‘मेरे लिये रंगकर्म केवल शौक नहीं, बल्कि जीवन की साँस है—एक मिशन है। मनुष्य के अस्तित्व, दर्शन और मानवीय संवेदनाओं को मंच पर जीवंत करने पर मैं भी जीवंत होता हूं।’ प्रख्यात अभिनेता, निर्देशक और लेखक अनिल रंजन भौमिक ने यह बात कही।
अनिल रंजन जी ने हाल ही में अपनी रंग यात्रा के पचास वर्ष पूरे कर लिये हैं। इस अवसर पर उनसे शकील अख़्तर ने बातचीत की। इस बातचीत में उन्होंने अपने रंग-संसार की यादों, अपने संघर्ष और नाट्य प्रयोगों को साझा किया है। प्रस्तुत हैं इस संवाद के सारगर्भित अंश। इस बातचीत के साथ आप अनिल रंजन भौमिक और उनके रंगकर्म की कुछ तस्वीरें भी देख सकते हैं। आइये शुरू करते हैं इस रंग गुरू से बातचीत।
आप सुबह चार बजे से उठकर मॉर्निंग वॉक पर निकल जाते हैं और सुबह आठ बजे से रिहर्सल पर पहुँच जाते हैं। लेकिन हाल ही में माइनर हार्ट अटैक का आपके रंगकर्म पर कोई असर पड़ा है ? मेरे पहले ही सवाल पर अनिल दा ने कहा, – ‘मैं हर वक्त रंगकर्म की दुनिया में ही रहता हूँ, अपने भीतर भी और बाहर भी। उम्र के एक पड़ाव पर आकर सेहत अपना रंग ज़रूर दिखाती है, दिखा रही है। परंतु मेरी ऊर्जा में कहीं कोई कमी नहीं है। मैं चिकित्सकों की सलाह पर सावधानी ज़रूर बरत रहा हूं। हालांकि नाट्य कर्म पहले की तरह जारी है। मैं दिल्ली में जल्द ही बादल सरकार के एक नाटक का निर्देशन करने जा रहा हूं। मैं जनवरी दो हज़ार छब्बीस से दिल्ली में ही रहूंगा, कोई एक महीने तक।
रंगमंच से आपका पहला रिश्ता कैसे बना ? अनिल जी ने कहा – ‘बचपन में पिताजी को हरि बोल संकीर्तन में गाते, नाचते देखा था। वे काफी लोगों को प्रेरित भी करते थे। उनके कीर्तन से मेरे भीतर कला के पहले बीज जन्मे’।
अनिल रंजन जी ने बताया- ‘मेरा जन्म नोआखाली (अब बांग्लादेश) के एक साधारण कृषक परिवार में हुआ और शिक्षा कानपुर में पूरी हुई। स्वरूपनगर और आर्यनगर में बीता बचपन, देवा सिंह पार्क की रामलीलाएँ और दोस्तों के साथ छतों पर किया गया अभिनय—यहीं से रंगमंच मेरे जीवन का हिस्सा बनता चला गया। धीरे-धीरे मुझमें रंगमंच के प्रति समझ पैदा हुई। मुझे महसूस हुआ कि रंगमंच अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है। यही कारण है कि मैंने अपने जीवन की अभिव्यक्ति के लिए रंगमंच को चुना’।
लेकिन औपचारिक रंगमंचीय अनुभव की शुरुआत कब हुई? इस सवाल पर अनिल दा ने बताया- ‘बंगाली परिवार में जन्म लेने के कारण दुर्गा पूजा के नाटकों से जुड़ाव स्वाभाविक था। पहली बार विधिवत मंच पर अभिनय का अवसर मुझे दुर्गा पूजा में ही मिला। ‘लिक्विड सस्पेंस’ नामक नाटक से शुरुआत हुई। उत्साह इतना बढ़ा कि ‘प्रगति’ संस्था बनाकर ‘बिये माइनस बो’ और ‘नाटक दो हज़ार पचास’ जैसे नाटकों में काम किया’।
