पंकज निगम, इंदौर स्टूडियो। फ़िलिस्तीन में कलाकार होना दरअसल अपने अस्तित्व की आदिम खोज पर निकलना है। यह उस परचम को थामे रहने जैसा है, जो वहां की जनता की उम्मीदों की धड़कन से स्पंदित होता है। यह ध्वंस से कराहती मानवता के भीतर अटूट विश्वास को जीवित रखने की जद्दोजहद है। कलाकार जानता है कि जब सारे हथियार मौन हो जाएंगे, जब मनुष्य के भीतर का पशु हार जाएगा और जब सुबह का सूरज आँगन में खड़े जैतून के दरख़्त के पीछे से हौले से सिर उठाएगा, तब उसकी खोज पूर्ण होगी। वह कलाकार तब स्मित भाव से मुस्कुराएगा, क्योंकि तब थका-हारा पथिक उन चाबियों के साथ अपने घर लौट चुका होगा, जिन्हें सीने से लगाए न जाने कितनी निर्वासित पीढ़ियां गुज़र गईं।
विनीत तिवारी के अनुभव: एक जीवंत साझा: ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ (प्रलेस), दिल्ली द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में राष्ट्रीय सचिव और प्रख्यात लेखक विनीत तिवारी ने अपनी फिलिस्तीन यात्रा के मर्मस्पर्शी अनुभव साझा किए। विनीत जी ने अपना समय वेस्ट बैंक के उन शहरों और गांवों में बिताया जहाँ जीवन और मृत्यु के बीच की लकीर बहुत धुंधली है। वे बेथलेहम, जेरुसलम, जेरिको, नाबलूस और जबाबदह जैसी जगहों पर गए। वहां उन्होंने विद्यार्थियों, किसानों, कामगारों, आंदोलनकारियों और जुझारू ‘बेदुइन’ आदिवासियों से संवाद किया। तिवारी जी ने बताया कि फ़िलिस्तीनी जीवन की जटिलताओं और दुश्वारियों के बीच भी वहां की रचनात्मकता कम नहीं हुई है। वे लगातार पूरे देश में फ़िलिस्तीन की जनता की आवाज़ पहुंचा रहे हैं, ताकि हम उनके दुखों और संघर्षों के साझेदार बन सकें।
कला: जीवंत सभ्यता का प्रमाण: 9 मार्च 2026 के इस कार्यक्रम में विनीत तिवारी ने अपनी बात फ़िलिस्तीनी कलाकारों पर केंद्रित रखी। उनका मानना है कि किसी सभ्यता के जीवंत होने का प्रमाण उसके द्वारा जीते गए युद्ध नहीं, बल्कि उसकी सुरक्षित कला और संस्कृति है। फ़िलिस्तीन की आवाज़ को रंग, आकार और अभिव्यक्ति देने में वहां के कलाकारों का योगदान अतुलनीय है। विनीत जी ने चर्चा के दौरान मलक मत्तार, नबील अनानी और इस्माइल शम्मौत के चित्रों को साझा किया। साथ ही, प्रसिद्ध फ़िलिस्तीनी लेखक नसार अब्राहम से हुई भेंट और उनकी कहानी ‘जूते’ के प्रतीकात्मक अर्थों पर भी प्रकाश डाला। फ़िलिस्तीन में कला केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि ‘उम्मीद का घोषणापत्र’ है। यह वह नारा है जो कैनवास के रंगों, कविताओं और नाटकों के माध्यम से गूँजता है। यह उस पुरसुकून सुबह का सपना है जिसे पीढ़ियों से संजोया जा रहा है और जिसे कोई भी दमन कुचल नहीं सका।
“तलवार टूटी, अश्व घायल
कोहरे डूबी दिशाएं
कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धुंध धूमिल
किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी
…क्योंकि सपना है अभी भी!”
