कला प्रतिनिधि,इंदौर स्टूडियो। ‘सूत्रधार’ द्वारा हाल ही में आयोजित एकल नाट्य प्रतियोगिता में नाट्य समहू ‘पथिक’ के राहुल प्रजापति को उनके अभिनीत नाटक ‘शतरंज की मोहरे’ के लिये प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ है। (चित्र में निर्देशक सतीश श्रोत्री और सूत्रधार संस्था के प्रमुख सत्यनारायण व्यास के साथ राहुल प्रजापति)
वरिष्ठ रंग निर्देशक सतीश श्रोत्री ने इस नाटक का निर्देशन और अनुवाद किया है। नाटक में राहुल ने प्रभावशाली अभिनय किया। इसकी दर्शकों ने प्रशंसा की, निर्णायक मंडली ने उन्हें प्रथम पुरस्कार के लिये चुना। (नाटक के एक दृश्य में राहुल प्रजापति)
नाटक की शुरूआत सज्जन के प्रवेश से होती है। सज्जन एक परेशान नौजवान है जो अपना गांव छोडकर नौकरी के लिये शहर आया है। कमरे की तलाश में बुजुर्ग दंपत्ति अण्णा देशपांडे और दयामौसी के घर आता है। वे उसे अपने घर में रहने को कमरा देते है लेकिन उससे किराया नहीं लेते हैं,साथ ही भोजन की व्यवस्था भी करते हैं। वे उसे अपने बेटे की तरह प्यार करने लगते हैं। वे चाहते हैं कि सज्जन उनके कहे अनुसार सबकुछ करें। एक दिन सज्जन अपने दोस्त रमाकांत के साथ रात को फिल्म देखने का तय करता है जिसे अण्णा ठीक नहीं मानते। उसे रात को फिल्म को देखने जाने से मना करते हैं लेकिन सज्जन उनकी बात नहीं मानता है, इस कारण अण्णा बहुत दुःखी होते हैं वे सज्जन को अपने से अलग समझने लगते हैं।
सज्जन उनके इस व्यवहार से दुःखी हो कर कमरा खाली करने का निर्णय लेता है, लेकिन यह बात सुनकर अण्णा और अधिक दुःखी होते हैं। मौसी सज्जन को समझाती है, उसे बताती है कि अण्णा उसे अपने बेटे से अधिक प्यार करते हैं, उनका भी एक जवान बेटा था जो नौकरी करने विदेश गया लेकिन वहां से वापस नहीं लौटा वो इस दुनिया को छोडकर चला गया, यह बात सुनकर सज्जन को अपनेपन का अहसास होता है और वह अपना निर्णय बदलकर फिर से अण्णा मौसी के साथ रहने लगता है। सिक्के के दो पहलुओ यानी माता-पिता और बेटे की भावनाओं को नाटक में बहुत ढंग से दर्शाया गया है।

