Wednesday, April 15, 2026
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‘प्यार किया तो डरना क्या’ …मंच पर ‘मुगल-ए- आज़म’ का हिट सफ़र जारी

इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम,(शकील अख़्तर)। रंगमंच को एक नई बुलंदी पर पहुंचाने वाले शो ‘मुगल-ए-आज़म’ को हाल ही में दिल्ली में देखने का अवसर मिला। 6 अप्रैल से दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में इसके हाऊस पैक शोज़ जारी है। यह सच है कि 1960 में के.आसिफ़ के निर्देशन में बनी बनकर रिलीज़ हुई मुगल-ए-आज़म एक असाधारण फिल्म है जिसका जादू साठ साल बाद भी खत्म नहीं हुआ है। 2017 में जब पहली बार फिरोज़ अब्बास खान ने मुगल-ए-आज़म को मंच पर लाने का काम किया,तब इस बात में कुछ संशय था कि क्या मंच पर भी इस फिल्म का वही जादू चल सकेगा। निर्देशक फिरोज़ अब्बास ख़ान दिन रात इसी फिक्र में डूबे थे। मंच पर वो फिल्म की तमाम ख़ासियतों को ध्यान में रखते हुए भी अपनी तरह से एक-एक पल जीवंत करने में जुटे हुए थे.. और ऐसा वो कर भी सके। दिल्ली में इस शो का तीसरा सीज़न चल रहा है। मंच पर काम करने वाले कलाकारों से लेकर लाइट,सैट,डिज़ाइन,मेकअप,कॉस्ट्यम,नृत्य,संवाद और संगीत की तारीफ़ करते नहीं थक रहे।महसूस कर रहा था बड़ी ज़िम्मेदारी : निर्देशक फिरोज़ अब्बास ख़ान कहते हैं, मुगल-ए-आज़म को मंच पर लाते हुए मैं दर्शकों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी महसूस कर रहा था। उनके प्रति एक वादा था, जो मुझे पूरा करना था। मंच पर फिल्म के उसी अमर संगीत के बारे में वो बताते हैं-‘जब पहली बार मैंने म्युज़िकल प्ले के बारे में सोचा, तब बस मुगल ए आज़म का ही खयाल आया। मुझे लगा, प्रेम कहानी और संगीत के लिहाज से इससे बड़ी फिल्म और क्या हो सकती है ? मुझे लगा इसमें रंगमंच के लिये सबकुछ है, कमाल की कहानी, जबरदस्त टकराव और अमर संगीत। वे कहते हैं, फिल्म में अनारकली की सशक्त भूमिका मुगल-ए-आज़म की एक बड़ी बात है। ‘परदा नहीं जब कोई खुदा से बंदों से परदा करना क्या’.., ये वो ऐलान है जो एक शहंशाह के सामने एक कमज़ोर मगर सशक्त नारी करती है। यह बात दर्शकों को झकझोर देती है। अनारकली का गुनाह इतना ही तो था कि उसने प्यार किया।

