Wednesday, April 15, 2026
Homeचर्चित फ़िल्म'साझा सिनेमा' पर अपनी फ़िल्में दिखाइये, ये है कोऑपरेटिव मंच

‘साझा सिनेमा’ पर अपनी फ़िल्में दिखाइये, ये है कोऑपरेटिव मंच

शकील अख़्तर,इंदौर स्टूडियो। ‘साझा सिनेमा डॉट कॉम (saajhacinema.com) एक ऐसा प्लेटफार्म हैं जहां पर फिल्म निर्माता एक कोऑपरेटिव सदस्य के रूप में अपनी फ़िल्में प्रदर्शित कर सकेंगे। इस प्लेटफार्म पर अपनी फ़िल्म दिखाने के लिये निर्माता को कोई फीस नहीं देना होगी। हालांकि उन्हें दर्शक संख्या के हिसाब से पैसा मिलता रहेगा। इस नये प्लेटफार्म का कम बजट में फिल्म बनाने वाले उन इंडी फिल्म मेकर्स (Indie Films) को बड़ा फायदा मिलेगा, जो अपनी फ़िल्म को दर्शकों तक पहुँचाने में खुद को असमर्थ पा रहे हैं’। साझा सिनेमा प्लेटफार्म बनाने की एक बड़ी पहल करते हुये यह बात दिग्गज फिल्मकार विनोद पांडे ने कही। वे ‘एक बार फ़िर’, ’ये नज़दीकियां’, ‘स्टार’, ‘सिन्स’ जैसी फ़िल्मों के लिये जाने जाते हैं। आज भी फिल्म निर्माण के क्षेत्र में पहले की तरह सक्रिय हैं।लौटेगा सामानांतर सिनेमा का दौर: अपने नये वीओडी प्लेटफार्म (video on demand based platform) की संकल्पना के बारे में विनोद पांडे ने कहा,  ‘हमारी कोशिश है कि साझा सिनेमा के माध्यम से हम सामानांतर सिनेमा के दौर को आम दर्शकों की पहुँच में फिर से ला सकें। सच कहें तो ऐसी फिल्मों के लिये आज कोई प्लेटफार्म ही नहीं है। बेशक आप ओटीटी प्लेटफार्म (OTT) या कुछ फिल्म फेस्टिवल्स (Film Festivals) की बात कर सकते हैं, मगर वहाँ तक पहुँचना एक सामान्य फिल्म निर्माता के लिये आसान नहीं है। इन माध्यमों से जुड़ने की भी अपनी सीमाएं, खर्च और नियम हैं। ऐसे बहुत से इंडी फिल्म मेकर्स हैं, जो कम बजट में अच्छी और विचारपूर्ण फिल्में बना रहे हैं लेकिन वे इसी बात में उलझे हुये हैं कि वे अपनी फिल्म दिखायें कहाँ? साझा सिनेमा डॉट कॉम पर हम ऐसे निर्माताओं के साथ मिलकर अपनी फिल्में दिखायेंगे,एक नई शुरूआत करेंगे।’ (सामानांतर सिनेमा की प्रतीक अभिनेत्री स्व.स्मिता पाटिल) सिर्फ़ 49 रूपये में देखिये बेहतरीन फ़िल्म: सीनियर फिल्मकार ने कहा – ‘हमारा नया प्लेटफार्म काम करना शुरू भी कर चुका है। इसको लेकर फिल्म मेकर्स ने ख़ासी दिलचस्पी दिखाई है। कुछ निर्माताओं की फिल्में प्लेटफार्म पर लाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। प्लेटफार्म पर मेरी फिल्में भी देखी जा सकती हैं। इनमें मेरी अंतिम संस्कार को लेकर बनाई गई नई फ़िल्म ‘अंडर टेकर’ भी है। इसके अलावा ‘सिन्स’ और ‘पनाह’ जैसी फिल्में भी देखी जा सकती हैं। यहां फिल्म को देखने के लिये दर्शक को केवल 49 रूपये ही देना होगा। बदले में वे 72 घंटे तक अपनी पसंद की फिल्म देख सकेंगे’।
(यथार्थ और मानवीय चित्रण के लिये प्रख्यात सिनेकार स्व. सत्यजीत राय फिल्मांकन के दौरान ) बिना फ़ीस फिल्म दिखाइये,लाभ कमाईये: उन्होंने बताया, ‘साझा सिनेमा की कल्पना एक कोऑपरेटिव सिनेमा आंदोलन की तरह है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस प्लेटफार्म के लिये फिल्म निर्माता या प्रॉडक्शन हाऊस को कोई फीस नहीं देना है। हां, उनकी फिल्म देखे जाने पर उन्हें अपना पेमेंट ज़रूर मिलता रहेगा। उन्हें फिल्म देखने वाले प्रत्येक दर्शक की राशि