श्री भौमिक ने बताया, ‘कानपुर में भारतेन्दु नाट्य केन्द्र के सहयोग से आयोजित सघन कार्यशाला में एम.के. रैना, बलराज पंडित, राज बिसारिया और कृष्ण नारायण कक्कड़ जैसे गुरुओं से प्रशिक्षण मिला। दुष्यंत कुमार के काव्य नाटक एक कंठ विष पायी से हिंदी रंगमंच में प्रवेश हुआ। एक और द्रोणाचार्य, प्रजा ही रहने दो जैसे नाटकों ने रंगमंच को मेरे जीवन के केंद्र में ला दिया। जब समय मिला रंग दिग्गजों से मिलने, जानने और समझने की कोशिश करता रहा। बीवी कारंत जी के साथ मेरी ये तस्वीर भी यही कुछ बयान करती है’।
जब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की तैयारी चल रही थी, तब बैंक की नौकरी कैसे जीवन में आई? अनिल जी ने कहा- ‘हां, ये सच है…मेरी जब एनएसडी में जाने की तैयारी चल ही रही थी कि जीवन ने दूसरा मोड़ लिया। यूनियन बैंक ऑफ इंडिया में नौकरी मिली और बारह मई उन्नीस अठत्तर को आज़मगढ़ में कार्यभार संभाला। लेकिन रंगमंच का नशा इतना गहरा था कि बैंक जॉइन करने से पहले यह जानना ज़्यादा ज़रूरी लगा कि शहर में कोई नाट्य संस्था है या नहीं ? उसी दिन ‘नव नाट्यम्’ से जुड़कर कॉफी हाउस में इंतज़ार में अभिनय किया।
समानांतर की पहचान कैसे बनी? इसकी शुरूआत कैसे हुई? मेरे इस सवाल पर सीनियर थियेटर गुरू ने कहा- ‘समानांतर’ नाट्य संस्था की स्थापना भी उन्नीस अठत्तर में ही हुई- नवनाट्यम् के बाद सिंतबर के महीने में। युवा साथियों के कहने पर यह संस्था बनी और फिर निर्देशन की ज़िम्मेदारी मुझे मिली। दो अक्टूबर उन्नीस अठत्तर को रामबाण और पिनकुशन के मंचन के साथ समानांतर की रंगयात्रा शुरू हो गई। यह सफर लगातार जारी है, हाल ही में हमने इलाहाबाद में एक इंटेसिव थियेटर वर्कशॉप की है’।
अनिल रंजन भौमिक ने बताया, समानांतर के पास अपना कुछ नहीं था। बस एक विज़न था। सीमित संसाधनों के बावजूद हमने नए प्रयोगों की राह पकड़ी। बादल सरकार का जुलूस खुले मंच पर प्रस्तुत कर आज़मगढ़ में खुले रंगमंच की संभावना को जन्म दिया। इसी दौर में कवि श्रीराम वर्मा और चित्रकार अशोक भौमिक का साथ मिला। रंगकर्म के साथ साहित्य और चित्रकला भी जुड़ती चली गई। पोस्टर निर्माण, कार्यशालाएँ और नाट्य समारोह-समानांतर धीरे-धीरे एक सांस्कृतिक केंद्र बन गया’।
अनिल जी ने कहा-‘बादल सरकार का आज़मगढ़ आना और ‘तीसरे रंगमंच’ पर उनकी दस दिवसीय कार्यशाला इस यात्रा का ऐतिहासिक क्षण रहा। हाल ही में हमने बादल सरकार पर केंद्रित ‘समानांतर’ का एक विशेषांक प्रकाशित किया है, इसका जबलपुर में विवेचना के मंच पर भी विमोचन हुआ। ‘विवेचना‘ से मेरा वर्षों से जुड़ाव रहा है, हिमांशु राय और बांके बिहारी ब्यौहार जी के समर्पित रंगकर्म के साथ जुड़ना मेरे मन को भाता है। विवेचना के पचास साल पूरे होने के आयोजन में आपका साथ भी रहा’।
