त रूचि दिखाई है। (फाइल फोटो:पौलामी बोस निर्देशित ‘अंधा युग’ का एक दृश्य।)‘अंधा युग’ एक मानवीय संकट:  प्रो. रामगोपाल बजाज ने कहा – ‘अंधा युग या अंध युग एक प्रकार से सतयुग, त्रेतायुग या फिर कलियुग के ही समान्तर एक युग जैसा लगता है। इस ‘अंध युग’ को ख़त्म हो जाना चाहिये था। मगर ऐसा नहीं हुआ है। आज भी यह नाटक हमारे समाज में घटित हो रहा है। यह हमारे मानव समाज के लिये दुर्भाग्यपूर्ण है, मानवीय सकंट है। जब तक यह संकट ख़त्म नहीं होता, ‘अंधा युग’ जारी रहेगा। इस नाटक की प्रासंगकिता भी बनी रहेगी। (फाइल फोटो: 1962 में एनएसडी के पूर्व निदेशक इब्राहिम अलकाज़ी निर्देशित ‘अंधा युग’ का एक दृश्य) फिरोज़शाह कोटला मैदान में हुआ था मंचन: भारत रंग महोत्सव जैसे आयोजनों के इस कल्पनाकार ने कहा, ‘अंधा युग’ नाटक लगातार मंचित होता आ रहा है। बहुत सी भाषाओं और शैलियों में यह नाटक खेला गया है। एनएसडी में रंगमंडल बनाये जाने से पहले 8 अक्टूबर,1963 को भी इसका मंचन हुआ था। तब यह नाटक एनएसडी के पूर्व निदेशक और रंगमंच की प्रख्यात हस्ती पद्मश्री इब्राहिम अलकाजी ने किया था। नाटक का मंचन दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में किया गया था। उनसे पहले इस नाटक का मंचन मुंबई में मशहूर रंग निर्देशक सत्यदेव दुबे जी कर चुके थे। जाने-माने नाटककार और निर्देशक भानु भारती ने भी 2011 में इस नाटक का मंचन फिरोजशाह कोटला के खंडहरों मे किया था।  (फाइल फोटो: 2011 में नाटककार और रंग निदेशक भानु भारती निर्देशित ‘अंधा युग’ का एक दृश्य)हिंसा किसी भी तरह से ठीक नहीं: ‘अंधा युग’ एक काव्यात्मक नाटक है। महाभारत युद्ध के अंतिम दिन के इर्द-गिर्द घूमती कहानी पर यह उपन्यास धर्मवीर भारती ने 1947 में भारत के विभाजन के समय लिखा था। नाटक आक्रामक और हिंसक राजनीति को दर्शाता है। नाटक में अमर्यादित और अनैतिक आचरण का विरोध दिखाई देता है। नाटक संदेश देता है कि हिंसा, समाज के लिये किसी भी तरह से ठीक नहीं है। आगे पढ़िये – 

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