कला प्रतिनिधि, इंदौर स्टूडियो। उज्जैन की रंग संस्था अभिनव रंगमंडल की मासिक संवाद श्रृंखला में कवि-लेखक, एक्टिविस्ट एवं प्रगतिशील वसुधा के संपादक विनीत तिवारी ने अपने हालिया फ़िलस्तीन प्रवास का आँखों देखा हाल साझा किया। “जैतून में समंदर” शीर्षक से आयोजित इस संवाद में उन्होंने फ़िलस्तीन की जनता के संघर्ष और दु:ख को भावपूर्ण शब्दों में बयान किया।
प्रतिरोध और अस्तित्व की लड़ाई:
विनीत तिवारी ने कहा कि फ़िलस्तीन में होना ही प्रतिरोध और अस्तित्व की लड़ाई है। उन्होंने वहाँ की जनता के दमन, बेदखली और अलगाव के बावजूद परस्पर सहयोग, बंधुत्व और इंसानी जुझारूपन को रेखांकित किया। उनके शब्दों में इज़रायल के जबड़े में फँसा संपूर्ण फ़िलस्तीन श्रोताओं के सामने जीवंत हो उठा। उन्होंने बताया कि जैतून का पेड़ फ़िलस्तीन की पहचान है—हज़ारों वर्षों तक जीवित रहने वाला यह वृक्ष बस्तियों से भगाए गए लोगों के अपने घर लौटने के स्वप्न का प्रतीक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यहूदी होना और यहूदीवादी होना अलग-अलग बातें हैं, जैसे हिंदू और हिंदुत्ववादी होना एक नहीं है।
संवेदना और करुणा की दास्तान:
विनीत तिवारी की प्रस्तुति दास्तानगोई की तरह संवेदनाओं से भरी रही। कभी प्रतिरोध की ज़िद ने आकार लिया, कभी हमदर्दी में आँखें नम हो आईं। श्रोताओं को यह अहसास हुआ कि साम्राज्यवाद किसी एक देश तक सीमित नहीं रहता। संवाद की अध्यक्षता कर रहे डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी ने कहा कि विनीत तिवारी से फ़िलस्तीन के दर्दनाक जीवन और इंसानी स्वप्नों को सुनना निःशब्द कर देने वाला अनुभव है। उन्होंने कहा कि मृत सागर के किनारे जीवित लोगों की जीवनी शक्ति अपराजेय है।
कविताएँ, सवाल और जवाब:
संवाद की शुरुआत में शशिभूषण ने वसुधा में प्रकाशित दो फ़िलस्तीनी कवियों की कविताएँ सुनाईं। वरिष्ठ रंगकर्मी हफ़ीज़ ख़ान, साहित्यकार राजेश सक्सेना और हरिमोहन बुधौलिया ने विनीत तिवारी से सवाल किए। जवाब में उन्होंने कहा कि डरना स्वाभाविक है, लेकिन डर पर विजय ही एक्टिविस्ट का सपना है। उनका मानना है कि संघर्ष का उद्देश्य आने वाली पीढ़ियों को अन्याय और भेदभाव से मुक्त करना है। विनीत तिवारी ने कहा कि फ़िलस्तीन ने उन्हें अभय और आत्मबल दिया। पहली बार उन्हें स्थायी आत्मतोष मिला कि वे फ़िलस्तीन के लोगों से गले मिल सके और उनके संघर्ष से सीख सके।
संवाद को नाट्योत्सव की तरह बढ़ाने का संकल्प: अभिनव रंगमंडल प्रमुख शरद शर्मा ने कहा कि घर में बैठकर चर्चा करने की योजना इतनी सफल संवाद का रूप ले लेगी, यह अनुमान नहीं था। उन्होंने इसे राष्ट्रीय नाट्योत्सव की तरह आगे बढ़ाने का संकल्प व्यक्त किया। संवाद में देवास, इंदौर, उज्जैन के साहित्यकार-पत्रकार, महाराष्ट्र से शोधार्थी और संस्कृतिप्रेमी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन कवि-कहानीकार शशिभूषण ने किया।
मानवीय करुणा, प्रतिरोध और न्याय की पुकार:
अभिनव रंगमंडल की श्रृंखला यह संवाद केवल एक यात्रा-वृत्तांत नहीं था, बल्कि मानवीय करुणा, प्रतिरोध और न्याय की पुकार थी। विनीत तिवारी के शब्दों ने फ़िलस्तीन के संघर्ष को उज्जैन के श्रोताओं तक पहुँचा दिया और यह अहसास कराया कि अन्याय कहीं भी हो, उससे मुँह नहीं मोड़ा जा सकता। तस्वीर में जैतून के पेड़ की जलरंग कृति।
जैतून का पेड़ और फिलीस्तीन की संस्कृति: फ़लस्तीन के पहाड़ी इलाकों — जैसे नाबलुस, हेब्रोन और जेनिन — में फैले जैतून के पेड़ सदियों से वहाँ की पहचान हैं। ये पेड़ न केवल भोजन और तेल का स्रोत हैं, बल्कि पारिवारिक परंपराओं, लोक कथाओं और धार्मिक मान्यताओं में भी गहरे रचे-बसे हैं। यह वृक्ष न केवल जीवन देता है, बल्कि संघर्ष में खड़ा रहना भी सिखाता है। जैतून की खेती फ़लस्तीन की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। हजारों परिवार इसकी फसल पर निर्भर हैं। हर साल का ऑलिव हार्वेस्ट सीज़न न केवल उत्सव का समय होता है, बल्कि कब्जे और प्रतिबंधों के बीच एक शांतिपूर्ण प्रतिरोध होता है। इज़रायल द्वारा भूमि कब्ज़ा और पेड़ों की कटाई के बीच जैतून का पेड़ फ़लस्तीनी लोगों कीजड़ता, दृढ़ता और अस्तित्व के अधिकार का प्रतीक बन गया है। यह विस्थापन के विरुद्ध खड़े होने की ताक़त देता है — जैसे एक बूंद पानी में भी जीवित रहना। फ़लस्तीनी कवियों और कलाकारों ने जैतून को संघर्ष और उम्मीद के प्रतीक के रूप में अपनाया है। यह वृक्ष उनकी रचनाओं में बार-बार लौटता है — कभी दादी की कहानियों में, कभी बच्चों के हाथों में, कभी युद्ध के सन्नाटे में। आगे पढ़िये – दास्तानगोई के लाजवाब शो ‘जो डूबा वो पार’ पर शकील अख़्तर की समीक्षा – https://indorestudio.com/jo-dooba-wo-par-dasatangoi-triveni75/