रंगमंच को दी एक नई बुलंदी : नाटक में अकबर का मुख्य किरदार निभाने वाले निसार खान कहते हैं, ‘इस आलीशान प्रस्तुति ने मंच को सच में एक नई बुलंदी पर पहुंचा दिया है। ऐसा हुआ है तो इसकी एक ही वजह है,के.आसिफ़ की तरह इस नाटक को मंच पर पेश करने के पीछे फिरोज़ अब्बास ख़ान की लगन और समर्पण। इसके साथ ही, उनकी चुनी पेशेवर टीम और तकनीशियन जिन्होंने इस टाइमलैस एपिक को भव्य बना दिया है। नाटक के लिये सैट से लेकर पोशाकों तक हर चीज़ अपनी और बेहद करीने से तैयार की गई है। मंच पर सैट, लाइट और कॉस्ट्यूम हर दृश्य में ऐसा नज़ारा पेश करते हैं कि दर्शक विस्मित हुए बिना नहीं रहते। कई जगहों पर वे बार-बार तालियां बजाने पर मजबूर हो जाते हैं। इस ब्रॉडवे स्टाइल पेशकश की ख़ासियत मनीष मल्होत्रा की कॉस्ट्यूम डिज़ाइन है। उन्होंने करीब 550 ड्रेसेस इस शो के लिये ही तैयार की हैं। हर किरदार को वो जैसे मुगलों दौर में पहुंचा देते हैं। इस शो की टीम में 350 कलाकार शामिल हैं। इनमें 30 कथक कलाकार भी शामिल हैं।  नाटक में लाइव संगीत हैरान करता है  : नृत्य करते हुए मंच पर लाइव गाना किसी भी कलाकार के लिये चुनौती हो सकता है। नाटक में अनारकली की भूमिका निभाने प्रियंका बर्वे या नेहा सरगम निभाती हैं। दोनों ही बेहतरीन गायिकाएं भी हैं। मंच पर अनारकली को कुछ दृश्यों में नृत्य के दोनों को लाइव ही गाना पड़ता है। प्रियंका कहती हैं, ‘यह एक चुनौती पूर्ण काम है। इसके लिये मुझे खुद को फिट बनाये रखना पड़ता है। योगा करना पड़ता है। नींद का पूरा खयाल रखना पड़ता है। इसके साथ ही आवाज़ और रियाज़ पर। तब जाकर मंच पर लाइव परफॉम कर पाती हूं।‘ नाटक में दर्शकों को यह सूचना भी दी जाती है,अपने मोबाइल फोन स्विच्ड या साइलेंट मोड पर रखें ताकि लाइव सिंगिग में खलल ना पड़े। शो के आख़िर में जब कलाकारों का परिचय कराया जाता है तब भी अक्सर दर्शकों के सामने प्रियंका या नेहा  ‘प्यार किया तो डरना क्या’ जैसे गीत की कुछ लाइनें गाकर सुनाती हैं।लताजी के संदेश से होती है नाटक की शुरूआत:  नाटक की शुरूआत लताजी के एक आत्मीय ऑडियो संदेश से होती हैं। वे अपने संदेश में याद करती हैं, संगीतकार नौशाद के अमर संगीत को,फिल्म के लिये गाये अपने गीतों को। आपको बता दें, दिलीप कुमार,मधुबाला अभिनीत इस फिल्म में लताजी  ने पूरे 9 गीत गाये हैं। हर गीत को नौशाद साहब ने यादगार सुरों में बाँधा हैं। लताजी संदेश में फख्र से बताती हैं, ‘बेकस पर करम कीजिये सरकार- ए-मदीना पर’, नौशाद साहब ने उनकी बेहद तारीफ की थी। कहा था,- ‘लताजी हिंदू मज़हब से ताल्लुक रखती हैं, लेकिन उन्होंने इस कलाम को जिस खूबी से गाया है, वो कमाल की बात है।‘ वे फिरोज़ अब्बास खान को मंच पर ‘मुगल-ए-आज़म’ को पुर्नजीवित करने के लिए बधाई देती हैं, के. आसिफ के साथ ही शापूरजी पलौंजी मिस्त्री को दिल से याद करती हैं।

स्व.शापूरजी को सच्ची श्रद्धांजलि : कहा जाता है फिल्म के फाइनेंसर शापूरजी पालौनजी को फिल्म में नहीं नाटकों में दिलचस्पी थी। वे पृथ्वीराज कपूर के नाटक देखा करते थे, उन्हीं के सुझाव पर के.आसिफ की फिल्म को प्रोड्यूस करने का फैसला किया था। इस तरह से फिरोज़ अब्बास ख़ान का यह नाटक शापूरजी को सच्ची श्रद्धांजलि भी पेश करता है। यहां ये बताना ज़रूरी है कि पृथ्वीराज कपूर निर्देशक के आसिफ़ को एक जुनूनी फनकार कहते थे। आसिफ़ ने 3 फिल्में ही निर्देशित की , इसमें एक उनके वक्त में बन नहीं सकी लेकिन मुगल-ए-आज़म ने उनका नाम फिल्म इतिहास में पन्नों में हमेशा के लिये दर्ज कर दिया। नाटक का जब मंच पर प्रदर्शन होता है, तब स्टेज के दोनों तरफ स्क्रीन पर पूरे ड्रामा की स्क्रिप्ट अंग्रेज़ी में स्क्रोल होती रहती है। ताकि उर्दू-हिंदी ज़ुबान को ना समझने वाले भी आसानी से बागी सलीम और सम्राट अकबर के बीच टकराव को पूरी शिद्दत से महसूस कर सकें। अनारकली की लव स्टोरी की वजह से एक बादशाह के साम्राज्य के सामने खड़े सकंट की गहराई को समझ सके।

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2 COMMENTS

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