पाले से जूझकर हिम्मत से दो पानी के गेहूं की फसल काट कर निपटे है मंडी में तीन तीन दिनों तक खड़े है कि कुछ रुपया मिले घर के सामान की फिक्र है हमें मिर्ची हल्दी राई लेना है साल भर की तेल जीरा जैसे जरूरी सामान बच्चों की सालाना फीस चुकानी है रिजल्ट रोक रखा है मास्टर ने वरिष्ठ लेखक और रचनाकार संदीप नाईक की किसानों के हालात ( विशेषकर पन्ना में विस्थापित हुए ग्रामीणों की पीड़ा ) बयान करती ये वो कविता है जिसका उन्होंने हाल ही में इंदौर आयोजित वन कप पोएट्री में पाठ किया। इस कवि गोष्ठी में कई युवा कवि भी शामिल हुए। इस कार्यक्रम का आयोजन पोएट्री कॉर्नर इंडिया ने किया था। यहां हम कवि के पाठ का वीडियो आपके लिये शेयर कर रहे हैं।
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