महान नाटककार, निर्देशक और कवि रतन थियम का जन्म 20 जनवरी 1948 को हुआ था—यानी आज ही के दिन। उनके 78वें जन्मदिन पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं वह अंतिम और विशिष्ट इंटरव्यू, जिसे जानी-मानी कला समीक्षक और कवियत्री मंजरी श्रीवास्तव ने लिया था। इस संवाद में रतन थियम ने कला, सौंदर्य और परंपरा जैसे विषयों पर अपने गहन और अनुभवी विचार साझा किए हैं। ये विचार हर सृजनधर्मी के लिए मार्गदर्शक दस्तावेज़ की तरह हैं। आइए, उनके जन्मदिन पर पढ़ते हैं उन्हीं के शब्दों में व्यक्त यह अमूल्य दृष्टिकोण।
मेरे लिये सौंदर्य बोध का अर्थ: मेरे लिए सौन्दर्य बोध वही है जिसे देखकर जीवन खिल उठे। संवेदनाएँ लहरों की तरह प्रवाहित होने लगें। चेतन और अवचेतन दोनों सराबोर हो जाएँ। यह कोई भोजन नहीं। कोई ठोस पदार्थ नहीं। बल्कि एक यात्रा है। हर फूल हर दिन अलग खिलता है। हर कली का आकार अलग होता है। राजस्थान की मरुभूमि में रंग-बिरंगी पगड़ियाँ और चुनरियाँ मेरे सामने एक बगीचे की तरह खिल उठती हैं। गर्मी की चाँदनी पूरे जिस्म को सिहरा देती है। उपकरण और तकनीक सौन्दर्य का केवल एक अंश दे सकते हैं।
बाम से उतरती है हसीन दोशीज़ा: असली सौन्दर्य बोध तो वही है जिसे आप गहराई से महसूस करते हैं और फिर उसे कलात्मकता के साथ दर्शकों तक पहुँचाते हैं। सौन्दर्य बोध को परिभाषित करना कठिन है। मैं केवल इतना कह सकता हूँ
“बाम से उतरती है हसीन दोशीज़ा।
जिस्म की नज़ाकत को सीढ़ियाँ समझती है।”
चाहत की अवधारणा, मेघ से इन्द्र धनुष तक: मानवीय संवेदना और संस्पर्श को पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित करने के लिए उसे चाहत के रूप में अवधारणात्मक (Conceptual) बनाना पड़ता है। यह चाहत धुएँ या मेघ जैसी होती है। और जब उसमें रंग भरते हैं तो इन्द्र धनुष बनता है। मेरी रचनाओं में यही चाहत झलकती है।
अनुभव किसी भी प्रशिक्षण से ऊपर: जीवन हर पल बदलता है। अनुभव किसी भी प्रशिक्षण से ऊपर होता है। फूल, रंग, खुशबू, तितली—ये सब अनुभवों को समृद्ध करते हैं और कलाकार धीरे-धीरे इन्हें अपनी कलात्मकता में ढालता है। युवावस्था में उमंगें और आशाएँ होती हैं। प्रौढ़ावस्था में गम्भीरता और वृद्धावस्था में ब्रह्माण्ड का ज्ञान। कलाकार का सौन्दर्य बोध उसके जीवन के अनुभवों से जुड़कर संतुलित रूप में सामने आता है।
मंच और मन में अभिव्यक्ति की प्रस्तुति: कलाकार को अपना सौन्दर्य बोध एक साथ, दो जगह अभिव्यक्त करना होता है-मंच पर और दर्शकों के मन में। यही उसकी सबसे बड़ी चुनौती और सबसे बड़ा आनंद है। अभिव्यक्ति की भाषा तलाशना बोझ भी है, पर वही भाषा जब बिना टूट-फूट के कलाकृति में फिट होती है तो सौन्दर्य बोध अपनी सच्ची चमक में प्रकट होता है।
परंपरा जैसे जल प्रपात की धारा: मेरे लिए परम्पराएँ जल प्रपात की तरह हैं। हज़ारों सालों से बहती आ रही हैं। बीच-बीच में सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक पत्थरों से टकराती हैं। फिर भी प्रवहमान रहती हैं। यही हमारी पहचान है। यही हमारा परिचय है। मणिपुर की पारंपरिक कला शैलियों में आधुनिक और जनजातीय तत्वों का सम्मिश्रण है। यहाँ तकरीबन चालीस-पैंतालीस जनजातीय समुदाय हैं। मैतेई और हिन्दू परम्पराओं की विविधता एक ही उत्सव को अलग-अलग रीति-रिवाजों से जीती है। अलग-अलग गुरुओं से सीखते हुए हम अलग-अलग परम्पराओं से समृद्ध होते हैं। आधुनिकता का अर्थ मेरे लिए परम्पराओं को साथ लेकर आगे बढ़ना है।
