नाटक – बड़े भाई साहब
कहानी – प्रेमचंद
निर्देशक – योगेन्द्र चौबे ( रा.न.वि.)
प्रस्तुति – गुडी रायगढ़
आयोजक – छत्तीसगढ़ फिल्म्स एंड विजुअल आर्ट सोसायटी रायपुर
जनमंच पर सुभाष मिश्रा ने नाटको की झड़ी लगा दी है, रायपुर का सड्डू क्षेत्र दिल्ली का मंडी हाउस हो गया है। बहुत नज़दीक से होता हुआ रंगकर्म देख कर यह अहसास हो गया है कि अच्छा नाटक मन का तनाव दूर कर देता है। अहसास हो गया है कि ज़रा भी आसान नहीं होता मंच पर नाटक को लाना , मंच पर नाटक को उतारना आँख में दरियां उतार देने के समान होता है।
कल रात गुड़ी रायगढ़ का नाटक बड़े भाई साहब योगेन्द्र चौबे के निर्देशन में देखा। मै यह तो नहीं कह रहा कि योगेन्द्र देश के सब से श्रेष्ठ निर्देशक है लेकिन मै यह ज़रूर कह रहा हूँ कि देश में बेहतर रंगकर्म करने वालो की जो सूची है उसमें योगेन्द्र भी शामिल है , क्रमांक उपर नीचे हो सकता है। यह शख्स पैर से सर तक रंगमंच है तभी तो कल रात के नाटक में संस्कार का उजाला था , जनमंच की रात रंगमंच की सुबह साबित हुई।
बड़े भाई साहब …… आली जनाब प्रेमचंद साहब की विश्व प्रसिद्ध सांस्कारिक कहानी है। यह किसी ज़ोहरा जबी की दास्ताँ नहीं है, यह रिश्तो का पाकीज़ा शब्दांकन है जिसमे रिश्तो में जग भर भर कर स्नेह उंडेला गया है। इसमें जो कड़क है वह भी घास से ज़्यादा नरम है, इसमें जो नाराज़गी है उसमें भी ममता का प्रभाव है, इसमें जो विफ़लता है वही सफ़लता का मार्ग प्रशस्त करती है, इसे कहानी कहना गलत है यह संतवाणी है।
कथा सम्राट की यह कहानी जब से लिखी गई है तब से अब तक इसे लाखो लोगो ने लाखो बार पढ़ा है , लाखो अवसर पर लाखो लोगो ने इस पर चर्चा की है , इसे सुना है और सुनाया है। विश्व की अनेक भाषा के सैकड़ो कथाकारों की भी यह पसंदीदा कहानी है। इस कहानी में प्रेम की ज़बदस्त घटा छाई है और स्नेह की मूसलाधार बारिश हुई है।
कहानी का सारांश यह है कि बड़ा भाई अपने छोटे भाई की क्रिया कलापों पर बराबर नज़र रखता है और हर बात पर उसे टोकता है ताकि छोटा भाई लापरवाह न हो जाये , लेकिन होता यह है कि हर इम्तेहान में छोटा भाई पास होता चला जाता है और बड़ा भाई फ़ेल होता चला जाता है। एक स्थान पर बड़ा भाई छोटे से कहता है कि जीवन में तुम कितने भी बड़े हो जाओ , कितने भी आगे बढ़ जाओ पर रहोगे मेरे से छोटे ही मै तुम्हारा बड़ा भाई हूँ और हमेशा तुम से बड़ा ही रहूगा , जीवन के इस सत्य को छोटा भाई स्वीकारता है और बड़े भाई का आशीर्वाद लेता है।
छोटे भाई की यह स्वीकृति को मुंशी जी ने जिस उंचाई पर पहुचाया है उससे प्रेमचंद के साहित्य को उंचाई मिली है , प्रेमचंद के साहित्य की बदौलत भारतीय साहित्य विश्व साहित्य के समक्ष दमखम के साथ खड़ा है। तालस्ताय , गोर्की , चेखव इन सब के बड़े भाई साहब थे मुंशी प्रेमचंद। प्रेमचंद की यह कहानी अपने भाव के कारण सराही जाती है और कहानी के भाव या कविता के बिम्ब को दृश्यों में परिवर्तित कर मंच पर उसी प्रभाव के साथ स्थापित करना बेहद दुश्वार होता है और जो आसान नहीं है उसे ही करने को करना कहते है। मंच पर प्रकाश की पहली किरण, मंच पर अभिनेता की पहली इंट्री और बोले गये पहले संवाद ने ही नाटक की दिशा और दशा तय कर दी थी, अभिनेता की पहली आहट से ही दर्शक संभल गया था कि देखने में ज़रा भी चूक नहीं होनी चाहिये।
