पंडित गौरव गौतम, इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। भोपाल के शहीद भवन में महाश्वेता जी की कहानी पर आधारित और
नाटक ‘रूदाली’ का मंचन कुछ दिनों पहले देखने को मिला था। इसका नाट्य रूपातंरण ऊषा गांगुली ने किया है ।17 जुलाई को त्रिकर्षी नाट्य संस्था की इस प्रस्तुति को मैं अब तक भूल नहीं सका हूं। मंच पर ऐसी जीवंत प्रस्तुति और अभिनय मैंने रंगमंच पर कम ही देखा है। कहने को इस नाटक पर फिल्म भी बनी है। मगर मंच पर यह नाटक देखने और अनुभूत करने का अलग ही रंग है। नाटक के विषय में मुझे महाश्वेता देवी की कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं। उन्होंने कहा है-‘जनमानस से परिचित होकर, पैदल गांव-गांव, घूम-फिरकर जो कुछ जुटाती हूँ, वह मेरे मन के पन्नों में दर्ज हो जाता है, वही लिखती हूँ।‘ महाश्वेता जी इन पंक्तियों को मैंने इसलिए यहां प्रस्तुत किया ताकि ‘रुदाली’ की वेदना को समझा जा सके।
‘सनीचरी’ के रूप में कमाल का अभिनय : नाटक सनीचरी के महिला किरदार पर केंद्रित है। इस किरदार को निभाते हुए पूजा मालवीय ने अमिट छाप छोड़ी। उन्होंने दर्शकों की आँखें नम कर दीं। उनका सशक्त अभिनय और भावाभिव्यक्ति से दर्शक अभिभूत थे। मैं वर्षों से नाटक देख रहा हूँ देश-विदेश के कई नाटक देखे हैं लेकिन मुझे मंच पर पूजा जैसी अभिनेत्रियां कम ही देखने को मिलीं। नाटक में कलाकारों की भाषा पर पकड़, संवाद का उच्चारण,अभिव्यक्ति,उसकी शैली, टाईमिंग और विवेक की तत्परता जबरदस्त थी। यह सब नाटक के बेहद अनुभवी निर्देशक केजी त्रिवेदी जी का कमाल था।
उषा गांगुली जी ने जिस तरह से महाश्वेता देवी की कहानी के मूल मर्म को ध्यान रखते हुए नाट्य रूपांतरण किया है। अनुभवी निर्देशक केजी त्रिवेदी भी उसी खूबी और तीव्रता के साथ नाटक को मंच पर प्रस्तुत करने का कौशल दिखाया है। नाटक के प्रस्तुति के दौरान दर्शकों ने रूदाली को गहरे तक अनुभूत किया। सनीचरी के साथ ही मिसरी, बिखनी, लक्ष्मी, बिजुआ, मिठाईवाला और पोते का किरदार निभा रहे कलाकारों ने भी अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया। यहाँ यह कहना ज़रूरी है कि निर्देशक ने कलाकारों को इस तरह से तराशा कि यह एक सार्थक प्रस्तुति बन गया। सच तो यह है कि इस प्रस्तुति के लिए सभी कलाकार बधाई के पात्र हैं।
नाटक में पूजा मालवीय के अलावा मृदुला भारद्वाज, सुनीता अहिरे, शारदा सिंह काव्य पुरोहित, विनय शुक्ला, अर्चना, दा अग्रवाल, मधुसूदन घिरोटिया, प्रज्ञा चतुर्वेदी, देवेश झा, शुभम, अक्षय पाठक, आयुषी गारवे, अधीशा नायर, श्रृद्घा तिवारी, आरती अहिरवार और मंजू मालवीय ने भूमिकाएं निभाई हैं। मैने रंगमंच की शुरुआत हमारे प्रिय चच्चा यानी त्रिवेदी साहब के ही निर्देशन में की थी। साल 2000 में जवाहर बाल भवन में गर्मी की छुट्टियों में आपके साथ तीन महीने का ही प्रशिक्षण ही मिला। परंतु इस छोटी सी अवधि में जो अनुशासन और शिक्षा मिली उसने ही मुझे इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के काबिल बनाया।

