शैलेश सिंह, इंदौर स्टूडियो। भारत में चित्रकला, मूर्तिकला, काष्ठकला और भित्तिचित्र (जैसे मिथिला, वारली या कोहबर) जैसी रूपंकर कलाओं की एक समृद्ध और लोकप्रिय परंपरा रही है। लेकिन, छायांकन (फोटोग्राफी) को कला के शिखर तक ले जाने का ऐतिहासिक काम रघु राय की खींची तस्वीरों ने किया। 26 अप्रैल को इस महान छायाकार का निधन हो गया। उनके निधन के साथ ही फोटोग्राफी की दुनिया की सबसे रौशन और संवेदनशील आँखें भी हमारे बीच से विदा हो गईं। रघु राय एक ऐसे अद्भुत फोटो ग्राफर थे, जिन्होंने अपने कैमरे में भारत की आत्मा को क़ैद किया। ऐसी तस्वीरें खींची जो हमारी यादों में हमेशा के लिये बस गईं।
रघु राय का जन्म 942 में संयुक्त पंजाब के झांग (अब पाकिस्तान) में हुआ था। वे अपने माता-पिता की चौथी संतान थे। बंटवारे के बाद उनका परिवार भारत आ गया। रघु राय ने अपनी शुरुआत एक सिविल इंजीनियर के रूप में की थी और वे पंजाब सरकार के सिंचाई विभाग में कार्यरत थे। उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह शख़्स आगे चलकर भारत का सबसे सम्मानित फोटो जर्नलिस्ट बनेगा।
1962 में उन्होंने अपने बड़े भाई और जाने-माने फोटोग्राफर एस. पॉल से छायांकन की बारीकियां सीखीं। उनके पहले फोटोग्राफ की कहानी बेहद दिलचस्प है। एक मित्र के साथ छुट्टियां बिताने गांव जाते समय उन्होंने यूं ही एक गधे के बच्चे (बेबी डंकी) की तस्वीर श्वेत-श्याम में खींची थी। उनके भाई ने वह तस्वीर लंदन के एक प्रतिष्ठित अखबार में भेज दी, जहां वह आधे पृष्ठ पर उनके नाम के साथ छपी। इसी एक संयोग ने फोटोग्राफी की दुनिया में उनके क़दम मज़बूती से जमा दिए।
1966 में अंग्रेजी दैनिक ‘द स्टेट्समैन’ से बतौर फोटोग्राफर जुड़ने के बाद उनकी कलात्मकता निखरने लगी। बाद में, महान फ्रांसीसी फोटोग्राफर हेनरी कार्टियर-ब्रेसन के सान्निध्य में उन्होंने कैमरे की बारीकियां, दृश्यों के संयोजन और प्रकाश-अंधकार के अनुपात को समझा। रघु राय के चित्रों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे संवाद करते हैं। उनका खींचा गया एक पल (फ्रैक्शन ऑफ सेकंड) मानो पूरा इतिहास और उस क्षण की मुकम्मल दास्तान बयां कर देता है।
रघु राय की कला का वैशिष्ट्य यह है कि उनकी छवियां दर्शक को दृश्य का हिस्सा बना लेती हैं। उनकी तस्वीर देखते हुए आप महज एक ‘दर्शक’ नहीं रह जाते, बल्कि उस घटना के ‘भोक्ता’ बन जाते हैं; सहसा आप उसी जलसे या वाकये के भीतर खुद को खड़ा पाते हैं।
रघु राय की फोटोग्राफी में भारत का जीवंत इतिहास दिखाई देता है। उन्होंने आज़ाद भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक इतिहास को अपने लैंस से रचा है। उनके कैमरे ने भारत के मेलों और कस्बाई जीवन को अमर कर दिया। चाहे वह इलाहाबाद के कुंभ की विराट आस्था और आध्यात्मिक ऊर्जा हो, बनारस के घाटों और गलियों में ठहरी हुई समय की स्थिरता हो, या ददरी, सोनपुर और पुष्कर का मेला—सब उनकी तीसरी आंख से साकार होकर कला प्रेमियों के जीवन का हिस्सा बन गए। ऊपर दी गई तस्वीर कोलकाता के हुगली नदी के तट की है। कहने की ज़रूरत नहीं, उन्होंने भारतीय जीवन—बाज़ार, भीड़, बारिश और रोज़मर्रा के दृश्यों—को असाधारण कलात्मकता के साथ प्रस्तुत किया।
उनकी ‘ताज‘ शृंखला ने दुनिया भर के फोटो प्रेमियों का ध्यान खींचा। यह सीरीज़ केवल एक भव्य इमारत का दस्तावेज़ीकरण नहीं है, बल्कि यह संगमरमर और मानवीय संवेदनाओं के बीच के जीवंत संवाद की एक मुकम्मल दृश्य-कविता है।
