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जया सरकार, इंदौर स्टूडियो। मुंबई के मालाबार हिल्स स्थित ऐतिहासिक राजभवन में ख्यात पत्रकार एवं नाट्य समीक्षक श्री गिरिजाशंकर जी की पुस्तक ‘रंगमंच’ का महाराष्ट्र के राज्यपाल महामहिम श्री रमेश बैस द्वारा विमोचन किया गया। यह मेरे लिये भी एक सुखद और गौरवशाली अवसर रहा। चार दशक बाद मुझे राजभवन देखने का सौभाग्य मिला।
दस वर्षों से नाटकों के लिये लेखन: गिरिजा भैया दस वर्षों से भारत के कलाकारों और रंगमंच के वर्तमान परिदृश्य पर अपने अनुभव और गहन अध्ययन समाचार पत्र ‘न्यू इंडिया’ में लिखते रहे हैं। लोकमत प्रकाशन के युवा संपादक शिव नारायण कुंदेर और मनोज कुमार उनके लिखे लेखों को संकलित करने का काम करते आये हैं। यह पुस्तक भारतीय रंगमंच का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक विरासत की तरह है। मैं भाग्यशाली हूं कि गिरिजा भाई ने इस किताब में मेरे लिए भी एक लेख लिखा है।
राज्यपाल ने किया था मेरी क़िताब का विमोचन: महाराष्ट्र के राज्यपाल महामहिम श्री रमेश बैस जी छत्तीसगढ़ से हैं। उन्होंने 18 जनवरी को मुंबई के मुक्ति ऑडिटोरियम में मेरी किताब ‘दो नाटक’ का विमोचन किया था। विमोचन का यह कार्यक्रम भारतीय सिनेमा के आर्ट डायरेक्टर और रंग निर्देशक श्री जयंत देशमुख जी के कारण संभव हुआ था। उन्होंने मेरे नाटक का निर्देशन भी किया है। ‘दो नाटक’ के विमोचन के समय पता चला कि तमाम तामझाम के बावजूद राज्यपाल आदरणीय बैस जी आम लोगों और कलाकारों के लिए सहज उपलब्ध रहते हैं।
अभिन्न आत्मीय मित्रता बड़ी बात: कार्यक्रम में राज्यपाल श्री रमेश बैस ने बड़ी आत्मीयता से कहा, गिरिजाशंकर जी उनके अभिन्न मित्र हैं और उनके राजनीतिक जीवन में उनका अमूल्य योगदान है। गिरिजा भैया के साथ राज्यपाल की आत्मीय बातचीत और देश के वरिष्ठ रंगकर्मियों जैसे पद्मश्री वामन केंद्रे जी, श्री ओम कटारे और कार्यक्रम के निदेशक श्री अजित राय के गिरिजा भैया के बारे में विचार सुनकर मन प्रसन्न हो गया। छोटे शहर के ये बुजुर्ग अपने आचरण और व्यवहार से सिखाते हैं कि सहजता और सरलता ही आपकी वास्तविक पहचान है।
हमारे पड़ोसी रहे गिरिजा भैया: गिरिजा भैया रायपुर में हमारे पड़ोस में रहते थे। उनके सबसे छोटे भाई मनोज जी जो स्वयं लेखक, प्रकाशक एवं प्रोफेसर हैं, मेरे बचपन के मित्र हैं। ईमानदार और निष्पक्ष पत्रकारिता के क्षेत्र में गिरिजा भैया का नाम बड़े आदर और सम्मान से लिया जाता था। उनकी छवि एक साहसी पत्रकार की थी। थिएटर उनका जुनून था। जब उनकी शादी हुई, तब हम स्कूल में थे। नंदिनी भाभी हमारे पड़ोस की पहली बहू थीं। उस समय पड़ोस में आई नई नवेली दुल्हन से मिलने का एक अलग ही उत्साह और खुशी होती थी। कुछ साल पहले उनसे मुलाकात हुई। सालों बाद उनका वही स्नेह मिला।
रिश्ते निभाने वाले बिरले लोग: ऐसे बिरले ही लोग बचे हैं जो इतनी प्रतिष्ठा और सम्मान के बावजूद बिना गरीबी के अपने गली-मोहल्ले के रिश्ते निभाते हैं। ऐसे परिवार हिन्दी साहित्य की कहानियों में मिलते हैं। गिरिजा भैया ने ‘दो नाटक’ पर लिखा और फिर पुस्तक के प्रकाशन और उन नाटकों के मंचन तक का मार्गदर्शन और सहयोग मिलता रहा।
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