(वरिष्ठ रंग निर्देशक योग मिश्र का विशेष लेख)। हिन्दी की लोकनाट्य परम्परा अत्यन्त विशाल, समृद्ध और बहुरंगी रही है। किसी-न-किसी लोक रूप में यह परम्पराएं आज भी विद्यमान हैं और अनिवार्य रूप से हमारे आधुनिक रंगकर्म के रचना तंत्र में शामिल होती रहती हैं। लोक संस्कृति को बचाना है तो शहरी थियेटर के युवाओं को लोक परम्पराओं के प्रभाव से परिचित कराना होगा। शुद्ध भारतीय थियेटर तभी विकसित होगा जब शहर के युवा कलाकार लोक परम्पराओं से परिचित होंगे। एक तरह से आम लोगों का ये थिएटर शहरी कलाकारों की लाइव वर्कशॉप है।
आधुनिक रंगमंच पर लोक नाट्य परंपरा का असर : यह तो स्पष्ट ही है कि भरतमुनि के नाट्यशास्त्र का मूल आधार कहीं न कहीं लोकनाट्य ही रहा होगा। एतिहासिक दृष्टि से देखें तो लोकनाट्य परम्परा प्राचीन काल से न केवल धार्मिक, एतिहासिक, सामाजिक, साहित्यिक और आधुनिक नाटकों के रंगमंच के समानान्तर चलती रही है बल्कि उन्हें किसी न किसी रूप में प्रभावित भी करती रही है। ‘दि रोमान्स आफ थियेटर’ में उमा आनंद ने अंग्रेजी में लिखा है- ‘हमारे क्लासिक संस्कृत नाटक भरत मुनि के विचारों को पूरा नहीं करते हैं। वह रंगमंच कुलीन राजाओं, संभ्राँत लोगों, महान और विद्वान ब्राह्मणों के लिए ही था। संस्कृत का क्लासिक रंगमंच आम आदमी के लिए कभी नहीं था। उस समय आम लोगों के लिए एक अलग थिएटर था? वही है यह लोक थियेटर, यह हमारा लोक रंगमंच। हिन्दी क्षेत्र की लोकधारा में विभिन्न लोक नाट्य रूप की अनेक धाराएं हैं। अलग-अलग लोक परम्पराओं के लोक नाटक शताब्दियों से हमारे लोकजीवन के विशादग्रस्त मन में रस का संचार करते चले आ रहे हैं। इनमें से प्रमुख हिन्दी लोक नाट्य परम्पराएं हैं- रासलीला, रामलीला, स्वाँग, नौटंकी, भगत, माच, ख्याल, भवाई, बिदापद या कीर्तनिया, गवरी, बिदेसिया, जट-जट्टिन, नाचा, कठपुतली का खेल, यह सब हिन्दी लोक नाट्य विधा हैं।
रासलीला : कृष्णचरित्र से संबद्ध नृत्य-संगीत प्रधान नाट्य रूप है। इसकी उत्पत्ति की कथा ‘श्रीमद्भागवत’ में बताई गई है कि राधा और गोपियों में अभिमान और अहंकार उत्पन्न होने पर कृष्ण अंतर्ध्यान हो जाते हैं। गोपियाँ कृष्णलीलाएं करती हैं, तब कृष्ण पुनः प्रगट होते हैं। रासलीला की उत्पत्ति वियोग श्रृंगार से हुई है। रासलीला का सीधा संबंध लोकनाटकों की विभिन्न धाराओं से है। डॉ. दशरथ ओझा के शब्दों में “रास के दो प्रमुख तत्व हैं एक नाट्य दूसरा रूपकत्व। इन दोनों की शैली और परम्परा संस्कृत की नाट्य शैलियों से सर्वथा भिन्न हैं। इससे यह प्रमाणित होता है कि रास हिन्दी नाटकों की स्वतंत्र शैली है, जिसके प्रभाव से ही आगे चलकर गीतिनाट्य की सृष्टि हुई है।” डा. कुँअर प्रकाश लिखते हैं कि “वैष्णव और भक्त आचार्यों के अनुसार लीला शब्द में ‘ली’ का अर्थ मिलन और ‘ला’ का अर्थ प्राप्त करना है।” इसमें कृष्ण का गोपियों के साथ अनुरागपूर्ण वृत्ताकार नृत्य होता है। जिसमें एक दूसरे की चेष्टा का अनुकरण होता है। यही रासलीला है। रासलीला में नृत्य के साथ आंशिक रूप से संवाद एवं प्रधान रूप से गीत की स्थिति बनती है। समग्र रूप से रासलीला नाट्य के कुछ तत्वों से अनुप्रमाणित होकर खुले