रिपोर्ट:अंशुल कुकरेले,चित्र सौजन्य:संजीव(तनिष्क)
इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम।
टेरेस थियेटर पर ऐसा नाटक भोपाल के दर्शकों ने कम ही देखा है ! नादिरा ज़हीर बब्बर लिखित और जयंत देशमुख निर्देशित नाटक- ‘सकु बाई’ में आशी मालवीय ने कितना अच्छा अभिनय किया, उसका अनुमान इस रिपोर्ट में दी गई बोलती तस्वीरों से लगाया जा सकता है। चेतना नाट्य समारोह में 27 अक्टूबर की शाम यह ‘एकरंग भोपाल’ की यादगार एकल प्रस्तुति थी। यह मंचन चेतना टेरेस थियेटर,नीलबड़,भोपाल में हुआ।
‘सकु बाई’ घरों में जाकर काम करने वाली एक मेड की कहानी है। आम काम वालियों की तरह ही सकु बाई का काम भी घर-घर जाकर झाड़ू-पोछा, बर्तन-कपड़े और घर का बिखरा सामान आदि समेटने का है। मगर इस सबमें सकु बाई के जीवन की ऐसी व्यथा-कथा सामने आती हैं, जिसे जानकर दर्शक भी उन विवशताओं और अनुभूतियों से गुज़रने लगते हैं। सकु बाई के एक चरित्र में दबे-छिपे वही पात्र एक-एक कर सामने आने लगते हैं।नाटक मै सकु बाई माने आशा मालवी बारिश में छाते से खुद को बचाती घर में प्रवेश करती है। फिर बिखरे सामान को देखकर बड़बड़ाते,समेटते अपनी बातें कहने लगती है। इन बातों में वह दर्शकों को भी सहज ही जोड़ लेती है। बातों-बातों में वो दर्शकों को अपने वर्तमान से अतीत और फिर अतीत से वर्तमान में ले आती है।
उसे याद आता है गांव से निकलकर वह शहर की चकाचौंध में कैसे पहुंची। अपने मां-पिता,बहन के साथ बिताये पल। बीच-बीच में मौजूदा घर की मेमसाब और साहब की खट्टी-मीठी बातें। इस सब में उसे पूर्व की घटना याद आती है। उसके छोटे मामा दुष्कर्म करते हैं और वब अपनी माँ से यह बात लाख छुपाकर भी नहीं छिपा पाती। मां के सामने मासूम बच्ची के साथ जब इस दुष्कृत्य की बात सामने आती है,वह घर अपना छोड़कर चल देती है। उसे लगता है कि अगर यह बात घर में वह बता देगी तो मायके और ससुराल के संबंधों पर हमेशा के लिये ग्रहण लग जायेगा। अगर किसी और को यह बात पता चली तो फिर लड़की से शादी कौन करेगा ?
ऐसी विवश परिस्थितियों से सकु कैसे गुज़रती है,कहां पहुंचती है। फिर दूसरे घरों का काम कर कैसे जीवन गुज़ारती है। यह सब मंच पर जीवंत होता चला जाता है। मेमसाब के घर काम के दौरान ही सकु बाई अपने पति और बेटी से जुड़े सच को भी बयान करती है। अपने पति की बीमारी और बेटी की ख़ून की जांच से जुड़ी बातें वह अपनी भाव-भंगिमाओं से पुनर्जीवित करती है।इस तरह सुकू बाई बनी आशी मंच पर कई किरदारों को ला खड़ा करती है। दर्शक सहज सकू बाई के साथ उन गैर मौजूद किरदारों को भी उसके एकल अभिनय में देखने लगते हैं।
चूंकि यह प्रस्तुति ओपन टेरेस थियटर पर थी, इसलिये शुरू में कुछ संवाद सुनाई पड़ने में दिक्कत हुई। मगर जैसे-जैसे प्रस्तुति से दर्शक बंधे,वे सकु बाई की कहानी में डूबते चले गये। फोन की घंटी से लेकर गाना गाने तक हर आशी ने सुकू के रूप में सब सहजता से जीया। वह भी संगीत बिना किसी साउंड के। ज़ाहिर है कि आशी मालवीय के अभिनय और जयंत देशमुख के निर्देशन ने दर्शकों को ज़बरदस्त प्रभावित किया। एकरंग की यह यादगार प्रस्तुति बन गई।
नाटक की प्रकाश व्यवस्था दिनेश की रही। संचालन राजीव श्रीवास्तव ने किया। आयोजन सहयोग आशीष श्रीवास्तव का रहा। नाटक में खुद जयंत देशमुख के साथ ही आलोक चटर्जी,राजीव वर्मा,कमल जैन,रीता भादुड़ी,शोभा जी और मनोज नायर मौजूद रहे। जगह नहीं मिली तो बहुत से दर्शकों ने सीढ़ियों या आसपास खड़े होकर यह नाटक देखा।
(इनपुट: चेतना नाट्य समारोह,भोपाल)
‘सकु बाई’ की भूमिका में आशी मालवीय का कमाल अभिनय
RELATED ARTICLES

