Wednesday, May 13, 2026
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एनएसडी, रंगमंडल के 7 सुपरहिट नाटक! हर प्रस्तुति का अलग ‘रंग’

शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। राजधानी दिल्ली में एनएसडी,रंगमंडल के 7 नाटकों का समर फेस्टिवल संपन्न हुआ। 28 जून से 4 जुलाई तक चले इस फेस्टिवल में नाटकों की विभिन्न शैलियों के रंग देखने को मिले। एनएसडी के अभिमंच सभागार में हुए ये नाटक ‘हाउस पैक्ड’ रहे। कुछ नाटकों के ‘सोल्ड आउट शोज़’ को दर्शकों ने सभागार में खड़े होकर भी देखा। प्रस्तुतियों की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। समर फेस्टिवल की इन प्रस्तुतियों का मूल स्वर नारी प्रधान नाटकों का रहा, जिनके माध्यम से उनके साथ होने वाली नाइंसाफ़ी से जुड़े सवाल उठे। (Photo Courtesy: NSD Archive) रंगमंडल के कलाकारों का कमाल: बड़ी बात ये थी कि एक ही टीम ने, सात दिन तक लगातार, सात अलग-अलग नाटकों की धमाल प्रस्तुतियां दीं। एक भी दिन कलाकारों की ऊर्जा और ताज़गी में न तो कमी आई, ना ही नाट्य प्रस्तुतियों में किसी तरह की कोई चूक दिखाई दी। चाहे महिला कलाकार हों या पुरूष, मुख्य भूमिकाओं से लेकर छोटी-छोटी भूमिकाओं या गायन में हरेक एक्टर ने सर्वश्रेष्ठ परफॉर्म किया। पूरी टीम में ज़बरदस्त तालमेल दिखाई दिया। इन सफल शोज़ में बैक स्टेज टीम का भी बेहतरीन तालमेल रहा। (फोटो: एनएसडी परिसर में मौजूद ‘अभिमंच सभागार’ के बाहर का दृश्य। फेस्टिवल को ज़्यादातर युवा दर्शकों ने देखा, यह एक अच्छी बात रही।)उड़ीसा के बाद दूसरा प्रभावी फेस्टिवल: उड़ीसा के बाद दिल्ली में रंगमंडल के कलाकारों का यह दूसरा प्रभावशाली नाट्य उत्सव रहा। दिल्ली के ठीक बाद जयपुर में भी तीन नाटकों को प्रदर्शित किया गया। इतना ही नहीं दिल्ली के समर फेस्टिवल से पहले रंगमंडल के कलाकारों ने यूपी के आम्बेडकर नगर में भी दो नाटकों की प्रस्तुतियां दीं। इस अर्थ में रंगमंडल के कुल 24 कलाकारों की ये टीम अनथक रंग-ऊर्जा का प्रदर्शन कर रही है। (फोटो: अभिमंच सभागार में ‘लैला मजनूं’ नाटक के दिन बोर्ड पर रंगमंडल के प्रमुख राजेश सिंह के साथ  कलाकारों और सहयोगी स्टाफ़ की तस्वीरें।) एनएसडी, रंगमंडल हो गया ‘युवा’: दिल्ली में नाट्य प्रदर्शनों के दौरान पद्मश्री विदूषी रीता गांगुली ने रंगमंडल की प्रशंसा में कहा -‘ रंगमंडल अब युवा हो गया है। इसकी वजह रंगमंडल का दायित्व युवा रंग निर्देशक राजेश सिंह को सौंपा जाना है, जो पूरी ऊर्जा के साथ इसे संभाल रहे हैं। कलाकार जमकर नाटकों के प्रदर्शन में जुटे हैं’। यह सच भी है। रंगमंडल अब ज़्यादा सक्रियता के साथ परफॉर्म कर रहा है। यह न सिर्फ़ अपने स्तर पर नये नाटकों के निर्माण में जुटा है, बल्कि अभिज्ञान शाकुन्तलम्, अंधा युग और लैला मजनूं जैसे नाटकों को नई तैयारी के साथ दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा है। ऐसा होने की एक बड़ी वजह एनएसडी का बदला माहौल है। शीर्ष नेतृत्व का रचनात्मक और प्रशासनिक प्रबंध है। (एनएसडी के दो शीर्ष: रजिस्ट्रार श्री पी.के. मोहंती के साथ एनएसडी के निदेशक प्रो.(डॉ) रमेश चंद्र गौड़।)सक्षम नेतृत्व का सकारात्मक असर: असल में रंगमंडल के साथ ही, एनएसडी को बेहतर माहौल देने में निदेशक प्रो.