रंगमंच की लोक नाट्य शैली है। कहीं-कहीं इसका आयोजन काफी भव्य रूप में किया जाता है। स्वांग, नौटंकी और भगत: इन तीनों में बड़ी समानताएं हैं जो एक नाट्य परंपरा की विभिन्न शैलियां सिद्ध करती है। डॉ. श्याम परमार ने लिखा है कि ‘कहीं स्वांग के नाम से नौटंकी विख्यात है तो कहीं भगत के नाम से। ऐतिहासिक दृष्टि से स्वांग की प्राचीनता में संदेह नहीं है, भगत मध्यकाल की वस्तु है और नौटंकी रीतिकालीन अथवा उससे थोड़े पहले की मिली-जुली धारा है। लोक नाटक की प्रस्तुत शैली में स्वांग नाटक एक विशेष स्थान रखते हैं। डॉ. ओझा के शब्दों में स्वांग नाटक हिंदी भाषा की उत्पत्ति के साथ-साथ ही जनता के सामने आ गए होंगे। हिंदी साहित्य में स्वांग से प्राचीन नाटक का उल्लेख शायद ही कहीं मिले। कबीरदास के समय में स्वांग और तमाशा (एक मराठी लोकनाट्य) का इतना अधिक प्रचार हो रहा था कि साधु-महात्माओं के सत्संग भजन कीर्तन में सोने वालों और स्वाँग तमाशे में रात भर जागने वालों पर कबीर ने अपने निद्रा प्रेमी श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा है-कथा होय तहँ श्रोता सोवै,वक्ता मूँड मचाया रे।होय जहां कहीं स्वांग तमाशा,तनिक न नींद सताया रे। इन प्रमाणों से सिद्ध होता है कि स्वांग उस समय भी अत्यंत लोकप्रिय होते थे। स्वाँग का एक रूप ‘भाँड़’ के नाम से प्रचलित : स्वाँग का मंच खुला होता है इसमें रंगमंचीय शिष्टाचार नहीं होते और ना दृशयांतरों का ही कोई विधान होता है। कहीं-कहीं सड़क और चौराहे इसके मंच बन जाते हैं। नुक्कड़ नाटकों की तरह दर्शकों एवं प्रदर्शकों में कोई अंतर नहीं होता है। दर्शक कुछ खड़े और कुछ सामने बैठे रहते हैं। स्वाँग का ही एक रूप ‘भाँड़’ के नाम से प्रचलित है इसका होली पर्व के अवसर पर विशेष आयोजन किया जाता है।
नौटंकी: नौटंकी मुल्तान की एक राजकुमारी से संबंधित बताया जाता है। जगदीश चंद्र माथुर की पुस्तक रूलर थिएटर इन इंडिया पर इस प्रकार का नोट है परन्तु नौटंकी का जन्मकाल और नाम तो विवादास्पद है ही लेकिन बदलती हुई परिस्थितियों की आवश्यकताओं के अनुरूप नौटंकी ने भी अपने स्वरुप में खूब बदलाव लाया है लेकिन फिर भी हाथरस और कानपुर ही नौटंकी के मुख्य गढ़ माने जाते रहे हैं। हाथरस वाली नौटंकी में गीत संगीत और गायन शैली पर विशेष बल होता है। वहीं कानपुर की नौटंकी में संवाद और अभिनय शैली पर। नौटंकी वाद्य यंत्रों में मुख्यतः नक्कारा (नगाड़ा) तथा सारंगी, ढोलक और हारमोनियम का प्रयोग होता है। भाषा कोई एक नहीं, प्रत्युत उत्तर भारत की विभिन्न बोलियों का मिश्रित रूप है। हाथरस की तुलना में कानपुर की नौटंकी में फारसी शब्दों का प्रयोग अधिक होता है। नौटंकी में ‘रंगा’ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। वह कथा गायक के रुप में नाटकीय प्रस्तुति की शुरुआत करने के साथ-साथ मंच के समस्त कार्य व्यापार को लगातार अंजाम देता हुआ नौटंकी के कथानक की कड़ियां जोड़ता चलता है। जैसे हमारे यहां छत्तीसगढ़ी नाचा में जोक्कर की भूमिका होती है न वैसे ही। रंगा को मसखरा, मुंशी, माखौलिया भी कहते हैं। नौटंकी में अधिकतर पद्य बद्ध संवाद होते हैं। दोहा, कवित्त, सवैया