ग्वालियर, 3 नवंबर 2018 ( कला प्रतिनिधी, इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम)। आर्टिस्ट्स कम्बाइन ग्वालियर ने नाट्य मंदिर में दो दिवसीय नाट्य उत्सव का आयोजन किया जिसमें पहले दिन गीतांजली गिरवाल के निर्देशन में नाटक ‘कमला’का सफल मंचन हुआ ! विजय तेंदुलकर द्वारा लिखित ‘कमला’की प्रस्तुति जहां ग्वालियर वासियों के लिए नई थी वहीं नाटक की निर्देशक गीतांजली गिरवाल भी निर्देशक के रूप में पहली बार उनके सामने थीं। रंगमंच की इस अभिनेत्री ने निर्देशक के बतौर भी इस जटिल नाटक का कुशल निर्देशन किया।
ग्वालियर रंगमंच की नई आशा : यूँ तो गीतांजली के पास अभिनय का बड़ा अनुभव है , एक अच्छी अभिनेत्री के तौर पर उनका शुमार होता है , निर्देशन की पगडण्डियों पर पैर रखते हुये निश्चित ही उनके सामने कई चुनौतियाँ आयी होंगी किंतु ‘कमला’ जैसे जटिल नाटक को सफलतापूर्वक मंच पर उतार देने के बाद वो एक कुशल निर्देशक के रूप में सामने दिखती हैं । विजय तेंदुलकर ने अपने नाटकों में बहुत ज्वलन्त मुद्दे उठाए है जिस वजह से निर्देशक के हाथ जलने की संभावना बनी रहती हैं लेकिन हिम्मत से अपने दायित्वों का निर्वहन करने वाली गीतांजली बधाई की पात्र हैं जिन्होंने अपनी निर्देशन की पारी ‘कमला’ जैसे मुश्किल नाटक से की ।1 घण्टा 35 मिनिट की अवधि के इस नाटक में दर्शक की अपार संख्या रंगमंच की सुखद उम्मीदें जगाता है।
स्त्री प्रलोभन और उपभोग की वस्तु ! ठेठ सामंती समाज में स्त्री की तस्वीर को तेंदुलकर के नाटक सामने लाते हैं। इनके नाटकों में स्त्री- सत्ता के लिए, घरेलू जीवन को सुनिश्चित गति देने के लिए, व्यावसायिक फायदे के लिए खरीदी-बेची जाती है। यानि स्त्री लालच, प्रलोभन और उपभोग की वस्तु है। स्त्री का वस्तुकरण और इससे जुड़ी अनेक छवियां इनके नाटकों में हैं। पुरुष प्रधान समाज की स्वामित्ववादी परिधि में जीने वाली स्त्री की चेतना जब जागृत होती है तब वह सवाल उठती है-‘‘ मैं पत्नी नहीं गुलाम हूं। उसकी निगाह में मैं भी एक कमला ही हूं। गुलाम को कोई हक हासिल नहीं होता।गुलाम इसलिए होता है कि सिर्फ खटता रहे। मालिक के इशारों पर नाचता रहे। क्यों नहीं पुरुष भी घिसटता चले? क्यों नहीं नारी एक बार भी मालिक बने? क्यों नहीं वह इंसान की तरह जीने की मांग करे ?
सामंती सत्ता,सामंती मानसिकता से लड़ाई: सवालों की यह कड़ी बनते ही पुरुषप्रधान समाज के स्त्री-संबंधी तयशुदा मानकों के अनुसार एक संवेदनहीन वस्तु मान ली गयी । इन नाटकों में स्त्री के पक्ष को सामने लाने वाली एक गंभीर बात यह भी है कि वास्तविक लड़ाई सामंती सत्ता, सामंती मानसिकता से है। यही वजह है कि इन नाटकों में तीन औरतों को एक-दूसरे के प्रतिपक्ष में रखकर भिन्न-भिन्न नजरियों को प्रस्तुत किया गया है। ‘कमला’ में सरिता और कमलाबाई ! यह प्रयोग इसलिए है कि औरतों का एक बहुत बड़ा वर्ग सामंती मानसिकता की दीवारों में इस तरह कैद कर लिया गया है कि अब उन्हें अपनी स्वाधीन चेतना पर हो रहे हमले का कोई असर नहीं पड़ता। सामंती सत्ता ने उन्हें इस कदर अनुकूलित कर दिया है कि स्त्री का विवेकवान होना, अपने लिए स्वाधीनता के आकाश की मांग करना उन्हें उच्छृंखलता जान पड़ता है। कमला का जयसिंह को मालिक कहना और उसकी पहली पत्नी के साथ जीवन गुजारना उसके लिए समस्याजनक नहीं है। उसका मानना है–‘‘ दोई मिलके मालिक को ,खुस रखें चइए,जैदाद फेलाएं चइए। मालिक को बच्चा देय चइए।…मैनत-मजूरी ,बच्चा देबो हमारे जिम्मे। लिखा-पढ़ी, हिसाब-किताब तुमाए जिम्मे। … मइने के पन्दरा रात मालिक के संग तुम सोइयो, पन्दरा रात हम सोहैं।‘
अभिनेताओं ने किया अपने चरित्र के साथ न्याय : सभी अभिनेताओं ने अपने चरित्र के साथ न्याय किया उनका पूर्वाभ्यास मंच पर नज़र आता है। नाटक का सेट बहुत सुंदर था दिल्ली की किसी पॉश कॉलोनी के ड्रॉईंग रूम का एहसास हो रहा था। लाइट दृश्यों को सशक्त तरीके से उभारती रही। कुछ दृश्यों में संगीत की कमी ज़रूर लगती है। मंच पर गोपाल देशपांडे,गीतांजली गिरवाल,अनिरुद्ध शर्मा,रेनू झंवर,कल्पना पाल और वसीम ने अच्छा अभिनय किया। मंच परिकल्पना गीतांजलि गिरवाल,मंच निमार्ण प्रमोद पत्की,संगीत योगेंद्र धाकड़,मंच व्यवस्था संजय गोयल,वेशभूषा दिवा चौहान और प्रकाश व्यवस्था अरोरा की थी।
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