ये न थी हमारी क़िस्मत के विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इन्तज़ार होता गालिब की ये वो मशहूर ग़ज़ल थी जिसे पिनाज़ मसानी की आवाज़ में एक बार फिर सुनकर ग़ज़लों के शौकीन दाद दे रहे थे। बहुत से सुनने वालों को गालिब यह ग़ज़ल याद भी थी। इसलिये इसके शेरों पर भी पिनाज़ मसानी को वो शौक से सुन रहे थे और वाह-वाह कर रहे थे। तेरे वादे पर जिये हम तो ये जान झूठ जाना
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता
इंदौर में संस्कृति विभाग के उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी यह कार्यक्रम आयोजित किया था। इसमें पिनाज़ ने अपने ख़ास अंदाज़ में ग़ज़लें गाकर श्रोताओं का दिल जीतने की कोशिश की। यह बात और है कि उनके इस कार्यक्रम में सुनने वालों की संख्या बहुत कम थी । इसी बात को देखकर पिनाज़ को अपने इंदौर में हुए अपने 15 साल पुराने उस प्रोग्राम की याद आई,जब सर्दी के बावजूद देर रात तक श्रोता उन्हें पूरे दिल से सुनते रहे थे। बहरहाल इंदौर युनिवर्सिटी के आईएमएस ऑडियोटोरियम में उनका कार्यक्रम भी आहिस्ता-आहिस्ता तपिश पैदा करने लगा।

पिनाज़ ने अपनी गायकी की शुरुआत दाग़ देहलवी के कलाम से की –’कहाँ थे रात को हमसे ज़रा निगाह मिले / तलाश में हो कि झूठा कोई गवाह मिले।‘ इसके बाद पिनाज़ ने अपने अलबम ‘मज़्मुआ’ से चुनी मुमताज़ राशिद की लिखी गज़ल-”पहली नज़र, नज़र से मिलाने का शुक्रिया ,फिर अपनी ज़िंदगी में बसाने का शुक्रिया “। इसके बाद कई और अलबमों से चुनिंदा ग़ज़लें उन्होंने अपने ख़ास अंदाज़ में सुनाई। निदा फ़ाज़ली का कलाम भी पढ़ा गया कि “बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो /चार किताबें पढ़कर ये भी हम जैसे हो जायेंगे”.. बेगम अख़्तर को भी खिराजे अक़ीदत पेश की..’ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया।“ इसके बाद गालिब की ग़ज़िल, ये ना थी हमारी क़िस्मत और फिर दमादम मस्त कलंदर और छाप तिलक सब छीन ली मौसे नैना मिलाय के, से महफ़िल को अंजाम तक पहुंचाया। रईस शाह ने वायलिन, शाहिद खां ने की बोर्ड, हारमोनियम पर फ़रीद अहमद खां और तबले पर सलीम अहमद ने संगत की। कार्यक्रम का संचालन आकाशवाणी की मोना ठाकुर ने किया। साउंड सिस्टम की गड़बड़ी इस कार्यक्रम की एक बड़ी कमी रही। – जावेद अहमद शाह ख़ान “अल-हिंदी”