(डॉ.) रमेश चंद्र गौड़ और अनुभवी रजिस्ट्रार श्री प्रदीप पी.के. मोहंती की महत्वपूर्ण भूमिका है। दोनों ही अपने-अपने स्तर पर विद्यालय को ज़्यादा प्रबंधित और सक्षम बनाने में जुटे हैं। कलाकारों के प्रति दोनों की दृष्टि सकारात्मक और संवेदनशील है। इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र से जुड़े रहे प्रो.गौड़, एनएसडी के नये विस्तार में जुटे हैं। वहीं शिक्षा मंत्रालय में ‘राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान’ के सचिव के रूप में सेवाओं के बाद, एक बार फिर श्री मोहंती, एनएसडी लौटे हैं। वे पहले भी यहाँ के प्रशासनिक अधिकारी रहे हैं। श्री मोहंती एनएसडी में अब बतौर रजिस्ट्रार सेवाएं दे रहे हैं। उनके सुलझे प्रशासनिक अनुभव का असर भी यहां दिखाई देने लगा है। (फोटो: नाटक ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ के मंचन के बाद रंगमंडल प्रभारी, राजेश सिंह दर्शकों को सम्बोधित करते हुए।)स्त्री प्रधान नाटकों का फेस्टिवल: फेस्टिवल में -‘ख़ूब लड़ी मर्दानी-सुभद्रा की ज़ुबानी, ताजमहल का टेंडर, अभिज्ञान शाकुन्तलम्, माई री मैं का से कहूँ, लैला मजनूं, बायन और अंधा युग जैसे नाटकों को मंचित किया गया। इन नाटकों का निर्देशन क्रमश: भारती शर्मा, चितरंजन त्रिपाठी, प्रो.विदूष रीता गांगुली, अजय कुमार, स्व. ऊषा गांगुली और रामगोपाल बजाज ने किया है। नाटकों के क्रम के अनुरूप लेखक हैं – आसिफ़ अली, अजय शुक्ला, महाकवि कालिदास, विजयदान देथा, इस्माइल चुनारा, महाश्वेता देवी और धर्मवीर भारती। सुभद्रा कुमारी चौहान की अनकही गाथा: नाटक ‘खूब लड़ी मर्दानी’ कवियित्री और स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन से जुड़ी रही लेखिका सुभद्रा कुमारी चौहान पर केंद्रित था। यह नाटक फूलो-झानो, उदा देवी पासी, मूलमती और अज़ीज़न बाई जैसी अकीर्तित महिलाओं को भी, उनके आज़ादी के आंदोलन में दिये गये योगदान को याद करता है। यह आज़ादी के अमृत महोत्सव की नज़रिये से एक सराहनीय बात है। (फोटो: फेस्टिवल में स्व.ऊषा गांगुली की याद। उनके निर्देशित नाटक ‘बायन’ का एक दृश्य। एक स्त्री की कहानी जो अपनी वंश परंपरा के अनुरूप बच्चों का अंतिम संस्कार करती है।) नारी के प्रति संवेदना जगाते नाटक: फेस्टिवल का मूल स्वर नारी प्रधान नाटकों और उससे जुड़े चिंतन पर रहा। ज़्यादातर नाटक स्त्री पात्रों पर केंद्रित रहे। इनमें स्त्री के जीवन और उनसे जुड़ी विसंगतियों को अभिव्यक्त किया गया। माई रे मैं कासे कहूँ, लैला मजनूं और बायन जैसे नाटकों में स्त्री की चरित्रागत भूमिकाओं और उनसे जुड़े मुद्दों को बेहद प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। इनमें सामाजिक परंपराओं के कुचक्र में फंसी स्त्री अपने वजूद के लिये संघर्ष करती नज़र आई। (फोटो: नाटक ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ में राजा दुष्यंत को वन में हुए विवाह की याद दिलाती शकुन्तला।)