देखिये इंदौर के प्रतिभाशाली कलाकारों की सराहनीय फ़िल्म-‘क्या फर्क पड़ता है।‘ सिर्फ 1:33 मिनट की ये फ़िल्म घरलू हिंसा पर ज़रूरी सन्देश देती है। फ़िल्म का लेखन और निर्माण अजय खिलनानी ने किया है। सिनेमेटोग्राफी गौरव अत्रे और अक्षय दशोरा की है। अभिनय जीतू खिलनानी, प्रेक्षा मेहता और पराग जोहरी ने किया है।
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पारम्परिक खेती के पक्ष में बेहद सशक्त तरीक़े से अपनी बात कहती है-एक गूंगे का आत्मकथन। अरुण डिके लिखित और अभिनव दुबे निर्देशित इस शॉर्ट फिल्म में श्रीराम जोग ने एक व्यथित किंतु एक आशावान किसान की विचारपूर्ण भूमिका अदा की है। इस फ़िल्म को सिर्फ एक किसान ही नहीँ बल्कि देश के नीति निर्धारकों और विकास की तरफ अंधी दौड़ में भागते हर भारतीय को देखना चाहिए।