70 और 80 के दशक में खींची गई यह सीरीज़ और 1986-87 में उषा राय के साथ प्रकाशित उनकी कॉफी-टेबल बुक आज सांस्कृतिक महत्व के साथ एक दुर्लभ कलेक्शन के किताब का दर्जा रखती है। इस सिरीज़ में आसपास का जीवन, पर्यटक और स्थानीय लोग भी शामिल होकर इसे मानवीय संदर्भ देते हैं। साथ ही, कुछ तस्वीरें प्रदूषण और पर्यावरणीय चिंताओं की ओर संकेत करती हैं।
रघु राय ने फोटोग्राफी को महज़ पेशा नहीं, बल्कि अपनी भावना, जिम्मेदारी और जुनून बनाया। इसका एक ज्वलंत उदाहरण आपातकाल का वह दौर है जब जेपी आंदोलन उग्र हो रहा था। जेपी पर पुलिस का लाठीचार्ज हुआ, लेकिन सरकार ने इससे इनकार कर दिया। अगले ही दिन एक अंग्रेजी अखबार के पहले पन्ने पर रघु राय की खींची तस्वीर छपी—जेपी के कंधे पर लाठी का प्रहार होते हुए। नीचे कैप्शन था: “कैमरा कभी झूठ नहीं बोलता।” हमने यहां जो तस्वीर दी है, वह भी जयप्रकाश नारायण की एक महत्वपूर्ण तस्वीर है। जेपी ने 1977 में दिल्ली में हुए चुनावों में जनता पार्टी द्वारा इंदिरा गांधी को हराए जाने के बाद प्रधानमंत्री पद के लिए मोरारजी देसाई की उम्मीदवारी का समर्थन किया था। इसके अलावा, उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के जीवन के दुर्लभ और अंतिम क्षणों का भी ऐतिहासिक दस्तावेजीकरण किया।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनके काम ने गहरी छाप छोड़ी। 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान शरणार्थियों के मानवीय संघर्ष और उम्मीद को उन्होंने बेहद संवेदनशील ढंग से कैद किया। इसी तरह, भोपाल गैस त्रासदी की उनकी ‘केमिकल डिजास्टर’ शृंखला ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया; विशेषकर मिट्टी में दबे एक बच्चे के चेहरे की उस दर्दनाक छवि ने, जो पूरी त्रासदी का वैश्विक प्रतीक बन गई।
अपने लंबे करियर में रघु राय ने लाखों तस्वीरें खींचीं। सटीक संख्या बताना तो मुश्किल है, लेकिन उनका काम कई दशकों में फैला एक विशाल दृश्य अभिलेख (विज़ुअल आर्काइव) है। वे दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित फोटो एजेंसी ‘मैग्नम फोटोज़’ (Magnum Photos) से जुड़े रहे। उनकी फोटोग्राफी पर देश-विदेश में अनेक प्रदर्शनियां लगीं और उन्होंने 18 से अधिक बेहतरीन फोटोग्राफी पुस्तकों का सृजन किया।
रघु राय को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए वर्ष 1972 में भारत सरकार द्वारा ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया गया था। नेशनल ज्योग्राफिक का ‘फोटोग्राफर ऑफ द ईयर’, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड और अमेरिका सहित दुनिया भर के अनगिनत अंतरराष्ट्रीय सम्मान उनकी कला की वैश्विक मान्यता को दर्शाते हैं।
रघु राय की छवियों में ‘गागर में सागर’ भरने का कौशल था। इस अप्रतिम कलाकार के जाने से एक युग का अंत हो गया है। उनके कालजयी काम को सलाम। उनकी स्मृति शेष को कोटि-कोटि प्रणाम और भावभीनी श्रद्धांजलि। आगे सुनिये या पढ़िये नृत्य दिवस पर विशेष, एक बार फिर नाचो न इज़ाडोरा https://indorestudio.com/ek-baar-phir-nacho-na-isadora-manjari-srivastava-international-dance-day/
वो छायाकार जिसने कैमरे में क़ैद की भारत की आत्मा
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