क्लासिक नाटक में प्रासंगिक बदलाव:  नारी से जुड़े सवालों के बीच ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ जैसा क्लासिक नाटक कहानी के स्तर पर एक बेहतर बदलाव के साथ प्रस्तुत हुआ। नाटक में राजा दुष्यंत विवाह के बावजूद गर्भवती शकुन्तला को पत्नी मानना तो दूर उसे पहचानने से भी इनकार कर देता है। इस अपमान के बाद शकुन्तला, मछली के पेट से प्राप्त होने वाली अंगूठी के साक्ष्य पर निर्भर नहीं रहती बल्कि वह वन लौट जाती है। वन में शकुन्तला एक पुत्र को जन्म देती है। जब दुष्यंत को हुआ सच का भान: कुछ साल बाद जब राजा दुष्यंत को सचाई का पता चलता है, वह शकुन्तला को खोजते हुए वन पहुँचता है। वन में पहुँचकर वह पत्नी शकुन्तला और पुत्र को साथ चलने का आग्रह करता है। मगर तब शकुन्तला पति के साथ राजमहल लौटने से साफ़ इनकार कर देती है। बेशक वह राजा को अपना बेटा सौंप देती है और  कहती है -‘हम औरतें भी स्वतंत्र और स्वावलम्बी होती हैं। तुम्हें जो चाहिये, वह तुम्हें मिल गया। तुम जा सकते हो!’ इस तरह नाटक में पुरानी शकुन्तला की जगह एक नई शकुन्तला का जन्म होता है, जो आज की नारी की तरह सशक्त, स्वाभिमानी और आत्म निर्भर स्त्री का प्रतिनिधित्व करती है। (फोटो: नाटक ‘लैला मजनूं’ में लैला को उस वक्त गहरा धक्का लगता है जब इश्क़ में फ़ना क़ैस उसे एक अजनबी औरत समझकर उसे मुड़कर देखता तक नहीं है।) लैला मजनूं में दम तोड़ता इश्क़: नाटक ‘लैला मजनूं’ सिर्फ सातवीं सदी की इस कहानी को प्रस्तुत कर देने की इतिश्री भर नहीं करता है। अपितु इस नाटक में लैला, समाज के बंधनों में फंसी एक स्त्री के हालात पर सवाल उठाती है। वह भी तब, जब विधवा होकर वह अपने प्रेमी क़ैस के पास पहुँचती है। मगर क़ैस उसके इश्क में पहले ही फ़ना हो चुका है। वह कहता है -‘तुम कौन हो, मेरी लैला तो मेरे अंदर समाई हुई है। (फोटो: नाटक ‘लैला मजनूं’ की मिस्ट्री! बेख़ुद क़ैस।) बता ऐ ख़ुदा! मेरा गुनाह क्या है: अपने आशिक़ को इस दिवानेपन में देखकर, लैला सदमे से भर जाती है। वो जानमाज़ पर बैठकर अल्लाह से सवाल करती है-‘बता ऐ ख़ुदा, क्या मैंने तेरी इबादत में कभी कोई कमी रखी? रमज़ान के महीने में पूरे रोज़े रखे, पाँचों वक्त की नमाज़ अदा की, तेरी हर बात पर अमल किया। मगर फिर भी मुझे ऐसी सज़ा क्यों मिली? क्यों तूने मेरे हक़ में फ़ैसला न किया? अब मैं तेरे सजदे में हूँ, ये जान तेरी है, तू मुझको उठा ले’! माई रे की मर्मांतक कथा: एक स्त्री का होना न होना अर्थहीन है। उसके अस्तित्व की कोई जगह नहीं। न माँ के आँगन में, ना ससुराल में। समाज में उसकी कोई नहीं सुनता। जन्म से लेकर मृत्यु तक उसे सिर्फ परम्पराओं का बोझ निभाना है। यह सार है ‘माई रे मैं कासे कहूँ’ की विचारोत्तेजक प्रस्तुति का। यह नाटक, एक ऐसी दुल्हन की कहानी है, जिसका बनिया बुद्धि वाला पति शादी होते व्यापार के लिये परदेस चला जाता है। सुहाग की सेज़ पर बैठी पत्नी के अरमानों पर यह पहला आघात है। इस बीच एक पेड़ पर रहने वाला भूत दुल्हन की ज़िदंगी में आता है। भूत को दुल्हन से प्यार हो जाता है। भूत को हुआ दुल्हन से प्रेम: भूत नई-नवेली दुल्हन की ख़ूबसूरती पर फ़िदा है। वह उससे सच्चा प्रेम करने लगता है। वह दुल्हन को अपनी कारस्तानी का निशाना नहीं बनाता लेकिन जब वह देखता है कि उसका पति उसे सुहाग की सेज़ पर छोड़कर 5 साल के लिये परदेस जा रहा है, तब वह दुल्हन के जीवन में प्रवेश करता है। भूत की हक़ीक़त जानकर भी दुल्हन उसे स्वीकार कर लेती