में से सत्तर फीसदी पैसा प्राप्त होगा। शेष तीस प्रतिशत प्लेटफार्म को सुचारू रूप से चलाने के काम आयेगा। इस तरह यह एक दूसरे की मदद से चलाया जाने वाला प्लेटफार्म होगा। उन्होंने बताया इस तरह के कुछ विदेशी वीओडी प्लेटफार्म तो हैं, मगर वे भारतीय दर्शकों के लिये तुलनात्मक रूप से महँगे हैं। जबकि हम सिर्फ 49 रूपये में ही फिल्म दिखाने का विकल्प दे रहे हैं। (फिल्मांकन के दौरान दृश्य समझाते हुये निर्देशक विनोद पांडे)साझा सिनेमा समिति देगी इन्विटेशन: विनोद पांडे ने कहा, ‘जो भी फिल्म निर्माता यहाँ पर अपनी फिल्म दिखाना चाहेंगे, उनके कंटेट की समीक्षा के साथ ही उन्हें इन्विटेशन भेज दिया जायेगा। कंटेट समीक्षा के पीछे मकसद इतना है कि दर्शकों को अच्छी से अच्छी फ़िल्में देखने को मिल सके। ऐसी फ़िल्में जो स्तरीय, कलात्मक और विचारपूर्ण हो। इसका लाभ उन सभी इंडी फिल्म मेकर को मिलेगा जो देश या विदेश के हों। आपको बता दें कि एक इंडी फिल्म ऐसी फीचर या शॉर्ट फिल्म है जो किसी प्रमुख स्टूडियो या बड़े प्रॉडक्शन हाऊस या कंपनी के सहयोग के बिना किसी निर्माता ने खुद कम बजट में बनाई हो। इस प्लेटफार्म से नये फिल्म मेकर्स को भी बड़ा लाभ मिलेगा जिनकी कम बजट वाली फिल्में दर्शकों तक नहीं पहुँच पा रही हैं। उन्होंने कहा, इस प्लेटफार्म का विचार मुझे अपने और मेरे जैसे बहुत से फिल्म निर्माताओं के अनुभव से आया है’। ( फिल्म अभिनेत्री दीप्ति नवल के साथ सिनेकार विनोद पांडे ) फ़िल्म निमार्ण का सफ़र 1972 से जारी: विनोद पांडे 1972 से पहली बार तब चर्चा में आये थे, जब उन्होंने लंदन में रहते हुये -‘लंदन में भारत’ नाम की डाक्युमेंट्री बनाई थी। बाद में फिल्म बनाने के लिये उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ी, विज्ञापन जगत और बीबीसी में एक न्यूज़ एंकर के बतौर अपना काम छोड़ा और लंदन में ही अपनी पहली फ़िल्म ‘एक बार फिल्म’ बना डाली। इस फ़िल्म में सुरेश ओबेरॉय, दीप्ति नवल और सईद जाफरी जैसे कलाकारों ने काम किया था। फिल्म की सफलता से उत्साहित विनोद लंदन से मुंबई में आ बसे और फिर अपनी तरह की फ़िल्मों को बनाने का सफर शुरू किया।फिल्म निर्माण और प्रसारण के साथ लेखन : 82 साल के फ़िल्म मेकर, ब्रॉडकास्टर और तीन उपन्यासों के लेखक विनोद पांडे, आज भी युवा दिनों की तरह सक्रिय हैं। फिल्म प्रॉडक्शन के साथ ही वे विनोद पांडे एंटरटेनमेंट और विनोद पांडे इंफोटेनमेंट जैसे नाम से जारी अपने दो अलग यू ट्यूब चैनलों पर गतिशील रहते हैं। विनोद पांडे एंटरटेनमेंट  में उनकी दस पुरानी फिल्में हैं और फिक्शन से जुड़े कई कार्यक्रम हैं। जैसे फिल्मेसेंस, फेस टू फेस, हर-दिल-अज़ीज़, उपन्यास डॉन्स वाइफ की ऑडियोबुक और जल्द ही लॉन्च होने वाला एलेवेटर,थोडी सी मोहब्बत, थोड़ा शरारत और जुनून। जबकि विनोद पांडे इंफोटेनमेंट पर वे  फोर फिंगर्स फॉर्मूला, जर्नी, पिम्मी के मोटिवेशनल शॉर्ट्स, टेलिंग इमेजेज और सिनेमेंटर जैसे नियमित नॉन-फिक्शन और शैक्षिक कार्यक्रम करते रहते हैं। इतना सब कुछ इस उम्र में भी करते रहने के सवाल पर वे कहते हैं – ‘मुझे लगता है, कुछ ना कुछ करते रहना चाहिये।…. ज़िदंगी आप तब तक जी सकते हैं, जब तक आप नई चुनौतियां लेते रहते हैं’।

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