शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी), नई दिल्ली में नाटक ‘भीम गाथा’ का मंचन शुरू हो गया है। इस नाटक को ड्रामा स्कूल के सेकंड ईयर के छात्र प्रदर्शित कर रहे हैं। 13 मई से शुरू हुआ ‘भीम गाथा’ का मंचन आगामी 16 मई तक जारी रहेगा। इस दौरान इसके कुल 6 शोज़ होंगे। एनएसडी के परिसर में मौजूद ‘अभिमंच’ सभागार में नाटक के प्रदर्शन जारी हैं। एनएसडी द्वारा जारी जानकारी के अनुसार, इस प्रस्तुति में प्रवेश के लिए सीट कार्ड नि:शुल्क है, कार्ड प्रस्तुति के दिन ही सुबह 11 बजे से www.nsd.gov.in पर उपलब्ध होगा। (रिपोर्ट में प्रस्तुत ‘भीम गाथा’ की तस्वीरें नाटक के ग्रैंड रिहर्सल की हैं।)
नाटक में भीम के चरित्र के अनछुए पहलू: आसिफ़ अली हैदर ख़ान लिखित इस नाटक का निर्देशन पद्मश्री प्रो. विदूषी ऋता गांगुली ने किया है। उन्होंने नाटक को लेकर आयोजित पत्रकार वार्ता में कहा- ‘भीम के चरित्र से जुड़े कुछ अनछुए पहलू इस नाटक में पहली बार दर्शकों को देखने को मिलेंगे’। एनएसडी के निदेशक प्रो.(डॉ) रमेश चंद्र गौड़ ने बताया – ‘एनएसडी के छात्रों को रंगमंच के विभिन्न रूपों से प्रशिक्षित किया जाता है, इसमें सबसे महत्वपूर्ण भारतीय शास्त्रीय नाट्य परंपरा का ज्ञान भी है। नाट्य शास्त्र के इसी प्रशिक्षण का नतीजा ‘भीम गाथा’ की यह प्रस्तुति है’। पत्रकार वार्ता में एनएसडी के रजिस्ट्रार श्री प्रदीप के. मोहंती, लेखक आसिफ़ अली और ख्यात कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर डॉली अहलुवालिया तिवारी भी मौजूद थीं।
व्यावहारिक प्रशिक्षण की पेशेवर प्रस्तुति: नाटक की यह प्रस्तुति छात्रों के व्यावहारिक प्रशिक्षण का हिस्सा है। नाटक के निर्देशन के साथ ही इसका संगीत और नृत्य भी प्रो.गांगुली ने ही तैयार किया है। प्रो.गांगुली रंगमंच के साथ ही संगीत और नृत्य की भी प्रख्यात हस्ताक्षर हैं। साठ के दशक में उन्होंने अमेरिका से अपने रंगमंच का सफ़र शुरू किया था। प्रो.गांगुली 1968 में ही एनएसडी में अध्यापन से जुड़ चुकी थीं। जबकि नाटककार आसिफ़ अली एनएसडी ग्रेजुएट हैं, उन्होंने अभिनय में विशेषज्ञता हासिल की है। वर्तमान में वे एनएसडी में मॉर्डन इंडियन ड्रामा के अध्यापन से जुड़े हैं।
भीम का चरित्र भी कुछ कम नहीं: प्रो.गांगुली ने कहा – ‘यह नाटक महाकाव्य, महाभारत के एक प्रमुख चरित्र भीम पर केंद्रित हैं। भीम के चरित्र को उतना महत्व नहीं मिला, जितना अर्जुन को। इस नाटक में हम भीम के चरित्र से जुड़े कुछ ऐसे पहलुओं को देखेंगे, जो आम धारणा के विपरीत है। उन्होंने कहा- ‘असल में भीम का चरित्र बेहद सुंदर है, उनके चरित्र की अपनी विशेषताएं हैं। वे गुस्से वाले ज़रूर है, लेकिन विवेकहीन हैं, यह कहना पूरा सच नहीं। वे भी सहृदयी और संवेदनशील हैं। भीम अपने पाँडव भाइयों के साथ ही माता कुंती की रक्षा करते हैं। अकेले ही सैकड़ों कौरवों का वध करते हैं, द्रौपदी को दिये वचनों को निभाते हैं’।