है। वह उसकी एक बेटी को जन्म देती है। मगर जब यह सच समाज के सामने आ जाता है, तब भूत को एक पोटली में क़ैद कर नदी में बहा दिया जाता है। जबकि दकियानूसी पति, अपनी पुरातन सोच के साथ, फिर उसके जीवन में आ जाता है। इस तरह दुल्हन एक बार फिर उसी परंपरा और पुरातन सोच के चक्रव्यूह का हिस्सा बनने पर मजबूर हो जाती है। (फोटो: पद्मश्री राम गोपाल बजाज निर्देशित नाटक ‘अंधा युग’ का एक दृश्य।) ‘अंधा युग’ के रखे गये 2 शोज़: इन नाटकों के अलावा ‘ताजमहल का टेंडर’ और ‘अंधा युग’ जैसे नाटक हर बार की तरह अपनी बेहतरीन प्रस्तुतियों से यादगार बन गये। ‘अंधा युग’ का फेस्टिवल के अंतिम दिन मंचन हुआ और दर्शकों की माँग की वजह से, इसके दो शोज़ रखे गये। वरिष्ठ रंग निर्देशक पद्मश्री रामगोपाल बजाज निर्देशित इस बेहतरीन नाटक के कुछ समय पहले ही एनएसडी में शोज़ हुए हैं। इसके अलावा ‘ताजमहल का टेंडर’ एक ऐसा नाटक रहा, जिसे देखते वक्त दर्शक लगातार हँसते और तालियां बजाते रहे। (फोटो: नाटक ‘ताजमहल का टेंडर’ के दो मुख्य पात्र। शाहजहाँ जिसे ताजमहल बनवाना है और अजय गुप्ता नाम का वो अफ़सर जो इस सपने को भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा देता है।) भ्रष्ट सिस्टम की भेंट चढ़ा ताजमहल: आपको बता दें, ‘ताजमहल का टेंडर’ नाटक बीते 25 सालों से लगातार खेला जा रहा है। चितरंजन त्रिपाठी निर्देशित इस नाटक के पचासों शोज़ हो चुके हैं। कहने को यह एक हास्य नाटक है। मगर असल में यह नाटक भ्रष्टाचार की परतों को न सिर्फ खोलता है, बल्कि डेमोक्रेसी में ब्यूरोक्रेसी की इस समस्या पर सटीक प्रहार करता है। यह नाटक शाहजहाँ नाम के उस सम्राट की कहानी है, जो अपनी प्रेमिका मुमताज उर्फ मोम्मो की याद में एक ताजमहल बनवाना चाहता है।लाखों खर्च मगर ताज का पता नहीं: ताजमहल बनवाने का काम शहंशाह, अजय गुप्ता नाम के एक अफ़सर को सौंपता है। अजय गुप्ता इस योजना के ज़रिये लाखों रूपयों के हेर-फेर में जुट जाता है। इस योजना के सामने आते ही दूसरे लोग भी अपनी-अपनी तरह से जेबें गरम करने लगते हैं। इस तरह पूरे 25 साल गुज़र जाते हैं। मगर 25 साल बाद भी न ताजमहल बनता है, न ही उसके निर्माण का टेंडर निकल पाता है। जब 25 साल के बाद टेंडर का इश्तेहार लेकर भ्रष्ट अफ़सर शाहजहाँ के पास पहुँचता है, तब तक बूढ़ा हो चुका सम्राट दम तोड़ देता है। इस तरह भ्रष्ट सिस्टम में घिरे शहंशाह का ताजमहल बनवाने का सपना, एक सपना ही रह जाता है। नाटक में शहंशाह के रूप में अजय कुमार का लाजवाब अभिनय है। (फोटो: नाटक ‘बायन’ का एक दृश्य।) बैक स्टेज का बेहतरीन सहयोग: सातों नाटक की प्रस्तुतियों को मंच पर जितने प्रभावशाली ढंग से मंच पर अभिनेताओं ने प्रस्तुत किया। उनकी प्रस्तुतियों के लिये सैट, प्रकाश, मेकअप और वेशभूषा का भी दिलचस्प सहयोग रहा। इसी तरह ताजमहल का टेंडर, माई रे, बायन, अंधा युग जैसे नाटकों के संगीत ने भी दर्शकों को प्रभावित किया। इस सबका श्रेय निश्चित ही नाटक के निर्देशकों के साथ ही, हर विभाग के सहयोगियों को जाता है। स्व. ऊषा गांगुली की आई याद: नाटक ‘बायन’ के निर्देशन के लिये स्व. ऊषा गांगुली जी को याद किया गया। नाटक का प्रतीकात्मक, न्यूनतम सैट यादगार रहा। यह कहानी उस स्त्री की है, जिसपर बच्चों को क़ब्र से निकालकर खा जाने का आरोप है। उसके बायन (डायन) हो जाने आरोप पति ने ही लगाया है। अंत में जब वह डाकुओं को एक तेज़ रफ़्तार ट्रेन से बचाने की जद्दोजहद में ख़ुद कटकर मौत की आगोश में समा जाती है। तब उसका बेटा कहता है – ‘वो बायन नहीं थी, वो एक बहादुर मां थी’! (फोटो: प्रो. रीता गांगुली के साथ लेखक की तस्वीर (बाएं), साथ में कानपुर के डॉ.