प्रेम प्रेम सब जग कहे, मरम न जाने कोय
प्रेम मरम जाने वही, प्रेम मगन जो होय
यह गीत पं. राधेश्याम कथावाचक लिखित नाटक धन्ना भगत का है। प्रख्यात लेखक हरिशंकर शर्मा की संपादित पुस्तक रंग राधेश्याम में ऐसी ही मर्मस्पर्शी रचनाएँ पढ़ने को मिलती हैं। पुस्तक से समझ आता है कि नाटक और फिल्म में गीत किस तरह पटकथा को गहराई और प्रभाव देते हैं। उदाहरण के लिये उद्धार का यह गीत कितना प्रासंगिक प्रतीत होता है
भारत के नौजवान, दे भारत पे अपने ध्यान
भारत के मान ही से तो, तेरा भी है सम्मान
इसी तरह फिल्म श्री सत्यनारायण का गीत—
दुखियों की ओर निहारो, दु:ख-दर्द मिटाने वाले
भूतल की विपदा टारो, भगवान कहाने वाले
आइये पढ़ते हैं रंग राधेश्याम पुस्तक पर शकील अख़्तर की यह समीक्षा। –
पहली बार तीन अप्रकाशित पटकथाएँ: पुस्तक रंग राधेश्याम नाटक और फिल्मों में अप्रतिम योगदान देने वाले लेखक पं. राधेश्याम कथावाचक (1890–1963) पर केंद्रित है। इसमें पहली बार उनकी तीन अप्रकाशित पटकथाएँ (उद्धार, आज़ादी और धन्ना भगत ) प्रकाशित की गई हैं। साथ ही श्री सत्यनारायण, श्रीकृष्णावतार, श्रीकृष्ण सुदामा, श्रवण कुमार और रामायण फिल्म के कथा सूत्र तथा सत्य दर्शन से जुड़े अध्याय भी शामिल हैं, जो उनके लेखन पर गहन और शोधपूर्ण विवेचन प्रस्तुत करते हैं।
सनातन परंपरा का डंका बजाने वाले लेखक: हरिशंकर जी ने पं. राधेश्याम को फिल्मों में सनातन परंपरा का डंका बजाने वाले लेखक के रूप में निरूपित किया है। रामायण, श्रीकृष्णावतार और श्रवण कुमार जैसी कृतियाँ इसका प्रमाण हैं। उनकी पटकथा के ज़ायके को समझने के लिये फिल्म ‘सत्य दर्शन’ के एक दृश्य को ज़िक्र ज़रूरी है। इस दृश्य में तपस्या करती वेदवती के साथ रावण का संवाद है। रावण वेदवती के पास जाता है, जिससे उसकी तपस्या भंग हो जाती है।
रावण – सुंदरी तुम कौन हो ?
वेदवती – दुष्टात्मा, एक तपस्विनी को सुंदरी शब्द से सम्बोधित करते हुए तुझे शर्म नहीं आती।
रावण – शर्म! शर्म, तो स्त्रियों का गुण है। अच्छा तपस्विनी सही।
वेदवती – मैं ब्रह्मर्षि कुश ध्वज की कन्या वेदवती हूँ।
रावण- यह कोमल कमल की कामिनी की तपस्या के योग्य-तुम्हारी शोभा तो संसार के सम्राट रावण की सम्राज्ञी होने में है।
वेदवती – राक्षस की नहीं देवताओं के स्वामी भगवान विष्णु की अर्धांगिनी बनने के लिये तपस्या कर रही हूँ। सावधान! आगे न बढ़ना।
(रावण पिछले श्राप का स्मरण कर कुछ झिझकता है। )
रावण – विष्णु क्या मुझसे भी बड़ा है ?
वेदवती – द्रोही, मैं तपस्या करती हूँ तब भी उसे नहीं अपनाती हूँ- तुझे मैं धिक्कारती हूँ, तब भी तू आगे बढ़ता है।
रावण – यह आन बान ?
वेदवती – तपस्विनी होने के कारण आर्यवर्त की देवी से ना उलझ- हमारी आँखों में सूर्य और चक्र होते हैं। हमारे तले से इंद्र का वज्र, वरुण का पाश, यम का दण्ड और शिव का त्रिशूल, सब भयभीत रहते हैं।
(रावण आगे बढ़ता है, वेदवती हरे, हरे कहकर भागती है। रावण पीछे भागता है। वह वृक्ष पर चढ़ जाती है, उसके बाल बिखर जाते हैं। रावण नीचे से पेड़ की शाखा खींचकर उसके बाल पकड़ना चाहता है और खींचता है। वेदवती हाथों से उन बालों को काट देती है, अग्नि प्रकट होती है, वेदवती और वृक्ष दोनों जल जाते हैं, वेदवती जलते हुए कहती है।)
वेदवती- तेरी मृत्यु का कारण मैं ही बनूँगी। (फेड आउट)
अभिनय सूत्र और निर्देशन की द़ष्टि: लेखक हरिशंकर शर्मा ने पुस्तक में ‘नाटक / फिल्म के अभिनय सूत्र’ जैसी विशिष्ट पंक्ति जोड़ी है। यह पुस्तक केवल अभिनय सूत्रों तक सीमित नहीं, बल्कि पटकथा लेखन और निर्देशन की बारीकियों पर भी प्रकाश डालती है। पुस्तक में इसके लिये कथावाचक जी के फुट नोट्स भी दिये गये हैं।
संस्कृत, हिन्दी और उर्दू पर सहज अधिकार: पं.राधेश्याम कथावाचक की विद्वता, लेखनी और भाषा (संस्कृत, हिन्दी और उर्दू) पर सहज अधिकार का अंदाज़ा होता है। राधेश्याम कथावाचक ने पारसी रंगमंच की परंपरा को खड़ी बोली हिन्दी में नया रूप दिया। उनकी भाषा सरल और जनप्रिय थी, जिससे ग्रामीण और शहरी दोनों दर्शक जुड़ सके। उन्होंने लोकनाट्य और पारसी रंगमंच की शैली को मिलाकर संवाद, अभिनय और गायन का संतुलन बनाया। मिसाल के लिये वे फिल्म ‘आज़ादी’ में कुछ दृश्यों को बड़ी कल्पनाशीलता के साथ प्रस्तुत करते हैं।
(‘आज़ादी’ की कहानी जलाल नाम के एक इंकलाबी नौजवान और उसे प्यार करने वाली माशूका आज़ादी और सत्ता के प्रतीक सुल्तान से टकराव की है। जलाल को सुल्तान के खिलाफ़ बगावत के चलते जेल में बंद कर दिया गया है। इस ख़बर के बाद के कुछ दृश्य पटकथा में इस तरह से लिखे गये हैं।)
दूसरे दिन सुबह (पहला शॉट )
सूरज उग रहा है, नदी बह रही है। किसान हल चला रहे हैं। अख़बार वाला आवाज़ लगा रहा है – ‘बगावत का संगीन जुर्म, जलाल भाई गिरफ़्तार’।
पहला किसान – जलाल क़ैद हो गया, अब क्या होगा?
