ऐसे थे अपने आदिल भाई : स्वानंद किरकिरे

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इस विशेष लेख के बारे में दो शब्द: गीतकार, गायक और अभिनेता स्वानंद किरकिरे का यह लेख मूल रूप से ‘लोकसत्ता’ में प्रकाशित हुआ है। इस लेख में स्वानंद ने स्व.आदिल कुरैशी को याद किया है। उन्होंने बताया है कि कला जगत में उनकी सफलता के पीछे आदिल भाई भी हैं, जिन्होंने थियेटर के दिनों से ही उनकी मदद की। दिल को छू जाने वाले इस लेख को पढ़कर मुझे लगा कि इसे मराठी से हिन्दी में अनुदित कर हमें प्रकाशित करना चाहिये। यह लेख ना सिर्फ हमें आदिल कुरैशी जैसे ज़िंदादिल शख़्सियत के बारे में बताता है बल्कि यह इंदौर की विरासत और तहज़ीब की भी याद दिलाता है। इस लेख में भाई स्वानंद की सफलता के पीछे की कहानी भर नहीं है। इसमें आदिल कुरैशी जैसे प्रेरक और मददगार लोगों की कहानी भी है। इस लेख के साथ कुछ चित्रों को भी समन्वित करने का प्रयास हुआ है जो आदिल जी के परिजनों या उनके करीबी कलाकार मित्रों से जुड़े हैं। एक बार फिर इस लेख के लिये बहुत शुक्रिया भाई स्वानंद। प्रस्तुति: शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। चित्र: तनवीर फारूकी और बीनिश कुरैशी।एक बार शहर में आया तोते बेचने वाला: तो भिया…एक बार तोतों को बेचने वाला एक आदमी शहर में आया। एक ख़रीददार ने उसके पहले किस्म के तोते को देखकर पूछा, भिया, ये तोता कितने में दोगे? दुकानदार ने कहा, 5,000 रुपये, क्योंकि ये तोता तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम जैसी सभी भारतीय भाषाएं बोल सकता है और साथ में सभी बोलियां भी!’ अब ख़रीदार दूसरे तोते के सामने गया और पता चला कि उसकी कीमत 10,000 रुपये है! ख़रीदार ने पूछा, इसके 10 हज़ार क्यों? जवाब मिला, ‘यह भारतीय भाषाओं को छोड़कर दुनिया की सभी भाषाएं समझता है – अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, स्पैनिश, चीनी, जापानी …’!   तीसरे तोते की क़ीमत 1 लाख:  अब ख़रीदार ने तीसरे तोते के दामों के बारे में पूछा, ‘और ये वाला कितने का है’? जवाब मिला- ‘1 लाख रुपये का’। ख़रीदार ने हैरानी से पूछा – भिया, इसकी क्या ख़ास बात है?  दुकानदार ने कहा, ‘इसके बारे में मुझे कुछ नहीं पता! ये ‘चुप’ तोता है’। ख़रीदार ने कहा,  तो फिर तुमने इसकी क़ीमत 1 लाख रूपये क्यों लगा रखी है? दुकानदार बोला , ‘ये तो कुछ नहीं बोलता, लेकिन बाकी दोनों तोते इसे ‘गुरूजी’ कहते हैं’!! इस चुटकुले के ख़त्म होते ही सुनने वालों की हँसी फूट पड़ी। उस हँसी में सबसे ऊंची आवाज़ आदिल भाई की सुनाई देने लगी!…
हम कलाकारों के वे थे गुरू भाई : इस तरह से सभी को हँसाने वाले, दोस्तों से घिरे रहने वाले एक ज़िंदादिल इंसान थे आदिल भाई…! एक तरह से आदिल भाई ख़ामोश तोते की तरह ही हम कलाकारों के गुरू थे। हम सबके बड़े भाई! एक नेक दिल शख़्सियत के मालिक, जिन्हें इंदौर के कलाकार, अपना दोस्त मानते थे। बहुत से उन्हें अपने परिवार का हिस्सा समझते थे। चाहे छोटे हों या बड़े, आदिल भाई अपनी मुहब्बत और अपनेपन से सबके दिलों में जगह बना लेते थे। वे प्रख्यात शायर राहत इंदौरी साहब के छोटे भाई थे। नाटक की वजह से वे हमसे बड़े होकर भी हमारे दोस्त बन गये थे। सभी नाट्य समूहों से था उनका जुड़ाव: चाहे हिंदी हो या मराठी नाटक, आदिल भाई जब भी सुनते थे कि इंदौर में कोई नाटक कर रहा है, तो उनकी मोटर साइकिल उसी दिशा में घूम जाती थी। वे रिहर्सलों और मंचनों में मौजूद रहते। अगर किसी को भी कोई जरूरत होती तो वे तुरंत मदद को तैयार हो जाते। नाटक के कलाकारों की मदद करना और फिर अख़बार में उसी नाटक की आलोचना करना आदिल भाई का पसंदीदा शगल था। वे कहते, ‘ड्रामा करना जरूरी है और अगर ड्रामा हो गया तो उसकी आलोचना करना भी ज़रूरी है’।