डॉ.अंजू गुप्ता, इंदौर स्टूडियो। ‘रीता दास राम की कहानियां बनावटी नहीं है। वे पठनीय हैं और सीधे जीवन से आती हैं। वे निरंतर साहित्यिक चिंतन में डूबी रहती हैं। उन्होंने एक कवयित्री के साथ ही एक कहानीकार के रूप में भी अपनी छाप छोड़ी है। अपनी गंभीर साहित्यिक उपस्थिति दर्ज कराई है’। यह विचार विभिन्न साहित्यिक और कला हस्तियों ने रीता दास राम के कथा संग्रह -“समय जो रुकता नहीं” के लोकापर्ण कार्यक्रम में व्यक्त किये। यह कार्यक्रम मुंबई विश्वविद्यालय में बीते दिनों आयोजित हुआ।
‘शोधावरी’ पत्रिका पर चर्चा से हुई शुरूआत: आरंभ में ‘शोधावरी’ पत्रिका के प्रधान संपादक डॉ. हूबनाथ पांडेय ने पत्रिका की गतिविधियों की चर्चा की। इसके बाद डॉ. रीता की कहानियों को लेकर विचार व्यक्त करने का दौर शुरू हुआ। प्रयाग शुक्ल ने आशीर्वचन में कहा – “जीवन गाथा आगे निकल जाती है, रचना उसका पीछा करती है”। कहानी के एक पैराग्राफ का पाठ करते हुए शब्दों और वाक्यों में दृश्य के संयोजन की बात कही, जो उन्हें बेहद अच्छी लगी। डॉ. रतन कुमार पांडेय ने कहा, “मेरी दृष्टि में कोई बड़ा ना छोटा नही होता है उसका कर्म बड़ा या छोटा होता है। गुरु की पहचान शिष्यों के माध्यम से होती है।”
रीता में काम के प्रति लगन और उत्साह: वरिष्ठ लेखिका और रंगकर्मी विभा रानी ने कहा, रीता में अपने काम के प्रति गहरी लगन और उत्साह है। उन्होंने कहा, वे हमेशा कुछ न कुछ नया करने में लगी रहती है। वे रंगकर्म से भी जुड़ी रही हैं। कहानियों के संदर्भ में विभा जी ने कहा, “महिलाएं सबके बीच पहुँचती है और अपने निचोड़ को ले आती है।” डॉ. बिनीता सहाय ने कहानियों में विवाह के प्रति झलकती नाराजगी और विरोध पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहानियों की नायिकाओं को सशक्त बताया, कहा वे संघर्षशील है और आगे बढती है। उन्होंने ‘गे’ विषय पर लिखी गई कहानी का भी ज़िक्र किया।
बनावट से दूर पठनीय कहानियाँ: वरिष्ठ लेखक हरि मृदुल ने कहानियों को बनावट से दूर बताया और कहा, पढ़कर 3 से 4 घंटे में खत्म कर देने वाली कहानी संग्रह है। कहानियाँ पठनीय है। कमियों का संज्ञान लेते हुए आगे और अच्छी कहानियां लिखने की आशा जताई। अंग्रेजी की प्रोफेसर डॉ.भाग्यश्री जी ने यूरोपीय लेखकों के बारे में चर्चा करते हुए ” समय जो रुकता नही ” की कई कहानियों की चर्चा कर अपनी बात रखी। डॉ. हूबनाथ पांडेय के कहने पर रीता दास राम ने संग्रह की एक कहानी का पाठ किया।
रीता की कविताओं ने राष्ट्रीय स्तर पर छाप छोड़ी: कार्यक्रम में अवधेश राय ने कहा, रीता ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी कविताओं की छाप छोड़ी है। वे पूरी जिजीविषा से रचनाकर्म के प्रति समर्पित रहती हैं। ख्यात कला हस्ती, रंजना पोहनकर ने कहा, रीता में पेंटिंग के प्रति भी अभिरूचि है। उन्हें चित्रकला में भी आगे आना चाहिये। रोहित राजीव ने रीता के एक और संग्रह ‘गीली मिट्टी के रूपाकार’ को पुनः पढने पर जोर दिया। उन्होंने ‘परिंदे’ पत्रिका में छपी कहानी “उस बच्चे का बाप था मैं…” का जिक्र किया। अशोक जी ने दृश्य को किताब के रूप में रेखांकन को अतुलनीय बताया। कार्यक्रम का संचालन इस रिपोर्ट की लेखिका डॉ.अंजू गुप्ता ने किया। आभार पुष्पा चौधरी ने माना।
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