नाटक की प्रस्तुति में सब से अच्छी बात यह थी कि अभिनेता निर्देशक की मुट्ठी में था , वरना हमने कुछ ऐसे भी नाटक देखे है जिसमें से अभिनेता फ़रार था। यह नाटक मंच के सांचे में फिट बैठा। यह इस कला का कमाल है कि मंच पर मंच की साइज़ से बड़ा नाटक भी समा जाता है। पैर की साइज़ से बड़ा जूता पैर में नहीं समा सकता , सिर की साइज़ से बड़ी टोपी सिर में नहीं समा सकती , लेकिन मंच की साइज़ से बड़ा नाटक मंच पर समा जाता है, अगरबत्ती, कोर्ट मार्शल, तुगलक, जिन लाहौर नहीं देख्या… ये सब मंच से बड़े नाटक है जो छोटे से छोटे मंच पर भी समा जाते है।
जब एक काबिल निर्देशक नाटक लेकर मंच पर आता है तो वह अपने साथ सिर्फ़ कथानक और अभिनेता को लेकर नहीं आता बल्कि वह अपने साथ रंगमंच की अपनी तकनीक को लेकर आता है अपनी परिकल्पना को लेकर आता है। एक ही निर्देशक जब अलग अलग नाटक करता है तब हर नाटक की तकनीक और परिकल्पना भी अलग अलग होती है , यह बात नाटक के स्वभाव के अनुसार तय होती है।
रा.न.वि. में जाने से पहले योगेन्द्र संजय उपाध्याय के साथ रंगमंच किये थे और रा.न.वि. में जाने के बाद आप देवेन्द्र राज अंकुर के सम्पर्क में आये , रंगमंच के संस्कार इन्हें इप्टा से प्राप्त हुए। हालांकि योगेन्द्र जी के पास ये तीन तीन तेज़ रौशनी वाली टार्च है लेकिन रंगमंच की राहो पर रास्ता देखने के लिए ये अपनी आँख की ही रौशनी का इस्तेमाल करते है।
जब नाटक आरंभ होता है और पात्र दर्शको को दिखाई देते है तब वो मंच पर दिखाई नहीं देते नाटक में ही दिखाई देते है। अभिनेता मंच पर उतरता ही नहीं वह सीधा नाटक में ही उतरता है। अभिनेता पहले मंच पर दिखे फिर नाटक में दिखे यह दिखने की सही प्रक्रिया नहीं है , विंग्स और नाटक के बीच मंच पर कोई खाली स्थान नहीं होना चाहिये। दोनों प्रमुख पात्र बड़े भाई धीरज सोनी और छोटे भाई विवेक सोनी मंच पर अभिनेता जैसे लगे ही नहीं पूरे समय पात्र ही महसूस हुए। कहानी के तत्व , रंगमंच के तत्व , निर्देशक की परिकल्पना इन सब का वज़न अभिनेता के ही कंधो पर होता है , इतना वज़न उठाये ऊँची उड़ान भरना आसान काम नहीं होता , रंगमंच के आकाश में उड़ने वाले इन परिंदों के पंख में इतनी जान है कि ये प्रस्तुति को उस उंचाई तक पंहुचा सके जहां निर्देशक पहुचाना चाहता है। छोटे भाई विवेक सोनी कहानी में हर जमात में और नाटक में हर दृश्य में पास होते गये। नाटक का बहुत अहम पक्ष इसका गीत संगीत रहा , मित्रो को कोरस के रूप में प्रस्तुत कर उनसे जो चंद लोकप्रिय बाल गीत गवाये गए है यह प्रयोग योगेन्द्र चौबे की रंगमंच में उन्नति को सत्यापित करता है। बहुत दिनों बाद मंच पर अभिनेताओं को गाते और मंडली को बजाते हुए देखा , दर्शको ने नाटय संगीत को सराहा , संगीत खिचड़ी में घी की तरह था।
प्रकाश और मंच सामग्री पर नाटक के स्वभाव के अनुरूप बहुत ज़्यादा काम नहीं किया गया था , लेकिन उनसे दूरी भी नहीं रखी गई थी। अभिनेताओं ने मंच के स्पेस का बखूबी इस्तेमाल किया , यह लाईट मूड का हैवी प्रोड्क्शन था जिसमें दर्शको ने उन्ही दृश्यों को नहीं देखा जो दिखाये गये थे बल्कि उस संदेश को भी बखूबी ग्रहण किया जिसे समझाने के लिए दृश्य रचाये गये थे, यही नाटक की सफ़लता थी।
अखतर अली
निकट मेडी हेल्थ हास्पिटल
आमानाका , रायपुर (छ.ग.) मो.न. 9826126781