आदि छंदों के साथ ‘बहरतवील’ और ‘चौबोला’ जैसे लोकछन्दों का प्रयोग होता है। प्रत्येक संवाद के साथ-साथ नगाड़े की ध्वनि इसकी विशिष्ट पद्धति है। नौटंकियों में कुछ रामायण महाभारत पुराण तथा लोकगाथाओं पर आधारित है। जैसे- ध्रुव, हरिश्चंद्र, श्रवण कुमार आदि की कथा। कुछ प्रसिद्ध प्रेम कथाओं जैसे- हीर- रांझा, लैला-मजनूं, शीरी-फरहाद। कुछ ऐतिहासिक और वीरतापूर्ण घटनाओं पर अमर सिंह राठौर, सुल्ताना डाकू। तो कुछ नौटंकी सामाजिक कथानकों जैसे- बेटी का सौदा, गरीब किसान आदि पर आधारित हैं। एक समय तो नौटंकी की कथा और गीत की पुस्तिकाएं बाजार में हर तरफ खूब दिखती बिकती थीं।
सरल होता है नौटंकी का विधान :नौटंकी में शकुंतला भी नर्तकी की तरह नचाई जा सकती है और दुष्यंत को भी नचाया जा सकता है। नौटंकी के प्रदर्शन में दृश्य विधान अथवा उपकरणों का कोई स्थान नहीं। इसका रंग विधान बहुत सीधा और सरल होता है। यह सब छत्तीसगढ़ी नाचा में भी होता है। सामाजिक विद्रूपताओं को व्यंग्यरूप में अभिव्यक्त करने में यह नाट्यरूप पूर्णतः सक्षम है। वस्तुतः हिंदी लोक नाटक के अध्येता के लिए अपेरा शैली का नौटंकी-रंगमंच अत्यंत रोचक विषय है। नाटक प्रणाली की दृष्टि से इसे मध्ययुगीन, आधुनिक हिन्दी रंगमंच कहा जा सकता है।’भगत’ और नौटंकी में मोटे तौर पर अंतर यह है कि गुरुपरंपरा या अखाड़े का महत्व भगत में विशेष रूप से है। भगत और नौटंकी दोनों में यद्यपि अभिनेताओं द्वारा गणेश पूजन कर दीप जलाने के बाद प्रदर्शन प्रारंभ करने की ही प्रथा रही है लेकिन भगत की तुलना में यह धार्मिक भाव नौटंकी में थोड़ा कम रहा है।
भवाई: गुजरात और राजस्थान दोनों में प्रचलित सबसे समृद्ध नाट्यरूप है भवाई जो कई दृष्टियों में एक लोक नृत्य भी माना जाता है। यह लोग गांव-गांव में जाकर नाना प्रकार के स्वांग ख्याल (खेल) तमाशे और कलाबाजियां दिखाकर जनता का मन बहलाते थे। इस वजह से यह भी माना जाता है कि भ्रमण करते रहने के कारण ही यह लोग ‘भमाई’ नाम से पुकारे जाने लगे। जो बाद में ‘भवाई’ के रुप में सामने आ गया होगा। भवाई का खेल शुरु होने से पहले एक कलाकार मिट्टी के चाक या अपनी तलवार से मैदान मे एक घेरा खींचता है। इसे ‘पौढ़’ कहा जाता है। यहीं पर भवाई रात भर खेली जाती है। भूंगल के तीखे स्वर से अभिनेताओं के प्रवेश और प्रस्थान की सूचना देने का विधान है जिस प्रकार नौटंकी में नगाड़ा और माच में ढोलक प्रमुख वाद्य हैं। उसी प्रकार ‘भूंगल’ के बिना भवाई की कल्पना नहीं की जा सकती। अन्य प्रमुख वाद्यों में सारंगी नगाड़ा, नफीरी, मंजीरे, तबले, हारमोनियम आदि हैं। परंपरागत तौर पर भवई का आरम्भ बोरा-बोरी (नट-नटी) के स्वांग से होता है। भवाई (छत्तीसगढ़ी नाचा की ही तरह) रात भर चलता है। इसमें विविधता से सामाजिक, ऐतिहासिक और धार्मिक प्रसंग एक के बाद एक रात भर भवाई में किए जाते हैं। भवाई के हास्य कलाकार को ‘रंगला कहा जाता है। रंगला की वाकपटुता, चतुराई और अभिनय कुशलता पर ही भवाई की सफलता निर्भर करती है। (इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम)


बहूत सुंदर लेख के लिए योग सर को बधाई…. नाचा – गम्मत पर भी कुछ है तो साझा करना चाहिए.