ओमेन्द्र कुमार।)कल्पना को नया आकाश देता निर्देशन: नाटक ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ के लिये प्रो. विदूषी रीता गांगुली जी का निर्देशन, कल्पनाशीलता के नये क्षितिज को छूने वाला रहा। शास्त्रीय आधार वाले उनके नाटकों में एक अभिनेता के लिये बहुत कुछ होता है। जहाँ पर वह अपने अभिनय से ही जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों या प्रकृति को अभिनीत करता है। नाटक में उन्होंने शकुन्तला के किरदार को आज की नारी के अनुरूप एक नया सशक्त आयाम दिया। सृजनात्मक ऊर्जा से भरपूर रीता जी कहती हैं – ‘मैं सौभाग्यशाली हूं कि मैंने नृत्य,नाटक,संगीत के दिग्गजों से बहुत कुछ सीखा और पाया है। मुझे रंगमंच के नये निर्वहनों की तुलना में आज भी भरत नाट्य शास्त्र का विधान ज्यादा सक्षम और प्रभावी लगता है।’ मुख्य पात्रों के लिये ‘युगल’ प्रयोग: नाटक ‘माई रे’ के संगीत और निर्देशन ने अजय कुमार की क्षमताओं को सिद्ध किया। वे एक बेहतरीन अभिनेता भी हैं। नाटक में दुल्हन और दूल्हे के मुख्य पात्रों को एक्टर्स के तीन जोड़ों द्वारा प्रस्तुत किया जाना दिलचस्प रहा। ‘लैला मजनूं’ में साबरी ब्रदर्स और आबिदा परवीन के संगीत का उपयोग रोचक रहा। मध्य-पूर्व साहित्य के इस नाटक में इस्लामी संस्कृति का पार्श्व संदर्भ भी नज़र आया। परंतु कई जगहों पर नाटक को संपादित किये जाने के साथ ही, पार्श्व संगीत को फिर से संयोजित करने की ज़रूरत महसूस हुई। अंधा युग, अभिज्ञान शाकुन्तलम् और बायन जैसे नाटकों में अनुभवी श्री सौती चक्रवर्ती की प्रकाश योजना ने अचूक और प्रभावशाली रही। (फोटो: नाटक ‘ख़ूब लड़ी मर्दानी-सुभद्रा की ज़ुबानी’ का एक दृश्य।) अगस्त में तमस ला रहा रंगमंडल: इस बीच रंगमंडल के प्रभारी राजेश सिंह ने अगस्त महीने में भारतीय साहित्य की अनमोल कृति ‘तमस’ के मंचन की घोषणा की है। उन्होंने कहा-‘ समर फेस्टिवल में दर्शकों के ज़बरदस्त उत्साह को देखते हुए हमें अतिरिक्त शोज़ भी रखना पड़ा। यह एक अच्छी बात रही। हम आगे भी साहित्य और संस्कृति के लिये रंगमंच के माध्यम से बेहतर काम करते रहेंगे, बेहतर कृतियों को लाते रहेंगे’। उन्होंने विनम्रता से कहा -‘ मैं समझता हूँ कि एक रंगकर्मी के रूप में हमें बड़ी प्रतिबद्ध के साथ आगे बढ़ना होगा। काम की गुणवत्ता के साथ ही सार्थक प्रस्तुतियों पर ध्यान देते रहना होगा। इस दिशा में हमारी कोशिश जारी रहेगी’। ( इस रिपोर्ट के लेखक शकील अख़्तर इंडिया टीवी के पूर्व सीनियर एडिटर और इंदौर स्टूडियो के फाउंडर एडिटर हैं। आप एक कविता संग्रह समेत 7 नाटकों का लेखन कर चुके हैं। उनके दो नाटकों के मंचन एनएसडी मे भी हुए हैं। कलाकारों और कला गतिविधियों पर आप निरंतर लिखते रहते हैं।) आगे पढ़िये –

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