Wednesday, June 17, 2026
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अगर मुझे मरना ही है तो मेरे न रहने से भी एक उम्मीद तो जगे

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विशेष प्रतिनिधि, इंदौर स्टूडियो। 8 दिसम्बर 2023 को एक इजराइली बम ने कवि रेफ़ात अल अरीर की हत्या कर दी। रेफ़ात एक बहुत ही साहसी कवि थे जो इजराइल के नरसंहार के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठा रहे थे। मरने से कुछ दिन पहले रेफ़ात ने यह कविता लिखी थी- ‘अगर मुझे मरना ही है / तो मेरे न रहने से भी / एक उम्मीद तो जगे / एक दास्ताँ तो बने’। फिलिस्तीन पर इज़रायली ज़ुल्म के खिलाफ़ आक्रोश और संवेदना से भरा ये कार्यक्रम इंदौर में प्रगतिशील लेखक संघ ने आयोजित किया। कार्यक्रम में इप्टा के साथियों ने भी हिस्सा लिया। इसमें फिलिस्तीनी कवियों के गीत गाये गये, उनकी कविताओं का वाचन हुआ और पेंटर्स के चित्रों के पावर प्वाइंट प्रजेंटेशन के साथ उनकी व्याख्या की गई।वो हमारे गीत क्यों रोकना चाहते हैं: कार्यक्रम की शुरुआत इप्टा इंदौर द्वारा अश्वेत क्रांतिकारी कवि पॉल रॉबसन पर केंद्रित गीत ‘वो हमारे गीत क्यों रोकना चाहते है’ से हुई जिसे तुर्की कवि नाज़िम हिकमत ने लिखा एवं सलिल चौधरी द्वारा संगीतबद्ध किया। उजान, अथर्व एवं विनीत तिवारी ने इस गीत को प्रस्तुत किया। इप्टा के वरिष्ठ साथी विजय दलाल ने विश्व में शांति कायम हो इस पर केंद्रित दो गीत गाए।कैसे हुई प्रलेस की स्थापना: कार्यक्रम में राष्ट्रीय सचिव विनीत तिवारी ने कहा कि प्रगतिशील लेखक संघ का गठन शांति के पक्ष तथा दूसरे विश्वयुद्ध के विरुद्ध हुआ था। सज्जाद ज़हीर, प्रेमचंद सहित अनेक समकालीन लेखकों, कलाकारों द्वारा गठित इस संगठन का विस्तार पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल से होता हुआ एफ्रो एशियाई लेखकों के संगठन के रूप में सामने आया। विनीत तिवारी ने कहा, इजराइल के गठन के बीज 1917 में अंग्रेजों द्वारा ‘फूट डालो राज करो’ की नीति के तहत बालफोर घोषणा द्वारा बोए गए थे। इसकी फसल 1948 में अलग देश इजराइल बनाकर काटी गई। उन्होंने गांधी जी के उस कथन को भी उद्धृत किया जिसमें उन्होंने कहा था कि बेशक यहूदियों पर बहुत अत्याचार हुए हैं, लेकिन पीड़ित होने से उन्हें फिलिस्तीन में रहने वाले लोगों को पीड़ा पहुँचाने का हक़ नहीं मिल जाता। फिलिस्तीनी होना धार्मिक पहचान नहीं है। वो यहूदी भी हैं, मुसलमान भी और ईसाई भी।शस्त्र देने के साथ ख़ैरात भी: प्रलेसं इकाई अध्यक्ष डॉ जाकिर हुसैन ने कहा कि इजरायल द्वारा बड़े पैमाने पर महिलाओं, बच्चों की हत्या की गई है। यूरोपीय देशों का दोगलापन सामने आया है। एक तरफ वे ग़जा में खैरात बांट रहे हैं, दूसरी तरफ इजराइल को नित नए शास्त्र देकर फिलिस्तीनियों के कत्लेआम में मदद कर रहे हैं। भारत सदैव फिलिस्तीन की जनता के पक्ष में रहा है लेकिन वर्तमान सरकार इजराइल के साथ खड़ी है। फिलिस्तीन बस्तियां बनी गैस चैम्बर: प्रलेसं की साथी सारिका श्रीवास्तव ने कहा हिटलर के गैस चैंबर तो चुनिंदा थे, इजराइल ने तो संपूर्ण फिलिस्तीनी  बस्तियों को गैस चैंबर में बदल दिया है। त्रासदी यह है कि फिलिस्तीनियों का टॉर्चर होते सारी दुनिया ‘लाइव’ देख रही है। श्री रामआसरे पांडे ने कहा कि हमें उन कारणों को खोजना होगा जिनके कारण दुनिया में अंधेरा है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साथी चुन्नीलाल वाधवानी ने तौफीक जायद की कविता का पाठ किया। फिलिस्तीन के संघर्ष की प्रस्तुति: कार्यक्रम में विनीत तिवारी द्वारा चित्रों के संयोजन से फिलिस्तीन के संघर्ष को दिखाया। उन्होंने फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्म “मत रो बच्चे”, महमूद दरवेश की कविताएं “रीटा और राइफल, लिखो – मैं एक अरब हूँ” का भी प्रभावी पाठ किया। पटना (बिहार) से आईं प्रलेस की साथी सुनीता ने रेफ़ात अल अरीर की कविता “अगर मुझे मरना ही है” का पाठ किया जिसका अंग्रेज़ी से अनुवाद अर्चिष्मान राजू ने किया था। 8 दिसम्बर 2023 को एक इजराइली बम ने कवि रेफ़ात अल अरीर की हत्या कर दी। रेफ़ात एक बहुत ही साहसी कवि थे जो इजराइल के नरसंहार के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठा रहे थे। मरने से कुछ दिन पहले रेफ़ात ने यह कविता लिखी थी- अगर मुझे मरना ही है / तो मेरे न रहने से भी / एक उम्मीद तो जगे / एक दास्ताँ तो बने।पीड़ा को वैश्विक संवेदना की जरूरत: आयोजन के अंत में आभार व्यक्त करते हुए प्रलेसं इकाई सचिव हरनाम सिंह ने कहा कि फिलिस्तीन की पीड़ा को वैश्विक संवेदना की जरूरत है। जब तक जुल्म, अन्याय और अत्याचार जारी रहेगा, तब तक उसका प्रतिरोध भी बना रहेगा। इप्टा इकाई सचिव प्रमोद बागड़ी, अशोक दुबे, विवेक मेहता, अंजुम पारेख, विजया देवड़ा, अनुराधा तिवारी, हेमलता, रुद्रपाल यादव, दिलीप कौल, भारत सिंह, पत्रकार दीपक असीम, युवा साथी, मानस, विवेक, नितिन, आदित्य, विकास की उपस्थिति महत्त्वपूर्ण थी। https://indorestudio.com/

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