जब इंदौर में शुरू हुई ड्रामा वर्कशॉप: इंदौर में उन्होंने शाहिद मिर्ज़ा जी के साथ एनएसडी से जुड़े थियेटर एक्सपर्ट की की एक ड्रामा वर्कशॉप आयोजित की थी। मैं उस थिएटर वर्कशॉप में इंटरव्यू देने गया था। उन दिनों मैं एक सहकारी बैंक में अस्थायी क्लर्क के रूप में काम कर रहा था। साक्षात्कार के दौरान मैंने आदिल भाई को बताया कि दिन भर चलने वाली इस वर्कशॉप के लिये मैं अपनी नौकरी भी छोड़ने को तैयार हूँ। यह सुनकर वे मुझे चाय पिलाने के बहाने एक तरफ़ ले गये। वहां उन्होंने मुझे बड़े भाई की तरह ही समझाया। कहने लगे – ‘जो लोग नाटक के लिए अपनी नौकरी छोड़ देते हैं, वे अक्सर परेशानी में पड़ जाते हैं। ऐसे लोगों को नौकरी तब ही छोड़ने के बारे में सोचना चाहिये. जब उन्हें नाटक या कला से गहरा प्यार हो और वे इसके लिए कुछ भी करने को तैयार हों’।वर्कशॉप जाइन करने का अटल इरादा:  लेकिन मेरा इरादा भी पक्का था। मैंने उनसे कहा, मुझे तो वर्कशॉप ज्वाइन करना ही है। तब आदिल जी ने कहा- ‘तुम एक काम करो, अपने माता-पिता में से किसी की से ये चिट्ठी लिखवा लाओ कि तुम्हारी नौकरी छोड़ देने पर उन्हें कोई शिकायत नहीं होगी।” मैंने घर से लाकर उन्हें वह लैटर सौंप दिया। मुझे वर्कशॉप में एडमिशन मिल गया। वर्कशॉप के दौरान वे बीच-बीच में आकर पूछते,`किरकिरे साब, कहीं आपको अपनी नौकरी छोड़ने का अफसोस तो नहीं हो रहा?” और फिर आदतन एक ठहाका भी लगाते।आये थे एनएसडी के रंग विशेषज्ञ: उस कार्यशाला में एनएसडी के कई वरिष्ठ सदस्य पढ़ाने आये थे। सुधा शिवपुरी, गोविंद नामदेव, आलोक चटर्जी और बहुत युवा आशीष विद्यार्थी। आदिल भाई ने उन सभी का दिल जीत लिया था। जब वर्कशॉप ख़त्म हो जाती,तब आदिल भाई सभी को इंदौर के सराफ़ा में खाना खिलाने ले जाते, बड़े मज़े से इंदौर की सड़कें दिखाते थे। तब हम सबने उनके साथ मुफ़्त दावतें की।हँसना,घुलना-मिलना और खाना-पिलाना: आदिल भाई का पसंदीदा शगल था सबको हंसाना और सबके साथ मिलकर खाना-पीना। आदिल भाई को कभी अकेले नहीं देखा जाता था। उनके आसपास हर समय आठ या दस लोगों की मंडली रहती थी और वे उन सभी के साथ हँसी-मज़ाक में व्यस्त रहते। जिस साल मैंने वर्कशॉप की, उसी साल मैंने पहली बार एनएसडी का फॉर्म भरा। प्रवेश परीक्षा का पहला इंटरव्यू मुंबई में होने वाला था और तब वर्कशॉप भी चल रही थी। मैं परेशान था। आगे पढ़िये – मिशन एनएसडी और आदिल भाई की मदद से जुड़ी याद। नीचे दिये लिंक क्लिक कीजिये।लेख में दिये गये चित्रों का विवरण। 1.आदिल कुरैशी 2. स्वानंद किरकिरे 3. इंदौर में छायाकार संदेश व्यास की सुपुत्री की चित्रकला प्रदर्शनी जिसके शुभारंभ में शामिल हुए आदिल जी के साथ स्वानंद 4. प्रदर्शनी में आये अतिथियों को आदिल भाई का संबोधन 5. कलाकार मित्रों पृथ्वी सांखला, तनवीर-दीपा, प्रांजल श्रोत्रिय आदि के साथ आदिल जी। 6. एमएफ हुसैन के इंदौर आगमन के समय हुसैन साब के साथ शाहिद मिर्ज़ा और आदिल भाई 7. 1992 में हुई थियेटर वर्कशॉप को लिखी गई शकील अख़्तर और आलोक वाजपेयी की रिपोर्ट। 8. इंदौर में आदिल भाई के दोस्त आशीष विद्यार्थी की राजबाड़ा के सामने सेल्फी। 9.एमेज़ान प्राइम पर आने वाली सिरीज़ बैंडवाले में स्वानंद किरकिरे के साथ आशीष विद्यार्थी।)

एनएसडी में सेलेक्शन,आदिल भाई का मिशन: स्वानंद किरकरे

 

 

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