तीसरे रंगमंच ने आपकी रंग-दृष्टि को कैसे बदला? अनिल जी बोले- ‘तीसरे रंगमंच और मनो-शारीरिक रंगमंच के प्रशिक्षण ने भोमा और स्पार्टाक्स जैसी प्रस्तुतियों को जन्म दिया। भोमा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली और लखनऊ, मुंबई जैसे शहरों में सराहना हुई। 1983 में भोपाल के नुक्कड़ नाट्य मेले में भागीदारी ने मेरी दृष्टि को और व्यापक किया। ब.व. कारंत, शंभु मित्र, कन्हाई लाल और सावित्री देवी जैसे दिग्गजों से साक्षात्कार और उनके साथ काम करने का अवसर मिला। यहीं से समानांतर और मेरी रंग यात्रा को नई ऊर्जा और पहचान मिली’।
यहां पर एक और सवाल.. इलाहाबाद ने आपके रंगकर्म को क्या दिया? अनिल दा ने कहा-‘इलाहाबाद आगमन ने इस यात्रा को नया विस्तार दिया। यहाँ की समृद्ध रंग परंपरा के बीच इलाहाबाद का पुनर्गठन हुआ। मध्यम व्यायोग, घेरा, गाड़ी माटी की जैसी प्रस्तुतियों के बाद मैंने पुनः प्रोसिनियम थिएटर की ओर रुख किया। कोर्ट मार्शल के माध्यम से यथार्थवादी रंगमंच की सशक्त प्रस्तुति दी। फिर मंथन, पांचाली, यर्मा और सुशीला जैसे नाटकों में स्त्री अस्मिता, सामाजिक अन्याय और समकालीन प्रश्नों को मंच पर रखा। सुशीला का भारत रंग महोत्सव में मंचन इस यात्रा की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रही। टोपी शुक्ला जैसा नाटक भी उल्लेखनीय रहा, इसके 50 से अधिक प्रदर्शन हुए हैं।
आपकी रंग यात्रा में एकल नाटकों का क्या महत्व रहा? …‘देखिये पिछले पाँच दशकों में समानांतर की प्रस्तुतियाँ देश के लगभग सभी प्रमुख नाट्य समारोहों तक पहुँचीं। इसमें एकल नाटकों का भी महत्व रहा। एकल नाटकों की श्रृंखला—असमंजस बाबू, पूस की रात, रस प्रिया, भेड़िये—ने इस विधा की नई संभावनाएँ खोलीं। भुवनेश्वर प्रसाद, राही मासूम रज़ा, लोर्का, ब्रेख़्त, कालिदास से लेकर समकालीन लेखकों तक, विविध नाट्य रूपों के माध्यम से अपने समय से संवाद बनाए रखना मेरी रंग-दृष्टि का मूल रहा है।
आख़िर में एक और सवाल…50 साल की इस रंग यात्रा को आप किस तरह से देखते हैं, क्या कहना चाहेंगे? अनिल रंजन जी ने कहा, मेरा विश्वास है कि रंगकर्म ईमानदारी, साधना और समर्पण मांगता है। युवाओं के साथ काम करना, छोटे शहरों और कस्बों तक रंगमंच ले जाना और स्वस्थ सांस्कृतिक चेतना का निर्माण करना ही रंगकर्म की मूल यात्रा है, भाव है। मैं हमेशा कहता हूं रंगकर्म मेरे लिये शौक नहीं है यह तो मेरे जीवन की सांस है। मैं हमेशा एक मिशन की तरह अपना काम करता रहता हूँ, करता रहूंगा’। यादों के पन्नों को पलटते हुए हमें अनिल रंजन जी के साथ प्रख्यात नाटककार और पटकथा लेखक असगर वजाहत की ये तस्वीर भी देखने को मिली।
ज़ाहिर है कि 50 साल की लंबी रंग यात्रा को एक साक्षात्कार में समेटना संभव नहीं है। अनिल रंजन भौमिक की इस रंग यात्रा के ऐसे कई पक्ष है जिनपर बातचीत होना अभी बाक़ी है। इंदौर स्टूडियो पर प्रसारित और पब्लिश इस बातचीत पर आपकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा। आगे पढ़िये पंडित राधेश्याम कथावाचक के 3 अप्रकाशित नाटकों पर विशेष समीक्षा – प्रेम प्रेम सब कहें, मरम न जाने कोय – https://indorestudio.com/rang-radheshyam-book-review/