इंसानियत को ज़िंदा रखना कला की जिम्मेदारी: आज का मशीनी युग मानवीय संबंधों को कमजोर कर रहा है। इंसानियत विलुप्ति के कगार पर है। बची-खुची इंसानियत कला और संस्कृति की देन है। कलाकार का दायित्व है कि वह अपनी रचनाओं में मानवीय संस्पर्श को जीवित रखे—ताकि आने वाली पीढ़ियाँ उन्नत सोच पा सकें। इंसानियत का स्पर्श मुलायम होता है—वही कलाकृति को जीवंत बनाता है और दर्शक व कलाकार के बीच पुल रचता है। परम्पराओं का अनुकरण ही अस्तित्व बचा सकता है। आधुनिक जीवन में परम्पराओं को समकालीन तरीके से सुरक्षित रखना ज़रूरी है। मैंने परम्पराओं को अपना प्रेरणा स्रोत बनाया है और उनमें समकालीन मूल्यों को खोजने की कोशिश की है।
कलाकार का इंसान होना पहला धर्म: मैं अक्सर सोचता हूँ कि एक आम या सामान्य आदमी बनना सबसे बड़ी बात होती है। कलाकार होना है तो इंसान होना बहुत ज़रूरी है। कलाकार वह नागरिक होता है जो अपने आसपास के लोगों के बारे में विचार करता है। इसीलिए मैं सबसे पहले इंसान हूँ। एक आम नागरिक हूँ। वही नागरिक जो करता है—वह सब कुछ मैं करता हूँ। अपने सारे कलात्मक प्रयासों को स्वयं में स्थानांतरित करता रहता हूँ। खुद को समृद्ध करता रहता हूँ।
मुकम्मल रतन थियाम होने की परिभाषा: जब मैं चित्रकार होता हूँ तो दुनिया की हर चीज़ को अपने कैनवास पर उतारना चाहता हूँ। वही कैनवास मंच बन जाता है जब मैं निर्देशक होता हूँ। और इन दोनों के बीच से जब कवि रतन निकलता है तो मेरी सारी कल्पनाशीलता। रंग, शब्द और लयात्मकता एक संगीत में बदल जाती है। तब जाकर मैं एक मुकम्मल (संपूर्ण) रतन थियाम बनता हूँ। मंच सज्जा और डिज़ाइन में मेरी पेंटिंग काम आती है। पेंटिंग के रंग कविता में लयात्मकता बन जाते हैं। और जब मैं निर्देशक होता हूँ तो पेंटिंग का कैनवास और कविता की संगीतात्मकता—दोनों को स्पेस में समाहित कर देता हूँ। स्पेस की स्थिति और उसके समावेश पर मैं अपनी पूरी रचनात्मकता उड़ेल देता हूँ—ताकि दृश्य, शब्द और संगीत एक साथ एक जीवित अनुभव बन जाएँ।
(लेखिका के. मंजरी श्रीवास्तव प्रतिष्ठित कला समीक्षक हैं। एनएसडी,जामिया और जनसत्ता जैसे संस्थानों के साथ काम कर चुकी हैं। ‘कलावीथी’ नामक साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था की संस्थापक हैं—जो ललित कलाओं के विकास एवं संरक्षण के साथ-साथ भारत के बुनकरों के विकास एवं संरक्षण का कार्य करती है। वह ‘SAVE OUR WEAVERS’ अभियान चला रही हैं। कविताएँ लिखती हैं और प्रसिद्ध नाटककार रतन थियाम पर शोध कार्य कर चुकी हैं।) आगे पढ़िये एनएसडी के चिल्ड्रन थियेटर फेस्टिवल पर विशेष रिपोर्ट – ‘रंग-राख’ में बच्चों का बॉलीवुड! https://indorestudio.com/rang-rakh-nsd-children-drama-festival-2026/











