कला प्रतिनिधि,इंदौर स्टूडियो। भोपाल में भारत रंग महोत्सव का नाटक ‘बूढ़ी काकी’ के मंचन के साथ आगाज़ हो गया है। यहां पर कुल छह नाटकों का प्रदर्शन हो रहा है। यह नाटक हर रोज़ भारत भवन के अंतरंग में खेले जा रहे हैं। एक अच्छी बात यह भी है कि सभी नाटक दर्शकों के लिये नि:शुल्क रखे गये हैं।
वाणी त्रिपाठी की पुस्तक का विमोचन: इस महोत्सव की औपचारिक शुरूआत भारत भवन के अंतरंग सभागृह में हुई। इस अवसर पर सुश्री वाणी त्रिपाठी की पुस्तक why can’t elephants be red ? का विमोचन किया गया। दिल्ली में भी इसके विमोचन का एक समारोह हुआ है। कार्यक्रम में प्रख्यात अभिनेता और रंग निर्देशक राजीव वर्मा, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक प्रो.रमेश चंद्र गौर, फिल्म निर्देशक रूमी जाफ़री, केन्द्रीय फिल्म एवं प्रमाणन बोर्ड की सदस्य और अभिनेत्री, निर्माता वाणी त्रिपाठी टिक्कू के साथ ही एमपीएसडी के निदेशक टीकम जोशी और संस्कृति संचालनायालय के संचालक अदिति कुमार त्रिपाठी मौजूद थे।
स्वर्ग रेपेर्टरी,प्रयागराज की प्रस्तुति बूढ़ी काकी: पहले दिन प्रयागराज के स्वर्ग रेपर्टरी के नाटक “बूढ़ी काकी” का मंचन हुआ। मुंशी प्रेमचंद लिखित इस नाटक का निर्देशन अतुल यदुवंशी ने किया है। नाटक में सभी कलाकारों ने बेहद सशक्त अभिनय किया है। यह नाटक कई बार खेला गया है। इसके बावजूद इसकी प्रभावशाली रचना और प्रस्तुति दर्शकों को बाँधकर रखती है। अतुल यदुवंशी ने एक घंटे की इस प्रस्तुति के लिये ज़बरदस्त कल्पना शक्ति का परिचय भी दिया है।
यह कहानी नाम के अनुरूप एक बूढ़ी काकी की कहानी है। काकी के पति को स्वर्ग सिधारे काफी समय हो चुका था। बेटे जवान हो होकर चल बसे थे। अब एक भतीजे बुद्धिराम के सिवाय कोई और नहीं है।
बुद्धिराम का तिलक और काकी की बेचैनी: बुद्धिराम के बड़े लड़के का जब तिलक आता है तब घर घी और मसाले की महक फैलने लगती है। बूढ़ी काकी किसी बच्चे की तरह पुड़िया खाने के लिये बैचेन हो जाती हैं। जिस वक्त बढ़िया भोजन मेहमानों को परोसा जा रहा होता है, उसी समय बूढ़ी काकी अपने मैले-कुचैले कपड़ों में पहुंच जाती है। उनके आने को लेकर कई तरह की बातें होने लगती हैं। 
अंत:करण को झंकृत करती कहानी: बुद्धिराम गुस्से में आकर अपनी काकी को अँधेरे कमरे में बंद कर देते है। बूढ़ी काकी विवश है। उधर सभी मेहमानों के बाद दूसरे लोग भी भोजन कर जा चुके हैं। मगर काकी से कोई नहीं पूछता है। तब बेहद भूखी बूढ़ी काकी झूठे पत्तलों से जूठन खाने लगती है। इस तरह प्रेम चंद की ये कहानी दर्शकों को अंदर तक झकझोरकर रख देती है। सोचने पर विवश करती है। भोपाल में नाटक की इस अच्छी शुरूआत के साथ ही बायन जैसे सशक्त नाटक का भी मंचन हो चुका है। इसके साथ ही यहाँ पर रक्ताक्टो झरोखा, हंसुली , मैकबेथ और फ्रीडम ऑफ चाइस भी मंचित किये जायेंगे। अच्छी बात यह है कि भोपाल के दर्शकों के लिये सभी नाटक निःशुल्क रखे गये हैं।