दूसरा किसान – किसान लोग उसके साथ है, कोई न कोई हल निकलेगा ही।
तीसरा शॉट
(बाज़ार में कुछ दुकानदार बातें कर रहे हैं।)
एक सेठ – साँप का पकड़ना अच्छा ही है
दूसरा सेठ – अजी पूरा बाग़ी था।
तीसरा सेठ – अपना कारोबार चौपट करना चाहता था।
चौथा सेठ – दुश्मन पकड़ा गया। लालाजी परसाद बांटों।
चौथा शॉट
चौथी पनिहारिन – अब क्या होगा?
पहली पनिहारिन- होगा क्या, छूट जायेगा!
दूसरी पनिहारिन -अजी छूटा, कौन छुड़ायेगा ?
तीसरी पनिहारिन – आज़ादी।
चौथी पनिहारिन – आज़ादी उससे मुहब्बत करती है, मालूम है?
(पटकथा में इस तरह ट्रांज़िशन (CUT TO) के पाँच शॉट्स हैं जो अलग-अलग समुदाय के लोगों और नायक के लिये उनकी मानसिकता को दर्शाते हैं।)
आज़ादी के बाद की सामाजिक चेतना: राधेश्याम जी के अप्रकाशित नाटकों में- किसान, मजदूर, सूदखोर सेठ, धर्म, समाज और स्त्री जैसे विषय केंद्र में हैं। पुस्तक से स्पष्ट होता है कि राधेश्याम कथावाचक के नाटक और फिल्में उनके समय का प्रतिबिंब हैं। हरिशंकर शर्मा ने उनके सिनेमाई सफ़र को पौराणिकता से आधुनिकता की यात्रा के रूप में देखा है, जहाँ धार्मिक कथाओं से आगे बढ़कर सामाजिक‑राजनीतिक चेतना और स्वतंत्रता आंदोलन की गूंज सुनाई देती है।
विरासत का संरक्षण और पुनर्परभाषण: हरिशंकर शर्मा के अनुसार, राधेश्याम के नाटक केवल मनोरंजन नहीं थे, बल्कि समाज को शिक्षित करने और जिम्मेदारी का बोध कराने वाले दस्तावेज़ थे। इस पुस्तक के माध्यम से उनकी विरासत को संरक्षित और पुनर्परिभाषित किया गया है, जो आज हिन्दी नाट्य साहित्य के अध्ययन में महत्त्वपूर्ण है। आपको बता दें, हरिशंकर शर्मा एक बहुआयामी लेखक हैं जिन्होंने पं. राधेश्याम कथावाचक के साहित्यिक और सांस्कृतिक योगदान पर सर्वाधिक कार्य किया है। उन्होंने राधेश्याम जी पर केंद्रित लगभग 15 पुस्तकों का संपादन और लेखन किया है, जिनमें नाटक, फिल्म, लोकचेतना और ग़ज़ल से जुड़ी विविध कृतियाँ शामिल हैं।
प्रकाशन और आकर्षक आवरण: वेरा प्रकाशन, सांगानेर से प्रकाशित इस पुस्तक का आकर्षक आवरण राधेश्याम रामायण के कथा प्रसंग शूर्पणखा और लक्ष्मण की भूमिका पर आधारित है। इसमें शिवाका पाठक और अचल सिसोदिया अभिनय करते दिखाई देते हैं। दानिश ख़ान के सौजन्य से यह चित्र मुखपृष्ठ बना है। पुस्तक में ब्रोशर, फिल्मी पोस्टर और हस्तलिखित पांडुलिपियों के चित्र भी शामिल हैं। पुस्तक प्राप्त करने हेतु संपर्क करें: वेरा प्रकाशन: 96804-33181 / लेखक हरिशंकर शर्मा: 92574-46828, 94610-46594 (समीक्षा में दो कल्पना-चित्र AI Copilot के सौजन्य से।) आगे पढ़िये – पुरस्कार से लेखक की ऊँचाई का पता नहीं चलता – https://indorestudio.com/puraskar-lekhak-suryakant-nagar/











