कला प्रतिनिधि, इंदौर स्टूडियो। शहर में यूं तो आए दिन गायक-गायिकाओं, गीतकार-संगीतकारों, अभिनेता-अभिनेत्रियों और राग-रागिनियों पर केंद्रित कई संगीतमय कार्यक्रम होते रहते हैं, लेकिन इस बार ‘स्वर निनाद’ के कलाकारों ने संगीत प्रेमियों को एक अनूठा अनुभव प्रदान किया। प्रीतमलाल दुआ सभागार में आयोजित ‘रूप-दीप’ शीर्षक से सजी इस विशिष्ट महफ़िल में विशेष रूप से ‘ताल रूपक’ और ‘दीपचंदी’ में निबद्ध (आधारित) गीत प्रस्तुत किए गए। इस अभिनव संगीत संध्या के मुख्य कलाकार सोनाली थाळनेरकर, सीमा भटनागर, सुप्रिया गीद, रविन्द्र मराठे एवं आनंद कोल्हेकर रहे।
कालजयी गीतों से बंधा समां, श्रोता हुए भाव-विभोर
महफ़िल का शानदार आग़ाज़ गायिका सीमा भटनागर ने ‘आपकी नज़रों ने समझा’ गीत से किया। तत्पश्चात, सीमा और रविन्द्र मराठे ने कालजयी गीत ‘तुम गगन के चंद्रमा हो’ गाकर सभागार में सुरों का समां बाँध दिया। रविन्द्र ने ‘ये हवा, ये रात, ये चाँदनी’ गीत सुनाकर श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। कार्यक्रम की अगली कड़ी में सोनाली थाळनेरकर ने ‘मेघा छाए आधी रात’ गाकर महफ़िल में मधुरता बिखेरी। वहीं, सोनाली ने आनंद कोल्हेकर के साथ ‘ना किसी राह में, ना किसी मोड़ पर’ गीत बेहद दिलकश अंदाज़ में प्रस्तुत कर भरपूर तालियां बटोरीं। इसके बाद आनंद ने ‘नव कल्पना, नव रूप से’ गाकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
एकल और युगल प्रस्तुतियों ने बटोरा दर्शकों का प्यार
कार्यक्रम की अगली शानदार प्रस्तुति के रूप में सुप्रिया गीद ने ‘ओ बसंती पवन पागल’ गीत सुनाया। सुप्रिया और रविंद्र के युगल गीत ‘कभी रात दिन हम दूर थे’ ने श्रोताओं की खूब वाहवाही पाई। इसके बाद सीमा ने ‘पिया तोसे नैना लागे रे’ गाकर महफ़िल की रौनक़ को आगे बढ़ाया, तो वहीं रविन्द्र के गीत ‘यूँ ही बे खयाल हो के’ को संगीत प्रेमियों ने खूब पसंद किया। सोनाली ने ‘आज कोई प्यार से’ गीत गाकर दिग्गज गायिका आशा भोंसले जी को संगीतमय श्रद्धांजलि दी। इसके बाद कलाकारों ने ‘इशारों-इशारों में’, ‘हुस्न पहाड़ों का’, ‘तेरी बिंदिया रे’ और ‘चंदा देखे चंदा’ जैसे सदाबहार गीतों से महफ़िल को परवान चढ़ाया।
संचालन और ताल की बारीकियों का अनूठा संगम
इस पूरी सांगीतिक यात्रा को विश्वेश शिधोरे ने अपने कुशल संचालन से एक सूत्र में पिरोए रखा। उनका संचालन संक्षिप्त परन्तु बेहद दिलकश था। कार्यक्रम के प्रारंभ में विश्वेश ने स्वयं तबले पर ताल रूपक और दीपचंदी बजाकर श्रोताओं को इन तालों की बारीकियों और शास्त्रीय स्वरूप से अवगत कराया, जिससे दर्शकों का गीतों से जुड़ाव और गहरा हो गया।
सुरों की सरिता: महफ़िल में गूंजे ये सदाबहार नगमे
‘रूप-दीप’ की इस सुरमयी महफ़िल में कलाकारों द्वारा ‘आपकी नज़रों ने समझा’ (सीमा), ‘तुम गगन के चंद्रमा हो’ (सीमा-रविंद्र), ‘ये हवा ये रात ये चाँदनी’ (रविंद्र), ‘मेघा छाए आधी रात’ (सोनाली), ‘ना किसी राह में’ (सोनाली-आनंद), ‘नव कल्पना नव रूप’ (आनंद), ‘ओ बसंती पवन’ (सुप्रिया), ‘कभी रात दिन’ (सुप्रिया-रविंद्र), ‘दिल लगा कर हम’ (सीमा), ‘सावन के झूले’ (सोनाली), ‘मेरे आँसुओं पे’ (सुप्रिया), ‘यूँ ही बे ख़याल’ (रविंद्र), ‘तुझे क्या सुनाऊ’ (आनंद), ‘पिया तोसे नैना लागे रे’ (सीमा), ‘हुस्न पहाड़ो का’ (सोनाली-रविंद्र), ‘हुई शाम उनका’ (आनंद), ‘इशारों इशारों में’ (सुप्रिया-आनंद), ‘हैं इसी में प्यार की’ (सीमा), ‘आज कोई प्यार से’ (सोनाली), ‘सुभानल्लाह हाए’ (रविंद्र), ‘कह दो कोई ना’ (आनंद), ‘चंदा देखे चंदा’ (सुप्रिया-रविंद्र), ‘ऐ दिले नादाँ’ (सोनाली), ‘तेरी बिंदिया रे’ (सीमा-आनंद), ‘मुझे रात दिन ये’ (रविंद्र) और ‘तेरे मेरे मिलन की’ (सुप्रिया-आनंद) जैसे चुनिंदा और कर्णप्रिय गीत प्रस्तुत किए गए। आगे पढ़िये – माई रे…दुल्हन का चरित्र एक और मंच पर दुल्हनें तीन!.. https://indorestudio.com/mai-re-main-kase-kahun-nsd-theatre-review/