कॉस्ट्यूम के साथ प्रकाश योजना की प्रशंसा: नाटक के लेखन, कॉस्ट्यूम के साथ ही प्रो.गांगुली ने प्रकाश योजना के लिये सौती चक्रवर्ती की प्रशंसा की। उन्होंने कहा, जितने समर्पण के साथ उन्होंने लाइट डिज़ाइनिंग की है, वह प्रभावित करने वाली है। नाटक को छात्रों के साथ तैयार करने के अनुभव को लेकर प्रो.गांगुली ने कहा- ‘छात्रों के साथ नाटक को तैयार करने में कुछ मुश्किल तो आई लेकिन यह उनके प्रशिक्षण का हिस्सा है। अनुभवी प्रोफ़ेसर ने कहा – ‘एक रंगकर्मी के लिये योग के साथ नृत्य और संगीत की तालीम भी ज़रूरी है, मन की एकाग्रता भी। किसी भी विधा में दक्षता हासिल करने की यह महत्वपूर्ण बाते हैं। यह हम लंबी साधना से सीखते हैं। नाट्य विद्यालय में यथासंभव यह काम जारी है’।
प्रो.गांगुली के साथ काम करना रोमांचक: ‘भीम गाथा’ की पोशाकें प्रख्यात कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर डॉली अहलुवालिया तिवारी ने तैयार की हैं। वे भी एनएसडी की स्नातक हैं, 1979 में उन्होंने एनएसडी में ‘श्रेष्ठ अभिनेत्री’ का अवार्ड भी हासिल किया था। उन्हें 75 से अधिक नाटकों के लिये कॉस्ट्यूम डिज़ाइन करने का विशद अनुभव है। उन्होंने विनम्रता से कहा-‘ प्रो.गांगुली के साथ काम करना, मेरे लिये हमेशा से एक रोमांचक अनुभव रहा है। उनके साथ काम करते हुए कुछ नया करने और सीखने को मिलता है। जैसे कि इस बार मुझे भीम के चरित्र के बारे में अधिक गहराई से जानने और समझने का अवसर मिला’।
सीमित बजट में श्रेष्ठ की विनम्र कोशिश: डॉली अहलुवालिया ने कहा- ‘ भीम गाथा की पोशाकों को डिज़ाइन करने में जो श्रेष्ठ हो सकता है, सीमित बजट और साधनों में मैंने किया है। जहाँ तक छात्रों का सवाल है, वे नाट्य विद्यालय में अलग-अलग प्रांतों और परिवेश से आये हैं। उनके साथ तालमेल बैठाना, उन्हें पोशाकों के बारे में बताना, आसान नहीं था। छात्र पहनावों के बारे में भी कम जानते हैं। मिसाल के लिये ‘धोती’ को ही लें। वे नहीं जानते इसे कैसे बाँधा जाये? मगर यह बातें ही उनके सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं। मैं इतना कहूँगी कि भविष्य में पोशाकों को लेकर छात्रों को अधिक जानकारियां और प्रशिक्षण ज़रूर दिया जाना चाहिये। यह उनके हित में होगा।
अहम प्रस्तुतियों के प्रसारण की कोशिश: यह पूछे जाने पर कि ‘क्या ‘भीम’ नाटक के दिल्ली के बाहर भी शोज़ हो सकेंगे’? प्रो. गौड़ ने कहा – ‘छात्रों द्वारा तैयार किये गये इस नाटक के और शहरों में मंचन संभव नहीं है। छात्र, इस नाटक के शोज़ के बाद अपने आगे के अध्धयन में जुट जायेंगे। यद्धपि इस बात पर विचार किया जा सकता है कि ‘भीम गाथा’ को कैसे अधिक दर्शकों तक ले जाया जाये या इसके भविष्य में शोज़ किस तरह से हों। उन्होंने कहा, हमारी एक कोशिश यह भी है कि हम कुछ महत्वपूर्ण नाटकों को दूरदर्शन के माध्यम से प्रसारित कर सकें। ताकि ऐसी विशिष्ट प्रस्तुतियां अधिक दर्शकों तक पहुँच सके।
बेहतर काम को विस्तार देने की कोशिश: प्रो.गौड़ ने कहा – ‘प्रो.गांगुली जैसी विशिष्ट कला हस्तियों के ज़रिये भी हम नाट्य विद्यालय के अच्छे काम को विस्तार देने और ज़्यादा से ज़्यादा दर्शकों तक ले जाने की कोशिश कर रहे हैं’। प्रेस मीट में दर्शकों से जुड़े एक सवाल के जवाब में लेखक आसिफ़ अली ने कहा- ‘आम दर्शकों के साथ युवा दर्शकों की रूचि भी नाटकों में बढ़ रही है। एनएसडी में हुए हाल के प्रदर्शनों में हमने यह देखा है। अब पहले की तुलना में अधिक युवा दर्शक,नाटकों को देखने आ रहे हैं। यह एक अच्छी बात है’। आगे पढ़िये –
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