Tuesday, June 16, 2026
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‘साहित्योत्सव 2024’ के नाम विश्व कीर्तिमान, दिव्यांग और बच्चे हुए शामिल

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विशेष प्रतिनिधि, इंदौर स्टूडियो। दिल्ली में साहित्य अकादेमी द्वारा जारी ‘साहित्योत्सव 2024’ का शनिवार 16 मार्च को समापन हुआ। साहित्योत्सव ने विश्व के सबसे बड़े महोत्सव होने का प्रमाण पत्र हासिल किया है। अंतिम दिन दिव्यांग लेखकों के साथ ही बच्चों में साहित्य के प्रति रुचि जगाने को लेकर कार्यक्रम हुए। बच्चों के लिये ‘आओ कहानी बुने’ के तहत प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इसमें दिल्ली और एनसीआर के 850 से ज्यादा बच्चों ने भाग लिया। विश्व कीर्तिमान का प्रमाण पत्र भेंट: छह दिन चले इस विश्व के इस सबसे बड़े साहित्यिक उत्सव ने विश्व के सबसे बड़े साहित्योत्सव होने का कीर्तिमान रचा है। इस सम्बंध में आइंस्टीन वर्ल्ड रिकार्डस, दुबई की टीम ने विश्व कीर्तिमान का प्रमाण-पत्र जारी किया है। प्रमाण-पत्र को साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष माधव कौशिक, उपाध्यक्ष कुमुद शर्मा एवं सचिव के. श्रीनिवासराव को सौंपा गया। प्रमाण-पत्र में छह दिन चले दुनिया के इस सबसे बड़े साहित्योत्सव में 190 सत्रों में 1100 से अधिक लेखकों के भाग लेने और इसमें 175 से अधिक भाषाओं के प्रतिनिधित्व होने को प्रमाणित किया गया है।दिव्यांगों के लिये सजगता की ज़रूरत: अखिल भारतीय दिव्यांग लेखक सम्मिलन में वक्तव्य देते हुए प्रख्यात अंग्रेज़ी विद्वान जीजेवी. प्रसाद ने कहा कि हम उन जैसे नहीं हैं, लेकिन हमें उनके लिए सजग और स्नेह से कार्य करना होगा। दिव्यांगता जन्मजात नहीं बल्कि कई बार हमारी अपनी अज्ञानता और लापरवाही के कारण हमें प्राप्त होती है। उन्होंने सभी दिव्यांग रचनाकारों से अनुरोध किया कि वह अपनी विशेष क्षमताओं को पहचान कर उनपर काम करें, उन्हें मंज़िल अवश्य प्राप्त होगी। हौसले के साथ आगे बढ़ें दिव्यांग: अपने अध्यक्षीय भाषण में साहित्य अकादेमी की उपाध्यक्ष कुमुद शर्मा ने विभिन्न क्षेत्रों में दिव्यांगजनों द्वारा पाई गई उपलब्धियों की चर्चा की। उन्होंने कहा, दिव्यांगजनों को हौसले की ऊर्जा से आगे बढ़ना होगा, तभी वह अपनी मनचाही मंज़िल पा सकेंगे। उद्घाटन सत्र के आरंभ में साहित्य अकादेमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने कहा कि आज 24 भारतीय भाषाओं के दिव्यांग लेखकों को यहाँ उपस्थित पाकर साहित्य अकादेमी अपने को गर्वित महसूस कर रही है। गोपीचंद नारंग की स्मृति में परिसंवाद : आयोजन में साहित्य अकादेमी के पूर्व अध्यक्ष एवं महत्तर सदस्य गोपीचंद नारंग को भी याद किया गया। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर एक परिसंवाद का आयोजन किया गया। इसके मुख्य अतिथि गुलज़ार और नारंग जी की धर्मपत्नी मनोरमा नारंग थी। बीज वक्तव्य प्रख्यात उर्दू विद्वान निज़ाम सिद्दकी ने दिया। विशिष्ट अतिथि के रूप में सदीकुर्रहमान क़िदवई ने वक्तव्य दिया। अध्यक्षता साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष माधव कौशिक ने की।हुनर का एक ख़ूबसूरत मुजस्समा: गुलजार ने अपने उद्घाटन वक्तव्य में कहा कि गोपी चंद नारंग का व्यक्तित्व और कृतित्व उनके हुनर और इंसानी ज़िदंगी का सबसे खूबसूरत मुजस्समा है। आरंभिक वक्तव्य उर्दू परामर्श मंडल के संयोजक चंद्र भान ख़याल ने दिया। अंतिम दिन कई और कार्यक्रम भी हुए। इनमें मुख्य रूप से बहुसांस्कृतिक समाज में अनुवाद, भारत की भाषाओं का संरक्षण, भारतीय संदर्भ में पुनर्लेखन / पुनःसृजन के रूप में अनुवाद, भारतीय अंग्रेज़ी लेखन और अनुवाद के अतिरिक्त भारतीय वाचिक महाकाव्य एवं स्वातंत्र्योत्तर भारतीय साहित्य पर राष्ट्रीय संगोष्ठी के कार्यक्रम रहे। इन कार्यक्रमों में हरीश नारंग, दामोदर खड़से, अन्विता अब्बी, रीता कोठारी, के. इनोक, देबाशीष चटर्जी, उदयनारायण सिंह, मंमग दई, सुकृता पॉल कुमार, शाफे किदवई और शमीम तारीक जैसे विद्वान लेखकों ने हिस्सा लिया। पढ़ते रहिये- https://indorestudio.com/  

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