कला प्रतिनिधि, इंदौर स्टूडियो। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) के ‘अभिमंच’ और ‘बहुमुख’ ऑडिटोरियम में हाल ही में द्वितीय वर्ष के छात्रों द्वारा प्रस्तुत दो नाटकों—‘कर्मांकुश’ और ‘उत्तररामचरितम्’—ने उनकी प्रतिभा के प्रति आश्वस्त किया। दरअसल ड्रामा स्कूल के छात्रों की ये अकादमिक प्रस्तुतियां थीं, जिन्होंने दर्शकों के मन-मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ी। उन्हें अरसे बाद भारतीय शास्त्रीय साहित्य पर छात्रों की ऐसी प्रस्तुति देखने को मिली। इन नाटकों में शास्त्रीय कला की सूक्ष्म बारीकियों और आधुनिक अभिनय शैली का अद्भुत संगम देखने को मिला।
नाटक ‘कर्मांकुश’ महान संस्कृत नाटककार भास द्वारा रचित तीन नाटकों—’उरुभंगम’, ‘दूतवाक्यम’ और ‘दूत घटोत्कचम’—का एक बेहतरीन संकलन है। इसकी मूल कथा महाकाव्य ‘महाभारत‘ के प्रसंगों पर आधारित है। इस नाटक की पटकथा, नृत्य-निर्देशन और समग्र निर्देशन श्री सुमन साहा ने किया है।
इस नाटक का सुमधुर संगीत पंडित दिशारी चक्रवर्ती ने तैयार किया और श्री संगीत श्रीवास्तव द्वारा डिज़ाइन की गई प्रकाश-व्यवस्था ने प्रस्तुति को और भी प्रभावशाली बना दिया।
इस प्रस्तुति में दुर्योधन के अंतिम क्षणों का बेहद सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक चित्रण किया गया है, जहाँ उसकी स्मृतियाँ और वर्तमान की कठोर वास्तविकताएँ आपस में टकराती हैं। इन तीन नाटकों के ताने-बाने में बुनी गई यह प्रस्तुति दुर्योधन के उन निर्णायक फैसलों को फिर से जीवंत करती है—जिनमें श्रीकृष्ण की अवहेलना, द्रौपदी का अपमान और अभिमन्यु का वध शामिल है।
मृत्यु की दहलीज पर खड़ा दुर्योधन जब अपने कर्मों के परिणामों का सामना करता है, तो यह नाटक सत्ता, अहंकार और कर्म के गहन दर्शन को उजागर करता है। यह प्रस्तुति एक अत्यंत मार्मिक और अरेखीय (नॉन-लीनियर) कथा-संरचना के साथ आगे बढ़ती है।
वहीं, भवभूति द्वारा रचित ‘उत्तर रामचरित’ में श्रीराम के राज्याभिषेक के पश्चात उनके अंतर्मन में चल रही भावनात्मक उथल-पुथल को मार्मिक ढंग से दर्शाया गया है। सीता को त्यागने के लिए विवश राम उन्हें महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में भेज देते हैं, जहाँ वे लव और कुश का पालन-पोषण करती हैं।
अश्वमेध यज्ञ के दौरान श्रीराम की लव और कुश से होने वाली निर्णायक भेंट और पहचान उजागर होने के बाद छा जाने वाला गहन शोक दर्शकों को झकझोर देता है। सीता का अंततः धरती की गोद में समा जाना इस त्रासदी को और भी गहरा कर देता है।
यह नाटक ‘कर्तव्य’ और ‘आदर्शवाद’ के लिए चुकाई जाने वाली भारी कीमत को रेखांकित करता है। इसका डिज़ाइन और निर्देशन श्री सुरेश अनागल्ली ने किया है, जिसमें श्री अजय कुमार का संगीत और श्री पराग शर्मा की प्रकाश-व्यवस्था ने अद्भुत जान डाल दी है।
महाकवि भास और भवभूति: संस्कृत साहित्य के गौरव: महाकवि भास और भवभूति संस्कृत नाट्य साहित्य के दो देदीप्यमान स्तंभ हैं। भास (लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से दूसरी शताब्दी ईस्वी) को कालिदास से भी पूर्व का प्राचीन और महान नाटककार माना जाता है। उनके नाटकों में मानवीय भावनाओं, विशेषकर वीर और करुण रस का अद्भुत चित्रण मिलता है। ‘उरुभंगम’ जैसे नाटकों में उन्होंने तत्कालीन नाट्यशास्त्र के कड़े नियमों को तोड़कर मंच पर दुखद अंत (त्रासदी) को भी प्रस्तुत किया था।
दूसरी ओर, 8वीं शताब्दी के महान कवि और नाटककार भवभूति को उनकी गहरी साहित्यिक और दार्शनिक समझ के लिए जाना जाता है। राजा यशोवर्मन के दरबार से जुड़े भवभूति का ‘उत्तररामचरितम्’ करुण रस का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। कालिदास के समतुल्य ख्याति प्राप्त भवभूति की भाषा शैली और मानवीय संवेदनाओं की गहराई उन्हें संस्कृत साहित्य में एक अमर और विशिष्ट स्थान दिलाती है। आगे पढ़िये- वासांसि जीर्णानि: जब नाटक ख़त्म हुआ, कोई कुछ कहने की हालत में नहीं था https://indorestudio.com/vasaansi-jirnani-play-review-indore-studio-swati-dubey/
भवभूति और भास की कृतियां: मंच पर अकादमिक रंग प्रयोग
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