पत्रिका – सुख़नवर
सम्पादक- अनवारे इस्लाम
अंक – जुलाई अगस्त 2018 मूल्य – पच्चीस रूपये ?
सम्पर्क – सुख़नवर – सी 16 , सम्राट कालोनी , अशोका गार्डन , भोपाल – 462023
फोन न. 0755-2570268 , मो.न. 9893663536 , 7000568495
(अखतर अली )। बुरे व्यक्ति के आचरण को नष्ट कर उसे अच्छे व्यक्ति की पंक्ति में खड़ा करना ही साहित्य का उद्देश्य
होता है। बकौल सम्पादक अनवारे इस्लाम – द्विमासिक पत्रिका सुख़नवर हिंदी उर्दू का साहित्यिक मंच है। इसी तरह की एक पत्रिका जोधपुर से हसन जमाल निकला करते थे , नाम था “शेष”। उर्दू और हिंदी के रचनाकारों का यह मिलन स्थल का भ्रमण हर उस साहित्य प्रेमी को करना चाहिये जिसे नये और बेहतर की तलाश रहती है , हिंदी लिपि में प्रकाशित यह पत्रिका सुख़नवर का नया अंक डाक से पंहुचा। जब से सुख़नवर का अंक घर आया है मै घर में नहीं सुख़नवर में रहने लगा हूँ । किसी भी पत्रिका का बाहरी आवरण जब तक आकर्षक न हो उसकी अन्दर दाखिली मुश्किल हो जाती है। मुख्य पृष्ठ दाखिली का दावतनामा होता है जो मुख पृष्ठ का दरवाज़ा खोल अन्दर के व्यंजनों का स्वाद लेने के लिए विवश कर देता है। सम्पादक अनवारे इस्लाम ने हिंदी और उर्दू के रचनाकारों के पद्द और गद्द दोनों को शामिल किया है , इसमें कहानी , ग़ज़ल , कविता और चिंतन सभी शामिल है। पद्द की अपेक्षा गद्ध कम है पर कम हमेशा ज़्यादा पर भारी पड़ते है , यहाँ भी पड़े। पत्रिका के इस अंक का सबसे ख़ास और अहम् हिस्सा पृष्ठ 12 से पृष्ठ 15 तक का है , यहाँ ज़किया जुबैरी की कहानी “मारिया” मौजूद है। कहानी में लेखिका ने भाव और भाषा को निहायत ही खूबसूरत अंदाज़ में पिरोया है। कहानी संस्मरण और निबंध जैसे अंदाज़ में रची गई है , बेहद साधारण कथ्य की यह कहानी अपने असाधारण शिल्प के कारण पसंद की जायेगी।ज्ञान चतुर्वेदी जी का व्यंग्य ” मै और बकरी ” इस अंक का एक अन्य आकर्षण है। नर्म लहजे की यह कड़क रचना व्यंग्य लेखन को लेखन की दिगर शैली की रचनाओं में खुद को अलग अंदाज़ में स्थापित करती है । व्यंग्य लेखन का एक सबब होता है । यह कोई हंसी ठिठोली नहीं है , मौज मस्ती न समझियो ।यह एक मिशन है , एक आन्दोलन है | व्यंग्य का मकसद खिल्ली उड़ाना नहीं होता। व्यंग्य का मकसद तो संदिग्धों की चूल्हे हिला देना होता है । मौजूदा समय में और अधिक व्यंग्य लेखन होना चाहिए था लेकिन नहीं हो रहा है । अधिक क्यों होना चाहिए था ? इसलिए होना चाहिए था कि व्यंग्य लेखन के लिए कच्चा माल सरकार मुहय्या कराती है और मौजूदा सरकार ने इसमें कोई कमी नहीं की है , पूरा मंत्रीमंडल व्यंग्यकारो पर मेहरबान है ।
सुखनवर अन्य पत्रिकाओं से अलग महसूस होती है क्योकि इसमें पत्रकारिता की भव्यता को नहीं पवित्रता को महत्व दिया गया है । इसे वह माध्यम बनाने का इमानदाराना प्रयास माना जाये जहां मकसद पढने का शौक रखने वालो तक बेहतर साहित्य पहुचाना होता है। सुखनवर के अन्य आकर्षण है सवजीत का चिंतन “विश्व बैंक की आँखों में चुभते श्रम कानून ” , प्रेमचंद की कहानी “मिस पद्मा ” , दिनेश चौधरी का व्यंग्य ” बीच का रास्ता नहीं होता , बाबू रंगनाथ “……. इसके अतिरिक्त प्रदीप चौबे , मेराज नकवी , मंज़र भोपाली की गज़ले अंक को पठनीय बनाती है । साहित्य के शौकिनो के लिए सुखनवर सा तोहफ़ा देने के लिए सम्पादक अनवारे इस्लाम का शुक्रिया ।

