कला प्रतिनिधि, इंदौर स्टूडियो। विज्ञापन जगत के सिरमौर और प्रख्यात ‘एड गुरु’ स्वर्गीय पद्म भूषण पीयूष पांडे की 71वीं जयंती के अवसर पर राजधानी दिल्ली के मंडी हाउस स्थित श्री राम सेंटर में पहले और भव्य दो दिवसीय “पीयूष रंग महोत्सव” का आयोजन किया गया। रामा थियेटर नाट्य विद्या (रतनव) और स्व. पीयूष पांडे की बहन सुश्री रमा पांडे के निर्देशन में आयोजित इस नाट्य महोत्सव में कला, संस्कृति और रंगमंच का अनूठा संगम देखने को मिला। इस दौरान उत्कृष्ट नाट्य प्रस्तुतियों के साथ-साथ साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान देने वाली विभूतियों को सम्मानित भी किया गया।
महोत्सव के विशेष अवसर पर दो प्रमुख सम्मान प्रदान किए गए: संस्कृतश्री फॉर प्रेज़र्विंग कल्चर ऑफ इंडिया: यह सम्मान इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) के सदस्य सचिव श्री सच्चिदानंद जोशी को भारतीय संस्कृति के संरक्षण में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया गया। साहित्यश्री सम्मान: यह पुरस्कार 99 वर्षीय वयोवृद्ध साहित्यकार पद्मश्री श्रीमती शीला झुनझुनवाला को उनके दीर्घकालिक साहित्यिक अवदान के लिए अर्पित किया गया।
यह सम्मान संस्कृति के मौन संवाहकों के नाम: सम्मान ग्रहण करने के बाद श्री सच्चिदानंद जोशी ने विनम्रतापूर्वक कहा कि यह सम्मान उनका नहीं, बल्कि उन करोड़ों लोगों का है जो संस्कृति के क्षेत्र में चुपचाप समर्पित हैं। स्व. पीयूष पांडे को याद करते हुए उन्होंने कहा कि वे एक महान व्यक्तित्व थे; उनके एक मिनट के विज्ञापन अक्सर 2–3 घंटे की फिल्मों से अधिक गहरा प्रभाव छोड़ते थे। आज विज्ञापन जगत में संवाद की जिस प्रभावशाली शैली का उपयोग होता है, उसका सबसे बड़ा श्रेय पीयूष पांडे जी को ही जाता है।
पीयूष एक ‘वन-लाइनर मास्टर’ थे: सुश्री रमा पांडे ने अपने भाई को याद करते हुए भावुक शब्दों में कहा, “पीयूष एक ‘वन-लाइनर मास्टर’ थे। वे एक पंक्ति लिखते थे, और उसमें पूरी ज़िंदगी उतर आती थी। उनका हर विज्ञापन अपने आप में एक संपूर्ण कविता और सशक्त नाटक होता था।” उन्होंने बताया कि एक बहन, निर्देशक और लेखिका होने के नाते उन्हें लगा कि पीयूष जी के लिए सबसे उपयुक्त श्रद्धांजलि एक ‘नाट्यांजलि’ ही हो सकती है। इसी विचार से प्रेरित होकर उन्होंने पीयूष जी के वन-लाइनर्स से ये कहानियाँ रचीं।
पहला दिन: ‘दरख़्त-ए-आज़ादे-हिन्द’ का सशक्त मंचन: महोत्सव के पहले दिन नाटक ‘दरख़्त-ए-आज़ादे-हिन्द’ का मंचन हुआ। सुश्री रमा पांडे ने बताया कि यह नाटक उनके कहानी-संग्रह ‘सप्तपर्णी’ का हिस्सा है, जिसे पिछले वर्ष विश्व पुस्तक मेले में विमोचित किया गया था और 13 अप्रैल को पीयूष जी की सालगिरह पर उन्हें भेंट किया गया था।
यह कहानी उत्तर प्रदेश के एक गाँव के 200 साल पुराने नीम के पेड़ (“नीम महाराज”) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो भारत की आज़ादी की लड़ाइयों का साक्षी रहा है। चौधरी परिवार के लिए यह पेड़ एक पूर्वज के समान है। जब विकास के नाम पर इसे काटने की नौबत आती है, तो परिवार की मुखिया—चौधराइन—अकेले ही इसके रक्षण के लिए अपनी जान दाँव पर लगा देती है। यह नाटक मंच पर उन सभी स्वतंत्रता सेनानियों के जज़्बे को जीवंत कर गया जिन्होंने धरती की रक्षा के लिए प्राण न्यौछावर किए थे।
दूसरा दिन: ‘ठाकुर ज़ालिम सिंह’ के साथ भावपूर्ण समापन: महोत्सव का समापन रमा पांडे द्वारा लिखित व निर्देशित एक अन्य सशक्त नाटक ‘ठाकुर ज़ालिम सिंह’ से हुआ। भगवद्गीता के मूल संदेश—“कर्म करते जाओ, फल की इच्छा मत करो”—पर आधारित यह नाटक सही कर्म का बीज बोने की प्रेरणा देता है। यह राजस्थान के एक निर्दयी शासक की रोमांचक कथा है जो लोभ, सत्ता और शक्ति की लालसा से संचालित होता है, जबकि नायक करुणा और न्याय के मार्ग पर चलता है। नाटक दर्शकों के मन में एक गहरा मनोवैज्ञानिक प्रश्न छोड़ता है: क्या एक खलनायक आत्म-परिवर्तन कर सकता है, या वह अपने ही अंधकार में खो जाता है?
आगामी संकल्प: ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’: महोत्सव के समापन पर सुश्री रमा पांडे ने दिल्ली के दर्शकों, कलाकारों और सहयोगियों का हृदय से आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह महोत्सव पीयूष पांडे के सृजनात्मक दृष्टिकोण की एक भावनात्मक यात्रा रहा। उन्होंने संकल्प लिया कि अगले वर्ष यह महोत्सव और नई ऊर्जा के साथ लौटेगा, जहाँ कला और संस्कृति के सुर एक होंगे—‘मिले सुर मेरा तुम्हारा, तो सुर बने हमारा।’ आयोजकों का मुख्य प्रयास ग्रामीण वाचिक परंपराओं और लोक कथाओं को राष्ट्रीय रंगमंच पर लाकर उन्हें नई पहचान और सम्मान दिलाना होगा। आगे पढ़िये – शूर्पणखा का दमित स्वर और देह का विद्रोह https://indorestudio.com/shurpanakha-play-dhaumi-kitha-kitha-dhaumi-review/
रंगमंच के जरिए एड गुरु को दी गई ‘नाट्यांजलि’
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