— धर्मवीर भारती
मलक मत्तार: ‘नो वर्ड्स’ और गाज़ा की ग्वेर्निका: लंदन में निर्वासित युवा चित्रकार मलक मत्तार की ब्लैक एंड व्हाइट पेंटिंग ‘No Words’ को “गाज़ा की ग्वेर्निका” कहा गया है। जिस तरह 1937 में पिकासो की ‘ग्वेर्निका’ ने युद्ध की विभीषिका को अमर कर दिया था, मलक की यह कृति गाज़ा में हुई 80,000 से अधिक मौतों और वहां की तबाही का जीवंत दस्तावेज़ है। मलक कहती हैं: “मैं गाज़ा स्ट्रिप में पली-बढ़ी हूँ। मेरा मानना है कि फ़िलिस्तीन में भरपूर जीवन है, लेकिन त्रासदी यह है कि लोग बस थोड़ा सा जीने के लिए छटपटा रहे हैं।” उनकी एक और मर्मस्पर्शी पेंटिंग है—‘Giving Birth in a Prison Cell’। इसमें जेल की कोठरी में जन्म लेते एक बच्चे की आँखों में उस दुनिया का भय साफ़ दिखता है जहाँ उसे आना है। माँ का चेहरा भी ग्लानि और अथाह दुख से भरा है।
नबील अनानी: भविष्य का सकारात्मक कैनवास: 1943 में जन्मे नबील अनानी फ़िलिस्तीनी कला आंदोलन के स्तंभ हैं। उन्हें यासर अराफात द्वारा दृश्य कला के लिए प्रथम राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। अनानी के चित्र उम्मीदों से लबरेज़ हैं। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘In Pursuit of Utopia’ (2020) में क्षितिज तक फैले जैतून के बागों के माध्यम से एक सुनहरे भविष्य की कल्पना की गई है। वे अपनी कला में स्थानीय माध्यमों जैसे चमड़े, मेहंदी, प्राकृतिक रंग और लकड़ी के मनकों का प्रयोग करते हैं, जो मिट्टी से उनके जुड़ाव को दर्शाता है।
इस्माइल शम्मौत: ‘अल नक़बा’ का महाकाव्य: 1930 में जन्मे इस्माइल शम्मौत की कला फ़िलिस्तीन के विस्थापन का सबसे बड़ा साक्ष्य है। 1948 के हमले के बाद उन्हें शरणार्थी शिविरों में रहना पड़ा। उनकी ऐतिहासिक पेंटिंग ‘Where To?’ उस ‘अल नक़बा’ (महाविनाश) की पहचान बन चुकी है, जिसमें 8 लाख फ़िलिस्तीनियों को बेघर किया गया था। यह पेंटिंग एक थके हुए पिता और उसके बेसहारा बच्चों के माध्यम से पूरी दुनिया के विस्थापितों का दर्द बयां करती है।
जैतून: संस्कृति और जड़ें: फ़िलिस्तीन की कला में जैतून का दरख़्त महज़ एक पेड़ नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और बुजुर्गों का आशीर्वाद है। जैतून की जड़ें जितनी गहरी ज़मीन में धंसी होती हैं, फ़िलिस्तीनी जनता का अपनी धरती से जुड़ाव भी उतना ही गहरा है। अबेद आब्दी, समाह शिहादी, फात्मा शानान और फातिमा अबू रूमी जैसे अनगिनत कलाकार आज भी निर्वासन, अपमान और दमन के विरुद्ध अपने रंगों से युद्ध लड़ रहे हैं। ध्वंस से उपजी इस कला पर अभी बहुत कुछ लिखा जाना शेष है, क्योंकि फ़िलिस्तीन के दुखों का फिलहाल कोई अंत नज़र नहीं आता। मैं अपनी बात इन पंक्तियों के साथ समाप्त करता हूँ:
जड़ें,
सिर्फ दरख़्त की नहीं होतीं,
आदमी की भी होती हैं।
चाहे कोई धकियाये,
डराये, रौंद भी दे,
कर दे निर्वासित,
जड़ें, कहीं नहीं जातीं,
वहीं धंसी रह जाती हैं।
कितने भी मुश्किल हालात हों,
जड़ें, उम्मीद नहीं खोतीं,
इंतज़ार करती रहती हैं—लौट आने का।
– पंकज निगम।
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